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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

गिरयः सागरा नद्यस्तथैवाप्सरसां गणाः । ग्रहाः संवत्सराश्चैव अयनान्यृतवस्तथा ॥ ८ ॥ स्थावरं जङ्गमं चैव जगत् सर्वं सुरासुरम् । भारते भरतश्रेष्ठ एकस्थमिह दृश्यते ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! यहाँ महाभारतमें रुद्र, साध्य, सनातन विश्वेदेव, सूर्य, अश्विनीकुमार, लोकपाल, महर्षि, गुह्यक, गन्धर्व, नाग, विद्याधर, सिद्ध, धर्म, स्वयम्भू ब्रह्मा, श्रेष्ठ मुनि कात्यायन, पर्वत, समुद्र, नदियाँ, अप्सराओंके समुदाय, ग्रह, संवत्सर, अयन, ऋतु, सम्पूर्ण चराचर जगत्, देवता और असुर—ये सब-के-सब एकत्र हुए देखे जाते हैं ॥ ६—९ ॥ तेषां श्रुत्वा प्रतिष्ठानं नामकर्मानुकीर्तनात् । कृत्वापि पातकं घोरं सद्यो मुच्येत मानवः ॥ १० ॥ मनुष्य घोर पातक करनेपर भी उन सबकी प्रतिष्ठा सुनकर तथा प्रतिदिन उनके नाम और कर्मोंका कीर्तन करता हुआ उससे तत्काल मुक्त हो जाता है ॥ १० ॥ इतिहासमिमं श्रुत्वा यथावदनुपूर्वशः । संयतात्मा शुचिर्भूत्वा पारं गत्वा च भारते ॥ ११ ॥ तेषां श्राद्धानि देयानि श्रुत्वा भारत भारतम् । ब्राह्मणेभ्यो यथाशक्त्या भक्त्या च भरतर्षभ ॥ १२ ॥ महादानानि देयानि रत्नानि विविधानि च । मनुष्य अपने मनको संयममें रखते हुए बाहर-भीतरसे शुद्ध हो महाभारतमें वर्णित इस इतिहासको क्रमशः यथावत् रूपसे सुनकर इसे समाप्त करनेके पश्चात् इनमें मारे गये प्रमुख वीरोंके लिये श्राद्ध करे। भारत! भरतभूषण! महाभारत सुनकर श्रोता अपनी शक्तिके अनुसार ब्राह्मणोंको भक्तिभावसे नाना प्रकारके रत्न आदि बड़े-बड़े दान दे ॥ ११-१२ १/२ ॥ गावः कांस्योपदोहाश्च कन्याश्चैव स्वलंकृताः ॥ १३ ॥ सर्वकामगुणोपेता यानानि विविधानि च । भवनानि विचित्राणि भूमिर्वासांसि काञ्चनम् ॥ १४ ॥ वाहनानि च देयानि हया मत्ताश्च वारणाः । शयनं शिबिकाश्चैव स्यन्दनाश्च स्वलंकृताः ॥ १५ ॥ यद् यद् गृहे वरं किंचिद् यद् यदस्ति महत् वसु । तत् तद् देयं द्विजातिभ्य आत्मा दाराश्च सूनवः ॥ १६ ॥ गौएँ, काँसीके दुग्धपात्र, वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और सम्पूर्ण मनोवाञ्छित गुणोंसे युक्त कन्याएँ, नाना प्रकारके यान, विचित्र भवन, भूमि, वस्त्र, सुवर्ण, वाहन, घोड़े, मतवाले हाथी, शय्या, शिबिकाएँ, सजे-सजाये रथ तथा घरमें जो कोई भी श्रेष्ठ वस्तु और महान् धन हो, वह सब ब्राह्मणोंको देने चाहिये। स्त्री-पुत्रोंसहित अपने शरीरको भी उनकी सेवामें लगा देना चाहिये ॥

श्रद्धया परया युक्तं क्रमशस्तस्य पारगः । शक्तितः सुमना हृष्टः शुश्रूषुरविकल्पकः ॥ १७ ॥ पूर्ण श्रद्धाके साथ क्रमशः कथा सुनते हुए उसे अन्ततक पूर्णरूपसे श्रवण करना चाहिये। यथाशक्ति श्रवणके लिये उद्यत रहकर मनको प्रसन्न रखे। हृदयमें हर्षसे उल्लसित हो मनमें संशय या तर्क-वितर्क न करे ॥

