महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2518, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंते वयं पार्थ दीर्घस्य कालस्य पुरुषर्षभ । सुखमासादयिष्यामस्त्वां दृष्ट्वा राजसत्तम ॥ ३४ ॥ ‘पुरुषप्रवर! कुन्तीकुमार! नृपश्रेष्ठ! आज दीर्घकालके पश्चात् आपका दर्शन पाकर हम सुखका अनुभव करेंगे ॥ ३४ ॥
संतिष्ठस्व महाबाहो मुहूर्तपि भारत । त्वयि तिष्ठति कौरव्य यातानास्मान् न बाधते ॥ ३५ ॥ ‘महाबाहु भरतनन्दन! हो सके तो दो घड़ी भी ठहर जाइये । कुरुनन्दन! आपके रहनेसे यहाँकी यातना हमें कष्ट नहीं दे रही है’ ॥ ३५ ॥
एवं बहुविधा वाचः कृपणा वेदनावताम् । तस्मिन् देशे स शुश्राव समन्ताद् वदतां नृप ॥ ३६ ॥ नरेश्वर! इस प्रकार वहाँ कष्ट पानेवाले दुखी प्राणियोंके भाँति-भाँतिके दीन वचन उस प्रदेशमें उन्हें चारों ओरसे सुनायी देने लगे ॥ ३६ ॥
तेषां तु वचनं श्रुत्वा दयावान् दीनभाषिणाम् । अहो कृच्छ्रमिति प्राह तस्थौ स च युधिष्ठिरः ॥ ३७ ॥ दीनतापूर्ण वचन कहनेवाले उन प्राणियोंकी बातें सुनकर दयालु राजा युधिष्ठिर वहाँ खड़े हो गये। उनके मुँहसे सहसा निकल पड़ा—‘अहो! इन बेचारोंको बड़ा कष्ट है’ ॥ ३७ ॥
स ता गिरः पुरस्ताद् वै श्रुतपूर्वा पुनः पुनः । ग्लानानां दुःखितानां च नाभ्यजानात् पाण्डवः ॥ ३८ ॥ महान् कष्ट और दुःखमें पड़े हुए प्राणियोंकी वे ही पहलेकी सुनी हुई करुणाजनक बातें सामनेकी ओरसे बारंबार उनके कानोंमें पड़ने लगीं तो भी वे पाण्डुकुमार उन्हें पहचान न सके ॥ ३८ ॥
अबुध्यमानस्ता वाचो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः । उवाच के भवन्तो वै किमर्थमिह तिष्ठथ ॥ ३९ ॥ उनकी वे बातें पूर्णरूपसे न समझकर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने पूछा—‘आपलोग कौन हैं और किसलिये यहाँ रहते हैं?’ ॥ ३९ ॥
इत्युक्तास्ते ततः सर्वे समन्तादवभाषिरे । कर्णोऽहं भीमसेनोऽहमर्जुनोऽहमिति प्रभो ॥ ४० ॥ नकुलः सहदेवोऽहं धृष्टद्युम्नोऽहमित्युत । द्रौपदी द्रौपदेयाश्च इत्येवं ते विचुक्रुशुः ॥ ४१ ॥ उनके इस प्रकार पूछनेपर वे सब चारों ओरसे बोलने लगे—‘प्रभो! मैं कर्ण हूँ। मैं भीमसेन हूँ। मैं अर्जुन हूँ। मैं नकुल हूँ। मैं सहदेव हूँ। मैं धृष्टद्युम्न हूँ। मैं द्रौपदी हूँ और