भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 2542, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 2542

गिरयः सागरा नद्यस्तथैवाप्सरसां गणाः । ग्रहाः संवत्सराश्चैव अयनान्यृतवस्तथा ॥ ८ ॥ स्थावरं जङ्गमं चैव जगत् सर्वं सुरासुरम् । भारते भरतश्रेष्ठ एकस्थमिह दृश्यते ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! यहाँ महाभारतमें रुद्र, साध्य, सनातन विश्वेदेव, सूर्य, अश्विनीकुमार, लोकपाल, महर्षि, गुह्यक, गन्धर्व, नाग, विद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू ब्रह्मा, श्रेष्ठ मुनि कात्यायन, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, अप्सराओंके समुदाय, ग्रह, संवत्सर, अयन, ऋतु, सम्पूर्ण चराचर जगत्, देवता और असुर—ये सब-के-सब एकत्र हुए देखे जाते हैं ॥ ६—९ ॥ तेषां श्रुत्वा प्रतिष्ठानं नामकर्मानुकीर्तनात् । कृत्वापि पातकं घोरं सद्यो मुच्येत मानवः ॥ १० ॥ मनुष्य घोर पातक करनेपर भी उन सबकी प्रतिष्ठा सुनकर तथा प्रतिदिन उनके नाम और कर्मोंका कीर्तन करता हुआ उससे तत्काल मुक्त हो जाता है ॥ १० ॥ इतिहासमिमं श्रुत्वा यथावदनुपूर्वशः । संयतात्मा शुचिर्भूत्वा पारं गत्वा च भारते ॥ ११ ॥ तेषां श्राद्धानि देयानि श्रुत्वा भारत भारतम् । ब्राह्मणेभ्यो यथाशक्त्या भक्त्या च भरतर्षभ ॥ १२ ॥ महादानानि देयानि रत्नानि विविधानि च । मनुष्य अपने मनको संयममें रखते हुए बाहर-भीतरसे शुद्ध हो महाभारतमें वर्णित इस इतिहासको क्रमशः यथावत् रूपसे सुनकर इसे समाप्त करनेके पश्चात् इनमें मारे गये प्रमुख वीरोंके लिये श्राद्ध करे। भारत! भरतभूषण! महाभारत सुनकर श्रोता अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे नाना प्रकारके रत्न आदि बड़े-बड़े दान दे ॥ ११-१२ १/२ ॥ गावः कांस्योपदोहाश्च कन्याश्चैव स्वलंकृताः ॥ १३ ॥ सर्वकामगुणोपेता यानानि विविधानि च । भवनानि विचित्राणि भूमिर्वासांसि काञ्चनम् ॥ १४ ॥ वाहनानि च देयानि हया मत्ताश्च वारणाः । शयनं शिबिकाश्चैव स्यन्दनाश्च स्वलंकृताः ॥ १५ ॥ यद् यद् गृहे वरं किंचिद् यद् यदस्ति महत् वसु । तत् तद् देयं द्विजातिभ्य आत्मा दाराश्च सूनवः ॥ १६ ॥ गौएँ, काँसीके दुग्धपात्र, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और सम्पूर्ण मनोवाञ्छित गुणोंसे युक्त कन्याएँ, नाना प्रकारके यान, विचित्र भवन, भूमि, वस्त्र, सुवर्ण, वाहन, घोड़े, मतवाले हाथी, शय्या, शिबिकाएँ, सजे-सजाये रथ तथा घरमें जो कोई भी श्रेष्ठ वस्तु और महान् धन हो, वह सब ब्राह्मणोंको देने चाहिये। स्त्री-पुत्रोंसहित अपने शरीरको भी उनकी सेवामें लगा देना चाहिये ॥