महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2540, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिं तस्य पुष्करजलैरभिषेचनेन ॥ ६७ ॥
जो वेदव्यासजीके मुखसे निकले हुए इस अप्रमेय (अतुलनीय), पुण्यदायक, पवित्र, पापहारी और कल्याणमय महाभारतको दूसरोंके मुखसे सुनता है उसे पुष्करतीर्थके जलमें गोता लगानेकी क्या आवश्यकता है ।। ६७ ।।
यो गोशतं कनकश्शृङ्गमयं ददाति
विप्राय वेदविदुषे सुबहुश्रुताय ।
पुण्यां च भारतकथां सततं शृणोति
तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव ॥ ६८ ॥
सौ गौओंके सींगमें सोना मढ़ाकर वेदवेत्ता एवं बहुज्ञ ब्राह्मणको जो गौएँ दान देता है और जो महाभारतकथाका प्रतिदिन श्रवणमात्र करता है, इन दोनोंमेंसे प्रत्येकको बराबर ही फल मिलता है ।। ६८ ।।
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां स्वर्गारोहणपर्वणि पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत नामक व्यासनिर्र्मित शतसाहस्री संहिताके स्वर्गारोहणपर्वमें पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५ ।।
॥ स्वर्गारोहणपर्व सम्पूर्णम् ॥
| अनुष्टुप् | ( अन्य बड़े छन्द ) | बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप् मानकर गिननेपर | कुल योग | |
|---|---|---|---|---|
| उत्तर भारतीय पाठसे लिये गये | २१४ ॥ | ( ३ ) | ४⁼ | २१८ ॥⁼ |
| दक्षिण भारतीय पाठसे लिये गये | × | × | × |
स्वर्गारोहणपर्वकी कुल श्लोकसंख्या — २१८ ॥⁼
श्रीमहाभारतं सम्पूर्णम्
* श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासके द्वारा प्रकट होनेके कारण 'कृष्णादागतः कार्ष्णः' इस व्युत्पत्तिके अनुसार यह उपाख्यान 'कार्ष्णवेद' के नामसे प्रसिद्ध है।