महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
मुझे मालूम हुआ कि महात्मा कर्ण मेरे ही भाई थे। तबसे मुझे उनके लिये बड़ा दुःख होता है॥
इदं च परितप्यामि पुनः पुनरहं सुराः । यन्मातुः सदृशौ पादौ तस्याहममितात्मनः ॥ ७ ॥ दृष्ट्वैव तौ नानुगतः कर्णं परबलार्दनम् । न ह्यस्मान् कर्णसहितान् जयेच्छक्रोऽपि संयुगे ॥ ८ ॥
देवताओ! यह सोचकर तो मैं और भी पश्चात्ताप करता रहता हूँ कि ‘महामना कर्णके दोनों चरणोंको माता कुन्तीके चरणोंके समान देखकर भी मैं क्यों नहीं शत्रुदलमर्दन कर्णका अनुगामी हो गया?’ यदि कर्ण हमारे साथ होते तो हमें इन्द्र भी युद्धमें परास्त नहीं कर सकते ॥ ७-८ ॥
तमहं यत्र तत्रस्थं द्रष्टुमिच्छामि सूर्यजम् । अविज्ञातो मया योऽसौ घातितः सव्यसाचिना ॥ ९ ॥
ये सूर्यनन्दन कर्ण जहाँ कहीं भी हों मैं उनका दर्शन करना चाहता हूँ; जिन्हें न जाननेके कारण मैंने अर्जुनद्वारा उनका वध करवा दिया ॥ ९ ॥
भीमं च भीमविक्रान्तं प्राणेभ्योऽपि प्रियं मम । अर्जुनं चेन्द्रसंकाशं यमौ चैव यमोपमौ ॥ १० ॥ द्रष्टुमिच्छामि तां चाहं पाञ्चालीं धर्मचारिणीम् । न चेह स्थातुमिच्छामि सत्यमेवं ब्रवीमि वः ॥ ११ ॥
मैं अपने प्राणोंसे भी प्रियतम भयंकर पराक्रमी भाई भीमसेनको, इन्द्रतुल्य तेजस्वी अर्जुनको, यमराजके समान अजेय नकुल-सहदेवको तथा धर्मपरायणा देवी द्रौपदीको भी देखना चाहता हूँ। यहाँ रहनेकी मेरी तनिक भी इच्छा नहीं है। मैं आप लोगोंसे यह सच्ची बात कहता हूँ ॥ १०-११ ॥
किं मे भ्रातृविहीनस्य स्वर्गेण सुरसत्तमाः । यत्र ते मम स स्वर्गो नायं स्वर्गो मतो मम ॥ १२ ॥
सुरश्रेष्ठगण! अपने भाइयोंसे अलग रहकर इस स्वर्गसे भी मुझे क्या लेना है? जहाँ मेरे भाई हैं वहीं मेरा स्वर्ग है। उनके बिना मैं इस लोकको स्वर्ग नहीं मानता ॥ १२ ॥
देवा ऊचुः
यदि वै तत्र ते श्रद्धा गम्यतां पुत्र मा चिरम् । प्रिये हि तव वर्तामो देवराजस्य शासनात् ॥ १३ ॥
देवता बोले—वत्स! यदि उन लोगोंमें तुम्हारी श्रद्धा है तो चलो, विलम्ब न करो। हम लोग देवराजकी आज्ञासे सर्वथा तुम्हारा प्रिय करना चाहते हैं ॥ १३ ॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा तं ततो देवा देवदूतमुपादिशन् । युधिष्ठिरस्य सुहृदो दर्शयेति परंतप ॥ १४ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर देवताओंने देवदूतको आज्ञा दी—'तुम युधिष्ठिरको इनके सुहृदोंका दर्शन कराओ' ॥ १४ ॥
ततः कुन्तीसुतो राजा देवदूतश्च जग्मतुः । सहितौ राजशार्दूल यत्र ते पुरुषर्षभाः ॥ १५ ॥ नृपश्रेष्ठ! तब कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर और देवदूत दोनों साथ-साथ उस स्थानकी ओर चले जहाँ वे पुरुषप्रवर भीमसेन आदि थे ॥ १५ ॥
अग्रतो देवदूतश्च ययौ राजा च पृष्ठतः । पन्थानमशुभं दुर्गं सेवितं पापकर्मभिः ॥ १६ ॥ आगे-आगे देवदूत जा रहा था और पीछे-पीछे राजा युधिष्ठिर। दोनों ऐसे दुर्गम मार्गपर जा पहुँचे जो बहुत ही अशुभ था। पापाचारी मनुष्य ही यातना भोगनेके लिये उसपर आते-जाते थे ॥ १६ ॥
तमसा संवृतं घोरं केशशैवलशाद्वलम् । युक्तं पापकृतां गन्धैर्मांसशोणितकर्दमम् ॥ १७ ॥ वहाँ घोर अन्धकार छा रहा था। केश, सेवार और घास इन्हींसे वह मार्ग भरा हुआ था। वह पापियोंके ही योग्य था। वहाँ दुर्गन्ध फैल रही थी। मांस और रक्तकी कीच जमी हुई थी ॥ १७ ॥
दंशोत्पातकभल्लूकमक्षिकामशकावृतम् । इतश्चेतश्च कुणपैः समन्तात् परिवारितम् ॥ १८ ॥ उस रास्तेपर डाँस, मच्छर, मक्खी, उत्पाती जीवजन्तु और भालू आदि फैले हुए थे। इधर-उधर सब ओर सड़े मुर्दे पड़े हुए थे ॥ १८ ॥
अस्थिकेशसमाकीर्णं कृमिकीटसमाकुलम् । ज्वलनेन प्रदीप्तेन समन्तात् परिवेष्टितम् ॥ १९ ॥ हड्डियाँ और केश चारों ओर फैले हुए थे। कृमि और कीटोंसे वह मार्ग भरा हुआ था। उसे चारों ओरसे जलती आगने घेर रखा था ॥ १९ ॥
अयोमुखैश्च काकाद्यैर्गृध्रैश्च समभिद्रुतम् । सूचीमुखैस्तथा प्रेतैर्विन्ध्यशैलोपमैर्वृतम् ॥ २० ॥ लोहेकी-सी चोंचवाले कौए और गीध आदि पक्षी मँडरा रहे थे। सूईके समान चुभते हुए मुखोंवाले और विन्ध्यपर्वतके समान विशालकाय प्रेत वहाँ सब ओर घूम रहे थे ॥ २० ॥
मेदोरुधिरयुक्तैश्च छिन्नबाहूरुपाणिभिः । निकृत्तोदरपादैश्च तत्र तत्र प्रवेरितैः ॥ २१ ॥
वहाँ यत्र-तत्र बहुत-से मुर्दे बिखरे पड़े थे, उनमेंसे किसीके शरीरसे रुधिर और मेद बहते थे, किसीके बाहु, ऊरु, पेट और हाथ-पैर कट गये थे ।।