सत्यार्जवरतो दान्तः शुचिः शौचसमन्वितः । श्रद्दधानो जितक्रोधो यथा सिध्यति तच्छृणु ॥ १८ ॥ सत्य और सरलताके सेवनमें संलग्न रहे। इन्द्रियोंका दमन करे, शुद्ध एवं शौचाचारसे सम्पन्न रहे। श्रद्धालु बना रहे और क्रोधको काबूमें रखे। ऐसे श्रोताको जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त होती है, वह बताता हूँ; सुनो ॥ १८ ॥

शुचिः शीलान्विताचारः शुक्लवासा जितेन्द्रियः । संस्कृतः सर्वशास्त्रज्ञः श्रद्दधानोऽनसूयकः ॥ १९ ॥ रूपवान् सुभगो दान्तः सत्यवादी जितेन्द्रियः । दानमानगृहीतश्च कार्यो भवति वाचकः ॥ २० ॥ जो बाहर-भीतरसे पवित्र, शीलवान्, सदाचारी, शुद्ध वस्त्र धारण करनेवाला, जितेन्द्रिय, संस्कारसम्पन्न, सम्पूर्ण शास्त्रोंका तत्त्वज्ञ, श्रद्धालु, दोषदृष्टिसे रहित, रूपवान्, सौभाग्यशाली, मनको वशमें रखनेवाला, सत्यवादी और जितेन्द्रिय हो, ऐसे विद्वान् पुरुषको दान और मानसे अनुगृहीत करके वाचक बनाना चाहिये ॥ १९-२० ॥

अविलम्बमनायस्तमद्रुतं धीरमूर्जितम् । असंसक्ताक्षरपदं स्वरभावसमन्वितम् ॥ २१ ॥ कथावाचकको न तो बहुत रुक-रुककर कथा बाँचनी चाहिये और न बहुत जल्दी ही। आरामके साथ धीरगतिसे अक्षरों और पदोंका स्पष्ट उच्चारण करते हुए उच्चस्वरसे कथा बाँचनी चाहिये। मीठे स्वरसे भावार्थ समझाकर कथा कहनी चाहिये ॥ २१ ॥

त्रिषष्टिवर्णसंयुक्तमष्टस्थानसमीरितम् । वाचयेद् वाचकः स्वस्थः स्वासीनः सुसमाहितः ॥ २२ ॥ तिरसठ अक्षरोंका उनके आठों स्थानोंसे ठीक-ठीक उच्चारण करे। कथा सुनाते समय वाचकके लिये स्वस्थ और एकाग्रचित्त होना आवश्यक है। उसके लिये आसन ऐसा होना चाहिये जिसपर वह सुखपूर्वक बैठ सके ॥ २२ ॥

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ २३ ॥ अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, (उनके नित्य सखा) नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन

करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ॥ २३ ॥ ईदृशाद् वाचकाद् राजन् श्रुत्वा भारत भारतम् । नियमस्थः शुचिः श्रोता शृण्वन् स फलमश्नुते ॥ २४ ॥ राजन्! भरतनन्दन! नियमपरायण पवित्र श्रोता ऐसे वाचकसे महाभारतकी कथा सुनकर श्रवणका पूरा-पूरा फल पाता है ॥ २४ ॥ पारणं प्रथमं प्राप्य द्विजान् कामैश्च तर्पयन् । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं वै लभते नरः ॥ २५ ॥ अप्सरोगणसंकीर्णं विमानं लभते महत् । प्रहृष्टः स तु देवैश्च दिवं याति समाहितः ॥ २६ ॥ जो मनुष्य प्रथम पारणके समय ब्राह्मणोंको अभीष्ट वस्तुएँ देकर तृप्त करता है वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है। उसे अप्सराओंसे भरा हुआ विमान प्राप्त होता है और वह प्रसन्नतापूर्वक एकाग्रचित्त हो देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २५-२६ ॥ द्वितीयं पारणं प्राप्य सोऽतिरात्रफलं लभेत् । सर्वरत्नमयं दिव्यं विमानमधिरोहति ॥ २७ ॥ जो मनुष्य दूसरा पारण पूरा करता है उसे अतिरात्र यज्ञका फल मिलता है। वह सर्वरत्नमय दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है ॥ २७ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धविभूषितः । दिव्याङ्गदधरो नित्यं देवलोके महीयते ॥ २८ ॥ वह दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करता, दिव्य चन्दनसे चर्चित एवं दिव्य सुगन्धसे वासित होता और दिव्य अंगद धारण करके सदा देवलोकमें सम्मानित होता है ॥ २८ ॥ तृतीयं पारणं प्राप्य द्वादशाहफलं लभेत् । वसत्यमरसंकाशो वर्षाण्ययुतशो दिवि ॥ २९ ॥ तीसरा पारण पूरा करनेपर मनुष्य द्वादशाहयज्ञका फल पाता है और देवताओंके तुल्य तेजस्वी होकर हजारों वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है ॥ २९ ॥ चतुर्थे वाजपेयस्य पञ्चमे द्विगुणं फलम् । उदितादित्यसंकाशं ज्वलन्तमनलोपमम् ॥ ३० ॥ विमानं विबुधैः सार्धमारुह्य दिवि गच्छति । वर्षायुतानि भवने शक्रस्य दिवि मोदते ॥ ३१ ॥ चौथे पारणमें वाजपेय-यज्ञका और पाँचवेंमें उससे दूना फल प्राप्त होता है। वह पुरुष उदयकालके सूर्य तथा प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी विमानपर आरूढ़ हो देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है और वहाँ इन्द्रभवनमें दस हजार वर्षोंतक आनन्द भोगता है ॥

