भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2519, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2519

हमलोग द्रौपदीके पुत्र हैं।' इस प्रकार वे सब लोग चिल्ला-चिल्लाकर अपना-अपना नाम

बताने लगे ।। ४०-४१ ।।

ता वाचः स तदा श्रुत्वा तद्देशसदृशीर्नृप ।

ततो विममृशे राजा किं त्विदं दैवकारितम् ।। ४२ ।।

नरेश्वर! उस देशके अनुरूप उन बातोंको सुनकर राजा युधिष्ठिर मन-ही-मन विचार

करने लगे कि दैव-का यह कैसा विधान है ।। ४२ ।।

किं तु तत् कलुषं कर्म कृतमेभिर्महात्मभिः ।

कर्णेन द्रौपदेयैर्वा पाञ्चाल्या वा सुमध्यया ।। ४३ ।।

य इमे पापगन्धेऽस्मिन् देशे सन्ति सुदारुणे ।

नाहं जानामि सर्वेषां दुष्कृतं पुण्यकर्मणाम् ।। ४४ ।।

'मेरे इन महामना भाइयोंने, कर्णने, द्रौपदीके पाँचों पुत्रोंने अथवा स्वयं सुमध्यमा

द्रौपदीने भी कौन-सा ऐसा पाप किया था जिससे ये लोग इस दुर्गन्धपूर्ण भयंकर स्थानमें

निवास करते हैं। इन समस्त पुण्यात्मा पुरुषोंने कभी कोई पाप किया था, इसे मैं नहीं

जानता ।। ४३-४४ ।।

किं कृत्वा धृतराष्ट्रस्य पुत्रो राजा सुयोधनः ।

तथा श्रिया युतः पापैः सह सर्वैः पदानुगैः ।। ४५ ।।

'धृतराष्ट्रका पुत्र राजा सुयोधन कौन-सा पुण्यकर्म करके अपने समस्त पापी सेवकोंके

साथ वैसी अद्भुत शोभा और सम्पत्तिसे संयुक्त हुआ है? ।। ४५ ।।

महेन्द्र इव लक्ष्मीवानास्ते परमपूजितः ।

कस्येदानीं विकारोऽयं य इमे नरकं गताः ।। ४६ ।।

'वह तो यहाँ अत्यन्त सम्मानित होकर महेन्द्रके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न हुआ है।

इधर यह किस कर्मका फल है कि मेरे सगे-सम्बन्धी नरकमें पड़े हुए हैं? ।।

सर्वधर्मविदः शूराः सत्यागमपरायणाः ।

क्षत्रधर्मरताः सन्तो यज्वानो भूरिदक्षिणाः ।। ४७ ।।

'मेरे भाई सम्पूर्ण धर्मके ज्ञाता, शूरवीर, सत्यवादी तथा शास्त्रके अनुकूल चलनेवाले थे।

इन्होंने क्षत्रिय-धर्ममें तत्पर रहकर बड़े-बड़े यज्ञ किये और बहुत-सी दक्षिणाएँ दी हैं (तथापि

इनकी ऐसी दुर्गति क्यों हुई)? ।। ४७ ।।

किं नु सुप्तोऽस्मि जागर्मि चेतयामि न चेतये ।

अहो चित्तविकारोऽयं स्याद् वा मे चित्तविभ्रमः ।। ४८ ।।

'क्या मैं सोता हूँ या जागता हूँ? मुझे चेत है या नहीं? अहो! यह मेरे चित्तका विकार तो

नहीं है, अथवा हो सकता है यह मेरे मनका भ्रम हो' ।। ४८ ।।

एवं बहुविधं राजा विममर्श युधिष्ठिरः ।

दुःखशोकसमाविष्टश्चिन्ताव्याकुलितेन्द्रियः ।। ४९ ।।