स तत्कुणपदुर्गन्धमशिवं लोमहर्षणम् । जगाम राजा धर्मात्मा मध्ये बहु विचिन्तयन् ॥ २२ ॥ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन बहुत चिन्ता करते हुए उसी मार्गके बीचसे होकर निकले जहाँ सड़े मुर्दोंकी बदबू फैल रही थी और अमंगलकारी बीभत्स दृश्य दिखायी देता था। वह भयंकर मार्ग रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ।। २२ ।। ददर्शोष्णोदकैः पूर्णां नदीं चापि सुदुर्गमाम् । असिपत्रवनं चैव निशितं क्षुरसंवृतम् ॥ २३ ॥ आगे जाकर उन्होंने देखा, खौलते हुए पानीसे भरी हुई एक नदी बह रही है, जिसके पार जाना बहुत ही कठिन है। दूसरी ओर तीखी तलवारों या छूरोंके-से पत्तोंसे परिपूर्ण तेज धारवाला असिपत्र नामक वन है ।। २३ ।। करम्भवालुकास्तप्ता आयसीश्च शिलाःपृथक् । लोहकुम्भीश्च तैलस्य क्वाथ्यमानाः समन्ततः ॥ २४ ॥
कहीं गरम-गरम बालू बिछी है तो कहीं तपाये हुए लोहेकी बड़ी-बड़ी चट्टानें रखी गयी हैं। चारों ओर लोहेके कलशोंमें तेल खौलाया जा रहा है ॥ २४ ॥ कूटशाल्मलिकं चापि दुःस्पर्शं तीक्ष्णकण्टकम् । ददर्श चापि कौन्तेयो यातनाः पापकर्मिणाम् ॥ २५ ॥ जहाँ-तहाँ पैने काँटोंसे भरे हुए सेमलके वृक्ष हैं, जिनको हाथसे छूना भी कठिन है। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने यह भी देखा कि वहाँ पापाचारी जीवोंको बड़ी कठोर यातनाएँ दी जा रही हैं ॥ २५ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2516)
देवदूतका युधिष्ठिरको मायामय नरकका दर्शन कराना
स तं दुर्गन्धमालक्ष्य देवदूतमुवाच ह । कियदध्वानमस्माभिर्गन्तव्यमिदमीदृशम् ॥ २६ ॥ क्व च ते भ्रातरो मह्यं तन्ममाख्यातुमर्हसि । देशोऽयं कश्च देवानामेतदिच्छामि वेदितुम् ॥ २७ ॥ वहाँकी दुर्गन्धका अनुभव करके उन्होंने देवदूतसे पूछा—‘भैया! ऐसे रास्तेपर अभी हमलोगोंको कितनी दूर और चलना है? तथा मेरे वे भाई कहाँ हैं? यह तुम्हें मुझे बता देना चाहिये। देवताओंका यह कौन-सा देश है, इस बातको मैं जानना चाहता हूँ’ ॥ २६-२७ ॥
स संनिवृत्ते श्रुत्वा धर्मराजस्य भाषितम् । देवदूतोऽब्रवीच्चैनमेतावद् गमनं तव ॥ २८ ॥ धर्मराजकी यह बात सुनकर देवदूत लौट पड़ा और बोला—‘बस, यहींतक आपको आना था ॥ २८ ॥
निवर्तितव्यो हि मया तथास्म्युक्तो दिवौकसैः । यदि श्रान्तोऽसि राजेन्द्र त्वमथागन्तुमर्हसि ॥ २९ ॥ ‘महाराज! देवताओंने मुझसे कहा है कि जब युधिष्ठिर थक जायँ तब उन्हें वापस लौटा लाना; अतः अब मुझे आपको लौटा ले चलना है। यदि आप थक गये हों तो मेरे साथ आइये’ ॥ २९ ॥
युधिष्ठिरस्तु निर्विण्णस्तेन गन्धेन मूर्च्छितः । निवर्तने धृतमनाः पर्यावर्तत भारत ॥ ३० ॥ भरतनन्दन! युधिष्ठिर वहाँकी दुर्गन्धसे घबरा गये थे। उन्हें मूर्च्छा-सी आने लगी थी। इसलिये उन्होंने मनमें लौट जानेका ही निश्चय किया और उस निश्चयके अनुसार वे लौट पड़े ॥ ३० ॥
स संनिवृत्तो धर्मात्मा दुःखशोकसमाहतः । शुश्राव तत्र वदतां दीना वाचः समन्ततः ॥ ३१ ॥ दुःख और शोकसे पीड़ित हुए धर्मात्मा युधिष्ठिर ज्यों ही वहाँसे लौटने लगे त्यों ही उन्हें चारों ओरसे पुकारनेवाले आर्त मनुष्योंकी दीन वाणी सुनायी पड़ी— ॥ ३१ ॥
भो भो धर्मज राजर्षे पुण्याभिजन पाण्डव । अनुग्रहार्थमस्माकं तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम् ॥ ३२ ॥ ‘हे धर्मनन्दन! हे राजर्षे! हे पवित्र कुलमें उत्पन्न पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर! आप हमलोगोंपर कृपा करनेके लिये दो घड़ीतक यहीं ठहरिये ॥ ३२ ॥
आयाति त्वयि दुर्धर्षे वाति पुण्यः समीरणः । तव गन्धानुगस्तात येनास्मान् सुखमागमत् ॥ ३३ ॥ ‘आप दुर्धर्ष महापुरुषके आते ही परम पवित्र हवा चलने लगी है। तात! वह हवा आपके शरीरकी सुगन्ध लेकर आ रही है जिससे हमलोगोंको बड़ा सुख मिला है ॥ ३३ ॥
ते वयं पार्थ दीर्घस्य कालस्य पुरुषर्षभ । सुखमासादयिष्यामस्त्वां दृष्ट्वा राजसत्तम ॥ ३४ ॥ ‘पुरुषप्रवर! कुन्तीकुमार! नृपश्रेष्ठ! आज दीर्घकालके पश्चात् आपका दर्शन पाकर हम सुखका अनुभव करेंगे ॥ ३४ ॥
संतिष्ठस्व महाबाहो मुहूर्तपि भारत । त्वयि तिष्ठति कौरव्य यातानास्मान् न बाधते ॥ ३५ ॥ ‘महाबाहु भरतनन्दन! हो सके तो दो घड़ी भी ठहर जाइये । कुरुनन्दन! आपके रहनेसे यहाँकी यातना हमें कष्ट नहीं दे रही है’ ॥ ३५ ॥
एवं बहुविधा वाचः कृपणा वेदनावताम् । तस्मिन् देशे स शुश्राव समन्ताद् वदतां नृप ॥ ३६ ॥ नरेश्वर! इस प्रकार वहाँ कष्ट पानेवाले दुखी प्राणियोंके भाँति-भाँतिके दीन वचन उस प्रदेशमें उन्हें चारों ओरसे सुनायी देने लगे ॥ ३६ ॥
तेषां तु वचनं श्रुत्वा दयावान् दीनभाषिणाम् । अहो कृच्छ्रमिति प्राह तस्थौ स च युधिष्ठिरः ॥ ३७ ॥ दीनतापूर्ण वचन कहनेवाले उन प्राणियोंकी बातें सुनकर दयालु राजा युधिष्ठिर वहाँ खड़े हो गये। उनके मुँहसे सहसा निकल पड़ा—‘अहो! इन बेचारोंको बड़ा कष्ट है’ ॥ ३७ ॥
