महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2539, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें‘अज्ञानी पुरुषको प्रतिदिन हर्षके हजारों और भयके सैकड़ों अवसर प्राप्त होते रहते हैं; किंतु विद्वान् पुरुषके मनपर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।। ६१।। ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चित् शृणोति मे। धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थं न सेव्यते।। ६२।। ‘मैं दोनों हाथ ऊपर उठाकर पुकार-पुकारकर कह रहा हूँ, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्मसे मोक्ष तो सिद्ध होता ही है; अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं, तो भी लोग उसका सेवन क्यों नहीं करते।। ६२।। न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः। नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः।। ६३।। ‘कामनासे, भयसे, लोभसे अथवा प्राण बचानेके लिये भी धर्मका त्याग न करे। धर्म नित्य है और सुख-दुःख अनित्य। इसी प्रकार जीवात्मा नित्य है और उसके बन्धनका हेतु अनित्य’।। ६३।। इमां भारतसावित्रीं प्रातरुत्थाय यः पठेत्। स भारतफलं प्राप्य परं ब्रह्माधिगच्छति।। ६४।। यह महाभारतका सारभूत उपदेश ‘भारत-सावित्री’ के नामसे प्रसिद्ध है। जो प्रतिदिन सबेरे उठकर इसका पाठ करता है वह सम्पूर्ण महाभारतके अध्ययनका फल पाकर परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है।। ६४।। यथा समुद्रो भगवान् यथा हि हिमवान् गिरिः। ख्यातावुभौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते।। ६५।। जैसे ऐश्वर्यशाली समुद्र और हिमालय पर्वत दोनों ही रत्नोंकी निधि कहे गये हैं, उसी प्रकार महाभारत भी नाना प्रकारके उपदेशमय रत्नोंका भण्डार कहलाता है।। ६५।। कार्ष्णं वेदमिमं विद्वान् श्रावयित्वार्थमश्नुते। इदं भारतमाख्यानं यः पठेत् सुसमाहितः। स गच्छेत् परमां सिद्धिमिति मे नास्ति संशयः।। ६६।। जो विद्वान् श्रीकृष्णद्वैपायनके द्वारा प्रसिद्ध किये गये इस महाभारतरूप पञ्चम वेदको सुनाता है उसे अर्थकी प्राप्ति होती है। जो एकाग्रचित्त होकर इस भारत-उपाख्यानका पाठ करता है वह मोक्षरूप परम सिद्धिको प्राप्त कर लेता है। इस विषयमें मुझे संशय नहीं है।। ६६।। द्वैपायनोष्ठपुटनिःसृतमप्रमेयं पुण्यं पवित्रमथ पापहरं शिवं च। यो भारतं समधिगच्छति वाच्यमानं