षष्ठे द्विगुणमस्तीति सप्तमे त्रिगुणं फलम् ।

कैलासशिखराकारं वैदूर्यमणिवेदिकम् ।। ३२ ।।

परिक्षिप्तं च बहुधा मणिविद्रुमभूषितम् ।

विमानं समधिष्ठाय कामगं साप्सरोगणम् ।। ३३ ।।

सर्वांल्लोकान् विचरते द्वितीय इव भास्करः ।

छठे पारणमें इससे दूना और सातवेंमें तिगुना फल मिलता है। वह मनुष्य अप्सराओंसे

भरे हुए और इच्छानुसार चलनेवाले, कैलासशिखरकी भाँति उज्ज्वल, वैदूर्यमणिकी

वेदियोंसे विभूषित, नाना प्रकारसे सुसज्जित तथा मणियों और मूँगोंसे अलंकृत विमानपर

बैठकर दूसरे सूर्यकी भाँति सम्पूर्ण लोकोंमें विचरता है ।। ३२-३३ १/२ ।।

अष्टमे राजसूयस्य पारणे लभते फलम् ।। ३४ ।।

चन्द्रोदयनिभं रम्यं विमानमधिरोहति ।

चन्द्ररश्मिप्रतीकाशैर्हयैर्युक्तं मनोजवैः ।। ३५ ।।

आठवें पारणमें मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। वह मनके समान वेगशाली और

चन्द्रमाकी किरणोंके समान रंगवाले श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए चन्द्रोदयतुल्य रमणीय विमानपर

आरूढ़ होता है ।। ३४-३५ ।।

सेव्यमानो वरस्त्रीणां चन्द्रात् कान्ततरैर्मुखैः ।

मेखलानां निनादेन नूपुराणां च निःस्वनैः ।। ३६ ।।

अङ्के परमनारीणां सुखसुप्तो विबुध्यते ।

चन्द्रमासे भी अधिक कमनीय मुखोंद्वारा सुशोभित होनेवाली सुन्दरी दिव्याङ्गनाएँ

उसकी सेवामें रहती हैं तथा सुरसुन्दरियोंके अंकमें सुखसे सोया हुआ वह पुरुष उन्हींकी

मेखलाओंके खन-खन शब्दों और नूपुरोंकी मधुर झनकारोंसे जगाया जाता है ।। ३६ १/२ ।।

नवमे क्रतुराजस्य वाजिमेधस्य भारत ।। ३७ ।।

काञ्चनस्तम्भनिर्यूहवैदूर्यकृतवेदिकम् ।

जाम्बूनदमयैर्दिव्यैर्गवाक्षैः सर्वतो वृतम् ।। ३८ ।।

सेवितं चाप्सरः सङ्घैर्गन्धर्वैर्दिविचारिभिः ।

विमानं समधिष्ठाय श्रिया परमया ज्वलन् ।। ३९ ।।

दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यचन्दनरूषितः ।

मोदते दैवतैः सार्धं दिवि देव इवापरः ।। ४० ।।

भारत! नवाँ पारण पूर्ण होनेपर श्रोताको यज्ञोंके राजा अश्वमेधका फल प्राप्त होता है।

वह सोनेके खंभों और छज्जोंसे सुशोभित, वैदूर्यमणिकी बनी हुई वेदियोंसे विभूषित, चारों

ओरसे जाम्बूनदमय दिव्य वातायनोंसे अलंकृत, स्वर्गवासी गन्धर्वों एवं अप्सराओंसे सेवित

दिव्य विमानपर आरूढ़ हो अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होता हुआ स्वर्गमें दूसरे