स ता गिरः पुरस्ताद् वै श्रुतपूर्वा पुनः पुनः । ग्लानानां दुःखितानां च नाभ्यजानात् पाण्डवः ॥ ३८ ॥ महान् कष्ट और दुःखमें पड़े हुए प्राणियोंकी वे ही पहलेकी सुनी हुई करुणाजनक बातें सामनेकी ओरसे बारंबार उनके कानोंमें पड़ने लगीं तो भी वे पाण्डुकुमार उन्हें पहचान न सके ॥ ३८ ॥
अबुध्यमानस्ता वाचो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । उवाच के भवन्तो वै किमर्थमिह तिष्ठथ ॥ ३९ ॥ उनकी वे बातें पूर्णरूपसे न समझकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने पूछा—‘आपलोग कौन हैं और किसलिये यहाँ रहते हैं?’ ॥ ३९ ॥
इत्युक्तास्ते ततः सर्वे समन्तादवभाषिरे । कर्णोऽहं भीमसेनोऽहमर्जुनोऽहमिति प्रभो ॥ ४० ॥ नकुलः सहदेवोऽहं धृष्टद्युम्नोऽहमित्युत । द्रौपदी द्रौपदेयाश्च इत्येवं ते विचुक्रुशुः ॥ ४१ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर वे सब चारों ओरसे बोलने लगे—‘प्रभो! मैं कर्ण हूँ। मैं भीमसेन हूँ। मैं अर्जुन हूँ। मैं नकुल हूँ। मैं सहदेव हूँ। मैं धृष्टद्युम्न हूँ। मैं द्रौपदी हूँ और
हमलोग द्रौपदीके पुत्र हैं।' इस प्रकार वे सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर अपना-अपना नाम
बताने लगे ।। ४०-४१ ।।
ता वाचः स तदा श्रुत्वा तद्देशसदृशीर्नृप ।
ततो विममृशे राजा किं त्विदं दैवकारितम् ।। ४२ ।।
नरेश्वर! उस देशके अनुरूप उन बातोंको सुनकर राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन विचार
करने लगे कि दैव-का यह कैसा विधान है ।। ४२ ।।
किं तु तत् कलुषं कर्म कृतमेभिर्महात्मभिः ।
कर्णेन द्रौपदेयैर्वा पाञ्चाल्या वा सुमध्यया ।। ४३ ।।
य इमे पापगन्धेऽस्मिन् देशे सन्ति सुदारुणे ।
नाहं जानामि सर्वेषां दुष्कृतं पुण्यकर्मणाम् ।। ४४ ।।
'मेरे इन महामना भाइयोंने, कर्णने, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंने अथवा स्वयं सुमध्यमा
द्रौपदीने भी कौन-सा ऐसा पाप किया था जिससे ये लोग इस दुर्गन्धपूर्ण भयंकर स्थानमें
निवास करते हैं। इन समस्त पुण्यात्मा पुरुषोंने कभी कोई पाप किया था, इसे मैं नहीं
जानता ।। ४३-४४ ।।
किं कृत्वा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो राजा सुयोधनः ।
तथा श्रिया युतः पापैः सह सर्वैः पदानुगैः ।। ४५ ।।
'धृतराष्ट्रका पुत्र राजा सुयोधन कौन-सा पुण्यकर्म करके अपने समस्त पापी सेवकोंके
साथ वैसी अद्भुत शोभा और सम्पत्तिसे संयुक्त हुआ है? ।। ४५ ।।
महेन्द्र इव लक्ष्मीवानास्ते परमपूजितः ।
कस्येदानीं विकारोऽयं य इमे नरकं गताः ।। ४६ ।।
'वह तो यहाँ अत्यन्त सम्मानित होकर महेन्द्रके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न हुआ है।
इधर यह किस कर्मका फल है कि मेरे सगे-सम्बन्धी नरकमें पड़े हुए हैं? ।।
सर्वधर्मविदः शूराः सत्यागमपरायणाः ।
क्षत्रधर्मरताः सन्तो यज्वानो भूरिदक्षिणाः ।। ४७ ।।
'मेरे भाई सम्पूर्ण धर्मके ज्ञाता, शूरवीर, सत्यवादी तथा शास्त्रके अनुकूल चलनेवाले थे।
इन्होंने क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहकर बड़े-बड़े यज्ञ किये और बहुत-सी दक्षिणाएँ दी हैं (तथापि
इनकी ऐसी दुर्गति क्यों हुई)? ।। ४७ ।।
किं नु सुप्तोऽस्मि जागर्मि चेतयामि न चेतये ।
अहो चित्तविकारोऽयं स्याद् वा मे चित्तविभ्रमः ।। ४८ ।।
'क्या मैं सोता हूँ या जागता हूँ? मुझे चेत है या नहीं? अहो! यह मेरे चित्तका विकार तो
नहीं है, अथवा हो सकता है यह मेरे मनका भ्रम हो' ।। ४८ ।।
एवं बहुविधं राजा विममर्श युधिष्ठिरः ।
दुःखशोकसमाविष्टश्चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियः ।। ४९ ।।
दुःख और शोकके आवेशसे युक्त हो राजा युधिष्ठिर इस तरह नाना प्रकारसे विचार करने लगे। उस समय उनकी सारी इन्द्रियाँ चिन्तासे व्याकुल हो गयी थीं ॥ ४९ ॥
क्रोधमाहारयच्चैव तीव्रं धर्मसुतो नृपः । देवांश्च गर्हयामास धर्मं चैव युधिष्ठिरः ॥ ५० ॥ धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरके मनमें तीव्र रोष जाग उठा। वे देवताओं और धर्मको कोसने लगे ॥ ५० ॥
स तीव्रगन्धसंतप्तो देवदूतमुवाच ह । गम्यतां तत्र येषां त्वं दूतस्तेषामुपान्तिकम् ॥ ५१ ॥ न ह्यहं तत्र यास्यामि स्थितोऽस्मीति निवेद्यताम् । मत्संश्रयादिमे दूताः सुखिनो भ्रातरो हि मे ॥ ५२ ॥ उन्होंने वहाँकी दुःसह दुर्गन्धसे संतप्त होकर देवदूतसे कहा—'तुम जिनके दूत हो उनके पास लौट जाओ। मैं वहाँ नहीं चलूँगा। यहीं ठहर गया हूँ, अपने मालिकोंको इसकी सूचना दे देना। यहाँ ठहरनेका कारण यह है कि मेरे निकट रहनेसे यहाँ मेरे इन दुखी भाई-बन्धुओंको सुख मिलता है' ॥ ५१-५२ ॥
इत्युक्तः स तदा दूतः पाण्डुपुत्रेण धीमता । जगाम तत्र यत्रास्ते देवराजः शतक्रतुः ॥ ५३ ॥ बुद्धिमान् पाण्डुपुत्रके ऐसा कहनेपर देवदूत उस समय उस स्थानको चला गया जहाँ सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्र विराजमान थे ॥ ५३ ॥
निवेदयामास च तद् धर्मराजचिकीर्षितम् । यथोक्तं धर्मपुत्रेण सर्वमेव जनाधिप ॥ ५४ ॥ नरेश्वर! दूतने वहाँ धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं और यह भी निवेदन कर दिया कि वे क्या करना चाहते हैं ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि युधिष्ठिरनरकदर्शने द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत स्वर्गारोहणपर्वमें युधिष्ठिरको नरकका दर्शनविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना
तृतीयोऽध्यायः
इन्द्र और धर्मका युधिष्ठिरको सान्त्वना देना तथा युधिष्ठिरका शरीर त्यागकर दिव्य लोकको जाना
वैशम्पायन उवाच
स्थिते मुहूर्तं पार्थे तु धर्मराजे युधिष्ठिरे ।
आजग्मुस्तत्र कौरव्य देवाः शक्रपुरोगमाः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरको उस स्थानपर खड़े हुए अभी दो ही घड़ी बीतने पायी थी कि इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता वहाँ आ पहुँचे ॥ १ ॥
स च विग्रहवान् धर्मो राजानं प्रसमीक्षितुम् ।
तत्राजगाम यत्रासौ कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ २ ॥
साक्षात् धर्म भी शरीर धारण करके राजासे मिलनेके लिये उस स्थानपर आये जहाँ वे कुरुराज युधिष्ठिर विद्यमान थे ॥ २ ॥
तेषु भासुरदेहेषु पुण्याभिजनकर्मसु ।
समागतेषु देवेषु व्यगमत् तत् तमो नृप ॥ ३ ॥
राजन्! जिनके कुल और कर्म पवित्र हैं, उन तेजस्वी शरीरवाले देवताओंके आते ही वहाँका सारा अन्धकार दूर हो गया ॥ ३ ॥
नादृश्यन्त च तास्तत्र यातनाः पापकर्मिणाम् ।
नदी वैतरणी चैव कूटशाल्मलिना सह ॥ ४ ॥
लोहकुम्भ्यः शिलाश्चैव नादृश्यन्त भयानकाः ।
वहाँ पापकमी पुरुषोंको जो यातनाएँ दी जाती थीं वे सहसा अदृश्य हो गयीं। न वैतरणी नदी रह गयी, न कूटशाल्मलि वृक्ष। लोहेके कुम्भ और लोहमयी भयंकर तप्त शिलाएँ भी नहीं दिखायी देती थीं ॥ ४ १/२ ॥
विकृतानि शरीराणि यानि तत्र समन्ततः ॥ ५ ॥
ददर्श राजा कौरव्यस्तान्यदृश्यानि चाभवन् ।
ततो वायुः सुखस्पर्शः पुण्यगन्धवहः शुचिः ॥ ६ ॥
ववौ देवसमीपस्थः शीतलोऽतीव भारत ।
कुरुकुलनन्दन राजा युधिष्ठिरने वहाँ चारों ओर जो विकृत शरीर देखे थे वे सभी अदृश्य हो गये। तदनन्तर वहाँ पावन सुगन्ध लेकर बहनेवाली पवित्र सुखदायिनी वायु चलने लगी। भारत! देवताओंके समीप बहती हुई वह वायु अत्यन्त शीतल प्रतीत होती थी ॥ ५-६ १/२ ॥
मरुतः सह शक्रेण वसवश्चाश्विनौ सह ।। ७ ।। साध्या रुद्रास्तथाऽऽदित्या ये चान्येऽपि दिवौकसः । सर्वे तत्र समाजग्मुः सिद्धाश्च परमर्षयः ।। ८ ।। यत्र राजा महातेजा धर्मपुत्रः स्थितोऽभवत् । इन्द्रके साथ मरुद्गण, वसुगण, दोनों अश्विनीकुमार, साध्यगण, रुद्रगण, आदित्यगण, अन्यान्य देवलोकवासी सिद्ध और महर्षि सभी उस स्थानपर आये जहाँ महातेजस्वी धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर खड़े थे ।।
ततः शक्रः सुरपतिः श्रिया परमया युतः ।। ९ ।। युधिष्ठिरमुवाचेदं सान्त्वपूर्वमिदं वचः । तदनन्तर उत्तम शोभासे सम्पन्न देवराज इन्द्रने युधिष्ठिरको सान्त्वना देते हुए इस प्रकार कहा ।। ९ १/२ ।।
युधिष्ठिर महाबाहो लोकाश्चाप्यक्षयास्तव ।। १० ।। एह्येहि पुरुषव्याघ्र कृतमेतावता विभो । सिद्धिः प्राप्ता महाबाहो लोकाश्चाप्यक्षयास्तव ।। ११ ।। ‘महाबाहु युधिष्ठिर! तुम्हें अक्षयलोक प्राप्त हुए हैं। पुरुषसिंह! प्रभो! अबतक जो हुआ सो हुआ। अब अधिक कष्ट उठानेकी आवश्यकता नहीं है। आओ हमारे साथ चलो। महाबाहो! तुम्हें बहुत बड़ी सिद्धि मिली है; साथ ही अक्षयलोकोंकी भी प्राप्ति हुई है ।। १०-११ ।।
न च मन्युस्त्वया कार्यः शृणु चेदं वचो मम । अवश्यं नरकस्तात द्रष्टव्यः सर्वराजभिः ।। १२ ।। ‘तात! तुम्हें जो नरक देखना पड़ा है इसके लिये क्रोध न करना। मेरी यह बात सुनो! समस्त राजाओंको निश्चय ही नरक देखना पड़ता है ।। १२ ।।
शुभानामशुभानां च द्वौ राशी पुरुषर्षभ । यः पूर्वं सुकृतं भुङ्क्ते पश्चान्निरयमेव सः ।। १३ ।। ‘पुरुषप्रवर! मनुष्यके जीवनमें शुभ और अशुभ कर्मोंकी दो राशियाँ सञ्चित होती हैं। जो पहले ही शुभ कर्म भोग लेता है उसे पीछे नरकमें ही जाना पड़ता है ।। १३ ।।
पूर्वं नरकभाग् यस्तु पश्चात् स्वर्गमुपैति सः । भूयिष्ठं पापकर्मा यः स पूर्वं स्वर्गमश्नुते ।। १४ ।। ‘परंतु जो पहले नरक भोग लेता है वह पीछे स्वर्गमें जाता है। जिसके पास पापकर्मोंका संग्रह अधिक है वह पहले ही स्वर्ग भोग लेता है ।। १४ ।।
तेन त्वमेवं गमितो मया श्रेयोऽर्थिना नृप । व्याजेन हि त्वया द्रोण उपतीर्णः सुतं प्रति ।। १५ ।। व्याजेनैव ततो राजन् दर्शितो नरकस्तव ।
‘नरेश्वर! मैंने तुम्हारे कल्याणकी इच्छासे तुम्हें पहले ही इस प्रकार नरकका दर्शन करानेके लिये यहाँ भेज दिया है। राजन्! तुमने गुरुपुत्र अश्वत्थामाके विषयमें छलसे काम लेकर द्रोणाचार्यको उनके पुत्रकी मृत्युका विश्वास दिलाया था, इसलिये तुम्हें भी छलसे ही नरक दिखलाया गया है।। १५ १/२ ।।
यथैव त्वं तथा भीमस्तथा पार्थो यमौ तथा ।। १६ ।।
द्रौपदी च तथा कृष्णा व्याजेन नरकं गताः ।
‘जैसे तुम यहाँ लाये गये थे उसी प्रकार भीमसेन, अर्जुन, नकुल, सहदेव तथा द्रुपदकुमारी कृष्णा—ये सभी छलसे नरकके निकट लाये गये थे।। १६ १/२ ।।
आगच्छ नरशार्दूल मुक्तास्ते चैव कल्मषात् ।। १७ ।।
स्वपक्ष्याश्चैव ये तुभ्यं पार्थिवा निहता रणे ।
सर्वे स्वर्गमनुप्राप्तास्तान् पश्य भरतर्षभ ।। १८ ।।
‘पुरुषसिंह! आओ, वे सभी पापसे मुक्त हो गये हैं। भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे पक्षके जो-जो राजा युद्धमें मारे गये हैं वे सभी स्वर्गलोकमें आ पहुँचे हैं। चलो, उनका दर्शन करो ।। १७-१८ ।।
कर्णश्चैव महेष्वासः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
स गतः परमां सिद्धिं यदर्थं परितप्यसे ।। १९ ।।
‘तुम जिनके लिये सदा संतप्त रहते हो वे सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर कर्ण भी परम सिद्धिको प्राप्त हुए हैं ।। १९ ।।
तं पश्य पुरुषव्याघ्रमादित्यतनयं विभो ।
स्वस्थानस्थं महाबाहो जहि शोकं नरर्षभ ।। २० ।।
‘प्रभो! नरश्रेष्ठ! महाबाहो! तुम पुरुषसिंह सूर्यकुमार कर्णका दर्शन करो। वे अपने स्थानमें स्थित हैं। तुम उनके लिये शोक त्याग दो ।। २० ।।
भ्रातॄंश्चान्यांस्तथा पश्य स्वपक्ष्यांश्चैव पार्थिवान् ।
स्वं स्वं स्थानमनुप्राप्तान् व्येतु ते मानसो ज्वरः ।। २१ ।।
‘अपने दूसरे भाइयोंको तथा पाण्डवपक्षके अन्यान्य राजाओंको भी देखो। वे सब अपने-अपने योग्य स्थानको प्राप्त हुए हैं। उन सबकी सद्गतिके विषयमें अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ।। २१ ।।
कृच्छ्रं पूर्वं चानुभूय इतःप्रभृति कौरव ।
विहरस्व मया सार्धं गतशोको निरामयः ।। २२ ।।
‘कुरुनन्दन! पहले कष्टका अनुभव करके अबसे तुम मेरे साथ रहकर रोग-शोकसे रहित हो स्वच्छन्द विहार करो ।। २२ ।।
कर्मणां तात पुण्यानां जितानां तपसा स्वयम् ।
दानानां च महाबाहो फलं प्राप्नुहि पार्थिव ।। २३ ।।
'तात! महाबाहु! पृथ्वीनाथ! अपने किये हुए पुण्यकर्मोंका, तपस्यासे जीते हुए लोकोंका और दानोंका फल भोगो ।। २३ ।। अद्य त्वां देवगन्धर्वा दिव्याश्चाप्सरसो दिवि । उपसेवन्तु कल्याण्यो विरजोऽम्बरभूषणाः ॥ २४ ॥ 'आजसे देव, गन्धर्व तथा कल्याणस्वरूपा दिव्य अप्सराएँ स्वच्छ वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो स्वर्गलोकमें तुम्हारी सेवा करें ।। २४ ।। राजसूयजिताँल्लोकानश्वमेधाभिवर्धितान् । प्राप्नुहि त्वं महाबाहो तपसश्च महाफलम् ॥ २५ ॥ 'महाबाहो! राजसूय यज्ञद्वारा जीते हुए तथा अश्वमेध यज्ञद्वारा वृद्धिको प्राप्त हुए पुण्य लोकोंको प्राप्त करो और अपने तपके महान् फलको भोगो ।। २५ ।। उपर्युपरि राज्ञां हि तव लोका युधिष्ठिर । हरिश्चन्द्रसमाः पार्थ येषु त्वं विहरिष्यसि ॥ २६ ॥ 'कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! तुम्हें प्राप्त हुए सम्पूर्ण लोक राजा हरिश्चन्द्रके लोकोंकी भाँति सब राजाओंके लोकोंसे ऊपर हैं; जिनमें तुम विचरण करोगे ।। २६ ।। मान्धाता यत्र राजर्षिर्यत्र राजा भगीरथः । दौष्यन्तिर्यत्र भरतस्तत्र त्वं विहरिष्यसि ॥ २७ ॥ 'जहाँ राजर्षि मान्धाता, राजा भगीरथ और दुष्यन्तकुमार भरत गये हैं, उन्हीं लोकोंमें तुम भी विहार करोगे ।। एषा देवनदी पुण्या पार्थ त्रैलोक्यपावनी । आकाशगङ्गा राजेन्द्र तत्राप्लुत्य गमिष्यसि ॥ २८ ॥ 'पार्थ! ये तीनों लोकोंको पवित्र करनेवाली पुण्यसलिला देवनदी आकाशगङ्गा हैं। राजेन्द्र! इनके जलमें गोता लगाकर तुम दिव्य लोकोंमें जा सकोगे ।। २८ ।। अत्र स्नातस्य भावस्ते मानुषो विगमिष्यति । गतशोको निरायासो मुक्तवैरो भविष्यसि ॥ २९ ॥ 'मन्दाकिनीके इस पवित्र जलमें स्नान कर लेनेपर तुम्हारा मानव-स्वभाव दूर हो जायगा। तुम शोक, संताप और वैरभावसे छुटकारा पा जाओगे' ।। २९ ।। एवं ब्रुवति देवेन्द्रे कौरवेन्द्रं युधिष्ठिरम् । धर्मो विग्रहवान् साक्षादुवाच सुतमात्मनः ॥ ३० ॥ देवराज इन्द्र जब इस प्रकार कह रहे थे, उसी समय शरीर धारण करके आये हुए साक्षात् धर्मने अपने पुत्र कौरवराज युधिष्ठिरसे कहा— ।। ३० ।। भो भो राजन् महाप्राज्ञ प्रीतोऽस्मि तव पुत्रक । मद्भक्त्या सत्यवाक्यैश्च क्षमया च दमेन च ॥ ३१ ॥
‘महाप्राज्ञ नरेश! मेरे पुत्र! तुम्हारे धर्मविषयक अनुराग, सत्यभाषण, क्षमा और इन्द्रियसंयम आदि गुणोंसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ॥ ३१॥
एषा तृतीया जिज्ञासा तव राजन् कृता मया।
न शक्यसे चालयितुं स्वभावात् पार्थ हेतुतः॥ ३२॥
‘राजन्! यह मैंने तीसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी। पार्थ! किसी भी युक्तिसे कोई तुम्हें अपने स्वभावसे विचलित नहीं कर सकता॥ ३२॥
पूर्वं परीक्षितो हि त्वं प्रश्नाद् द्वैतवने मया।
अरणीसहितस्यार्थे तच्च निस्तीर्णवानसि॥ ३३॥
‘द्वैतवनमें अरणिकाष्ठका अपहरण करनेके पश्चात् जब यक्षके रूपमें मैंने तुमसे कई प्रश्न किये थे वह मेरे द्वारा तुम्हारी पहली परीक्षा थी। उसमें तुम भलीभाँति उत्तीर्ण हो गये॥ ३३॥
सोदर्येषु विनष्टेषु द्रौपद्या तत्र भारत।
श्वरूपधारिणा तत्र पुनस्त्वं मे परीक्षितः॥ ३४॥
‘भारत! फिर द्रौपदीसहित तुम्हारे सभी भाइयोंकी मृत्यु हो जानेपर कुत्तेका रूप धारण करके मैंने दूसरी बार तुम्हारी परीक्षा ली थी। उसमें भी तुम सफल हुए॥ ३४॥
इदं तृतीयं भ्रातॄणामर्थे यत् स्थातुमिच्छसि।
विशुद्धोऽसि महाभाग सुखी विगतकल्मषः॥ ३५॥
‘अब यह तुम्हारी परीक्षाका तीसरा अवसर था; किंतु इस बार भी तुम अपने सुखकी परवा न करके भाइयोंके हितके लिये नरकमें रहना चाहते थे, अतः महाभाग! तुम इस तरहसे शुद्ध प्रमाणित हुए। तुममें पापका नाम भी नहीं है; अतः सुखी होओ॥ ३५॥
न च ते भ्रातरः पार्थ नरकार्हा विशाम्पते।
मायैषा देवराजेन महेन्द्रेण प्रयोजिता॥ ३६॥
‘पार्थ! प्रजानाथ! तुम्हारे भाई नरकमें रहनेके योग्य नहीं हैं। तुमने जो उन्हें नरक भोगते देखा है वह देवराज इन्द्रद्वारा प्रकट की हुई माया थी॥ ३६॥
अवश्यं नरकास्तात द्रष्टव्याः सर्वराजभिः।
ततस्त्वया प्राप्तमिदं मुहूर्तं दुःखमुत्तमम्॥ ३७॥
‘तात! समस्त राजाओंको नरकका दर्शन अवश्य करना पड़ता है; इसलिये तुमने दो घड़ीतक यह महान् दुःख प्राप्त किया है॥ ३७॥
न सव्यसाची भीमो वा यमौ वा पुरुषर्षभौ।
कर्णो वा सत्यवाक् शूरो नरकार्हांश्चिरं नृप॥ ३८॥
‘नरेश्वर! सव्यसाची अर्जुन, भीमसेन, पुरुषप्रवर नकुल-सहदेव अथवा सत्यवादी शूरवीर कर्ण—इनमेंसे कोई भी चिरकालतक नरकमें रहनेके योग्य नहीं है॥
न कृष्णा राजपुत्री च नरकार्हा कथंचन।
एह्येहि भरतश्रेष्ठ पश्य गङ्गां त्रिलोकगाम् ॥ ३९ ॥
‘भरतश्रेष्ठ! राजकुमारी कृष्णा भी किसी तरह नरकमें जानेयोग्य नहीं है। आओ, त्रिभुवनगामिनी गङ्गाजीका दर्शन करो’ ॥ ३९ ॥
एवमुक्तः स राजर्षिस्तव पूर्वपितामहः ।
जगाम सह धर्मेण सर्वैश्च त्रिदिवालयैः ॥ ४० ॥
गङ्गां देवनदीं पुण्यां पावनीमृषिसंस्तुताम् ।
अवगाह्य ततो राजा तनुं तत्याज मानुषीम् ॥ ४१ ॥
जनमेजय! धर्मके यों कहनेपर तुम्हारे पूर्वपितामह राजर्षि युधिष्ठिरने धर्म तथा समस्त स्वर्गवासी देवताओंके साथ जाकर मुनिजनवन्दित परम पावन पुण्यसलिला देवनदी गङ्गाजीमें स्नान किया। स्नान करके राजाने तत्काल अपने मानवशरीरको त्याग दिया ॥ ४०-४१ ॥
ततो दिव्यवपुर्भूत्वा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
निर्वैरो गतसंतापो जले तस्मिन् समाप्लुतः ॥ ४२ ॥
तत्पश्चात् दिव्यदेह धारण करके धर्मराज युधिष्ठिर वैरभावसे रहित हो गये। मन्दाकिनीके शीतल जलमें स्नान करते ही उनका सारा संताप दूर हो गया ॥ ४२ ॥
ततो ययौ वृतो देवैः कुरुराजो युधिष्ठिरः ।
धर्मेण सहितो धीमान् स्तूयमानो महर्षिभिः ॥ ४३ ॥
यत्र ते पुरुषव्याघ्राः शूरा विगतमन्यवः ।
पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च स्वानि स्थानानि भेजिरे ॥ ४४ ॥
तत्पश्चात् देवताओंसे घिरे हुए बुद्धिमान् कुरुराज युधिष्ठिर महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनते हुए धर्मके साथ उस स्थानको गये जहाँ वे पुरुषसिंह शूरवीर पाण्डव और धृतराष्ट्रपुत्र क्रोध त्यागकर आनन्दपूर्वक अपने-अपने स्थानोंपर रहते थे ॥ ४३-४४ ॥
इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि युधिष्ठिरतनुत्यागे तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्वर्गारोहणपर्वमें युधिष्ठिरका देहत्यागविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2527)
चतुर्थोऽध्यायः
युधिष्ठिरका दिव्यलोकमें श्रीकृष्ण, अर्जुन आदिका दर्शन करना
वैशम्पायन उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा देवैः सर्षिमरुद्गणैः । स्तूयमानो ययौ तत्र यत्र ते कुरुपुङ्गवाः ॥ १ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर देवताओं, ऋषियों और मरुद्गणोंके मुँहसे अपनी प्रशंसा सुनते हुए राजा युधिष्ठिर क्रमशः उस स्थानपर जा पहुँचे जहाँ वे कुरुश्रेष्ठ भीमसेन और अर्जुन आदि विराजमान थे ॥ १ ॥
ददर्श तत्र गोविन्दं ब्राह्मेण वपुषान्वितम् । तेनैव दृष्टपूर्वेण सादृश्येनैव सूचितम् ॥ २ ॥ वहाँ जाकर उन्होंने देखा कि भगवान् श्रीकृष्ण अपने ब्राह्मविग्रहसे सम्पन्न हैं। पहलेके देखे गये सादृश्यसे ही वे पहचाने जाते हैं ॥ २ ॥
दीप्यमानं स्ववपुषा दिव्यैरस्त्रैरुपस्थितम् । चक्रप्रभृतिभिर्घोरैर्दिव्यैः पुरुषविग्रहैः ॥ ३ ॥ उनके श्रीविग्रहसे अद्भुत दीप्ति छिटक रही है। चक्र आदि दिव्य एवं भयंकर अस्त्र-शस्त्र दिव्य पुरुषविग्रह धारण करके उनकी सेवामें उपस्थित हैं ॥ ३ ॥
उपास्यमानं वीरेण फाल्गुनेन सुवर्चसा । तथास्वरूपं कौन्तेयो ददर्श मधुसूदनम् ॥ ४ ॥ अत्यन्त तेजस्वी वीरवर अर्जुन भगवान्की आराधनामें लगे हुए हैं। कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भगवान् मधुसूदनका उसी स्वरूपमें दर्शन किया ॥ ४ ॥
तावुभौ पुरुषव्याघ्रौ समुद्वीक्ष्य युधिष्ठिरम् । यथावत् प्रतिपेदाते पूजया देवपूजितौ ॥ ५ ॥ पुरुषसिंह अर्जुन और श्रीकृष्ण देवताओंद्वारा पूजित थे। इन दोनोंने युधिष्ठिरको उपस्थित देख उनका यथावत् सम्मान किया ॥ ५ ॥
अपरस्मिन्नथोद्देशे कर्णं शस्त्रभृतां वरम् । द्वादशादित्यसहितं ददर्श कुरुनन्दनः ॥ ६ ॥ इसके बाद दूसरी ओर दृष्टि डालनेपर कुरुनन्दन युधिष्ठिरने शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्णको देखा जो बारह आदित्योंके साथ (तेजोमय स्वरूप धारण किये) विराजमान थे ॥ ६ ॥
अथापरस्मिन्नुद्देशे मरुद्गणवृतं विभुम् ।
भीमसेनमथापश्यत् तेनैव वपुषान्वितम् ॥ ७ ॥ वायोर्मूर्तिमतरः पार्श्वे दिव्यमूर्त्तिसमन्वितम् । श्रिया परमया युक्तं सिद्धिं परमिकां गतम् ॥ ८ ॥ फिर दूसरे स्थानमें उन्होंने दिव्यरूपधारी भीमसेनको देखा जो पहलेहीके समान शरीर धारण किये मूर्तिमान् वायुदेवताके पास बैठे थे। उन्हें सब ओरसे मरुद्गणोंने घेर रखा था। वे उत्तम कान्तिसे सुशोभित एवं उत्कृष्ट सिद्धिको प्राप्त थे ॥ ७-८ ॥ अश्विनोस्तु तथा स्थाने दीप्यमानौ स्वतेजसा । नकुलं सहदेवं च ददर्श कुरुनन्दनः ॥ ९ ॥ कुरुनन्दन युधिष्ठिरने नकुल और सहदेवको अश्विनीकुमारोंके स्थानमें विराजमान देखा जो अपने तेजसे उद्दीप्त हो रहे थे ॥ ९ ॥ तथा ददर्श पाञ्चालीं कमलोत्पलमालिनीम् । वपुषा स्वर्गमाक्रम्य तिष्ठन्तीमर्कवर्चसम् ॥ १० ॥ तदनन्तर उन्होंने कमलोंकी मालासे अलंकृत पाञ्चालराजकुमारी द्रौपदीको देखा जो अपने तेजस्वी स्वरूपसे स्वर्गलोकको अभिभूत करके विराज रही थीं। उनकी दिव्य कान्ति सूर्यदेवकी भाँति प्रकाशित हो रही थी ॥ १० ॥ अखिलं सहसा राजा प्रष्टुमैच्छद् युधिष्ठिरः । ततोऽस्य भगवानिन्द्रः कथयामास देवराट् ॥ ११ ॥ राजा युधिष्ठिरने इन सबके विषयमें सहसा प्रश्न करनेका विचार किया। तब देवराज भगवान् इन्द्र स्वयं ही उन्हें सबका परिचय देने लगे— ॥ ११ ॥ श्रीरेषा द्रौपदीरूपा त्वदर्थे मानुषं गता । अयोनिशा लोककान्ता पुण्यगन्धा युधिष्ठिर ॥ १२ ॥ ‘युधिष्ठिर! ये जो लोककमनीय विग्रहसे युक्त पवित्र गन्धवाली देवी दिखायी दे रही हैं, साक्षात् भगवती लक्ष्मी हैं। ये ही तुम्हारे लिये मनुष्यलोकमें जाकर अयोनिसम्भूता द्रौपदीके रूपमें अवतीर्ण हुई थीं ॥ १२ ॥ रत्यर्थं भवतां ह्येषा निर्मिता शूलपाणिना । द्रुपदस्य कुले जाता भवद्भिश्चोपजीविता ॥ १३ ॥ ‘स्वयं भगवान् शंकरने तुमलोगोंकी प्रसन्नताके लिये इन्हें प्रकट किया था और ये ही द्रुपदके कुलमें जन्म धारणकर तुम सब भाइयोंके द्वारा अनुगृहीत हुई थीं ॥ १३ ॥ एते पञ्च महाभागा गन्धर्वाः पावकप्रभाः । द्रौपद्यास्तनया राजन् युष्माकममितौजसः ॥ १४ ॥ ‘राजन्! ये जो अग्निके समान तेजस्वी और महान् सौभाग्यशाली पाँच गन्धर्व दिखायी देते हैं, ये ही तुमलोगोंके वीर्यसे उत्पन्न हुए द्रौपदीके अनन्त बलशाली पुत्र हुए थे ॥ १४ ॥ पश्य गन्धर्वराजानं धृतराष्ट्रं मनीषिणम् ।
एनं च त्वं विजानीहि भ्रातरं पूर्वजं पितुः ॥ १५ ॥ 'इन मनीषी गन्धर्वराज धृतराष्ट्रका दर्शन करो और इन्हींको अपने पिताका बड़ा भाई समझो ॥ १५ ॥
अयं ते पूर्वजो भ्राता कौन्तेयः पावकद्युतिः । सूतपुत्राग्रजः श्रेष्ठो राधेय इति विश्रुतः ॥ १६ ॥ 'ये रहे तुम्हारे बड़े भाई कुन्तीकुमार कर्ण जो अग्नितुल्य तेजसे प्रकाशित हो रहे हैं। ये ही सूतपुत्रोंके श्रेष्ठ अग्रज थे और ये ही राधापुत्रके नामसे विख्यात हुए थे ॥
आदित्यसहितो याति पश्यैनं पुरुषर्षभम् । 'इन पुरुषप्रवर कर्णका दर्शन करो, ये आदित्योंके साथ जा रहे हैं ॥ १६ १/२ ॥
साध्यानामथ देवानां विश्वेषां मरुतामपि ॥ १७ ॥ गणेषु पश्य राजेन्द्र वृष्ण्यन्धकमहारथान् । सात्यकिप्रमुखान् वीरान् भोजांश्चैव महाबलान् ॥ १८ ॥ 'राजेन्द्र! उधर वृष्णि और अन्धककुलके सात्यकि आदि वीर महारथियों और महान् बलशाली भोजोंको देखो। वे साध्यों, विश्वेदेवों तथा मरुद्गणोंमें विराजमान हैं ॥ १७-१८ ॥
सोमेन सहितं पश्य सौभद्रमपराजितम् । अभिमन्युं महेष्वासं निशाकरसमद्युतिम् ॥ १९ ॥ 'इधर किसीसे परास्त न होनेवाले महाधनुर्धर सुभद्राकुमार अभिमन्युकी ओर दृष्टि डालो। यह चन्द्रमाके साथ इन्हींके समान कान्ति धारण किये बैठा है ॥ १९ ॥
एष पाण्डुर्महेष्वासः कुन्त्या माद्र्या च संगतः । विमानेन सदाभ्येति पिता तव ममान्तिकम् ॥ २० ॥ 'ये महाधनुर्धर राजा पाण्डु हैं जो कुन्ती और माद्री दोनोंके साथ हैं। ये तुम्हारे पिता पाण्डु विमानद्वारा सदा मेरे पास आया करते हैं ॥ २० ॥
वसुभिः सहितं पश्य भीष्मं शान्तनवं नृपम् । द्रोणं बृहस्पतेः पार्श्वे गुरुमेनं निशामय ॥ २१ ॥ 'शान्तनुनन्दन राजा भीष्मका दर्शन करो, ये वसुओंके साथ विराज रहे हैं। द्रोणाचार्य बृहस्पतिके साथ हैं। अपने इन गुरुदेवको अच्छी तरह देख लो ॥ २१ ॥
एते चान्ये महीपाला योधास्तव च पाण्डव । गन्धर्वसहिता यान्ति यक्षपुण्यजनैस्तथा ॥ २२ ॥ 'पाण्डुनन्दन! ये तुम्हारे पक्षके दूसरे भूपाल योद्धा गन्धर्वों, यक्षों तथा पुण्यजनोंके साथ जा रहे हैं ॥ २२ ॥
गुह्यकानां गतिं चापि केचित् प्राप्ता नराधिपाः । त्यक्त्वा देहं जितः स्वर्गः पुण्यवाग्बुद्धिकर्मभिः ॥ २३ ॥
‘किन्हीं-किन्हीं राजाओंको गुह्यकोंकी गति प्राप्त हुई है। ये सब युद्धमें शरीर त्यागकर अपनी पवित्र वाणी, बुद्धि और कर्मोंके द्वारा स्वर्गलोकपर अधिकार प्राप्त कर चुके हैं’ ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते स्वर्गारोहणपर्वणि द्रौपद्यादिस्वस्वस्थानगमने चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत स्वर्गारोहणपर्वमें द्रौपदी आदिका अपने-अपने स्थानमें गमनविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य
पञ्चमोऽध्यायः
भीष्म आदि वीरोंका अपने-अपने मूलस्वरूपमें मिलना और महाभारतका उपसंहार तथा माहात्म्य
जनमेजय उवाच
भीष्मद्रोणौ महात्मानौ धृतराष्ट्रश्च पार्थिवः ।
विराटद्रुपदौ चोभौ शङ्खश्चैवोत्तरस्तथा ॥ १ ॥
धृष्टकेतुर्जयत्सेनो राजा चैव स सत्यजित् ।
दुर्योधनसुताश्चैव शकुनिश्चैव सौबलः ॥ २ ॥
कर्णपुत्राश्च विक्रान्ता राजा चैव जयद्रथः ।
घटोत्कचादयश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिताः ॥ ३ ॥
ये चान्ये कीर्तिता वीरा राजानो दीप्तमूर्तयः ।
स्वर्गे कालं कियन्तं ते तस्थुस्तदपि शंस मे ॥ ४ ॥
जनमेजयने पूछा— ब्रह्मन्! महात्मा भीष्म और द्रोण, राजा धृतराष्ट्र, विराट, द्रुपद, शंख, उत्तर, धृष्टकेतु, जयत्सेन, राजा सत्यजित् दुर्योधनके पुत्र, सुबलपुत्र शकुनि, कर्णके पराक्रमी पुत्र, राजा जयद्रथ तथा घटोत्कच आदि तथा दूसरे जो नरेश यहाँ नहीं बताये गये हैं और जिनका नाम लेकर यहाँ वर्णन किया गया है, वे सभी तेजस्वी शरीर धारण करनेवाले वीर राजा स्वर्गलोकमें कितने समयतक एक साथ रहे? यह मुझे बताइये ॥
आहोस्विच्छाश्वतं स्थानं तेषां तत्र द्विजोत्तम ।
अन्ते वा कर्मणां कां ते गतिं प्राप्ता नरर्षभाः ॥ ५ ॥
द्विजश्रेष्ठ! क्या उन्हें वहाँ सनातन स्थानकी प्राप्ति हुई थी? अथवा कर्मोंका अन्त होनेपर वे पुरुषश्रेष्ठ किस गतिको प्राप्त हुए? ॥ ५ ॥
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं प्रोच्यमानं द्विजोत्तम ।
तपसा हि प्रदीप्तेन सर्वं त्वमनुपश्यसि ॥ ६ ॥
विप्रवर! मैं आपके मुखसे इस विषयको सुनना चाहता हूँ; क्योंकि आप अपनी उद्दीप्त तपस्यासे सब कुछ देखते हैं ॥ ६ ॥
सौतिरुवाच
इत्युक्तः स तु विप्रर्षिरनुज्ञातो महात्मना ।
व्यासेन तस्य नृपतेराख्यातुमुपचक्रमे ॥ ७ ॥
सौति कहते हैं— राजा जनमेजयके इस प्रकार पूछनेपर महात्मा व्यासकी आज्ञा ले ब्रह्मर्षि वैशम्पायनने राजासे इस प्रकार कहना आरम्भ किया ॥ ७ ॥