देवताकी भाँति देवताओंके साथ आनन्द भोगता है। उसके अंगोंमें दिव्य माला एवं दिव्य वस्त्र शोभा पाते हैं तथा वह दिव्य चन्दनसे चर्चित होता है ॥ ३७—४० ॥

दशमं पारणं प्राप्य द्विजातीनभिवन्द्य च ।
किंकिणीजालनिर्घोषं पताकाध्वजशोभितम् ॥ ४१ ॥
रत्नवेदिकसम्बार्धं वैदूर्यमणितोरणम् ।
हेमजालपरिक्षिप्तं प्रवालवलभीमुखम् ॥ ४२ ॥
गन्धर्वैर्गीतकुशलैरप्सरोभिश्च शोभितम् ।
विमानं सुकृतावासं सुखेनैवोपपद्यते ॥ ४३ ॥

दसवाँ पारण पूरा होनेपर ब्राह्मणोंको प्रणाम करनेके पश्चात् श्रोताको पुण्यनिकेतन विमान अनायास ही प्राप्त हो जाता है। उसमें छोटी-छोटी घंटियोंसे युक्त झालरें लगी होती हैं और उनसे मधुर ध्वनि फैलती रहती है। बहुत-सी ध्वजा-पताकाएँ उस विमानकी शोभा बढ़ाती हैं। उनमें जगह-जगह रत्नमय चबूतरे बने होते हैं। वैदूर्य-मणिका बना हुआ फाटक लगा होता है। सब ओरसे सोनेकी जालीद्वारा वह विमान घिरा होता है। उसके छज्जोंके नीचे मूँगे जड़े होते हैं। संगीतकुशल गन्धर्वों और अप्सराओंसे उस विमानकी शोभा और बढ़ जाती है ॥

मुकुटेनाग्निवर्णेन जाम्बूनदविभूषिणा ।
दिव्यचन्दनदिग्धाङ्गो दिव्यमाल्यविभूषितः ॥ ४४ ॥
दिव्याँल्लोकान् विचरति दिव्यैर्भोगैः समन्वितः ।
विबुधानां प्रसादेन श्रिया परमया युतः ॥ ४५ ॥

उसपर बैठा हुआ पुण्यात्मा पुरुष अग्नितुल्य तेजस्वी मुकुटसे अलंकृत तथा जाम्बूनदके आभूषणोंसे विभूषित होता है। उसका शरीर दिव्य चन्दनसे चर्चित तथा दिव्य मालाओंसे विभूषित होता है। दिव्य भोगोंसे सम्पन्न हो वह दिव्य लोकोंमें विचरता है और देवताओंकी कृपासे उत्कृष्ट शोभा-सम्पत्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ४४-४५ ॥

अथ वर्षगणानेवं स्वर्गलोके महीयते ।
ततो गन्धर्वसहितः सहस्राण्येकविंशतिम् ॥ ४६ ॥
पुरन्दरपुरे रम्ये शक्रेण सह मोदते ।

इस प्रकार बहुत वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक रहता है। तदनन्तर इक्कीस हजार वर्षोंतक गन्धर्वोंके साथ इन्द्रकी रमणीय नगरीमें रहकर देवेन्द्रके साथ ही वहाँका सुख भोगता है ॥ ४६ १/२ ॥

दिव्ययानविमानेषु लोकेषु विविधेषु च ॥ ४७ ॥
दिव्यनारीगणाकीर्णो निवसत्यमरो यथा ।

दिव्य रथों और विमानोंपर आरूढ़ हो नाना प्रकारके लोकोंमें विचरता और दिव्य नारियोंसे घिरा हुआ देवताकी भाँति वहाँ निवास करता है ॥ ४७ १/२ ॥

ततः सूर्यस्य भवने चन्द्रस्य भवने तथा ॥ ४८ ॥ शिवस्य भवने राजन् विष्णोर्याति सलोकताम् । राजन्! इसके बाद वह सूर्य, चन्द्रमा, शिव तथा भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥ ४८ ½ ॥ एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा ॥ ४९ ॥ श्रद्दधानेन वै भाव्यमेवमाह गुरुर्मम । महाराज! ठीक ऐसी ही बात है। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरे गुरुका कथन है कि महाभारतकी इस महिमा और फलपर श्रद्धा रखनी चाहिये ॥ ४९ ½ ॥ वाचकस्य तु दातव्यं मनसा यद् यदिच्छति ॥ ५० ॥ हस्त्यश्वरथयानानि वाहनानि विशेषतः । वाचकको उसके मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा हो वह सब देनी चाहिये। हाथी, घोड़े, रथ, पालकी तथा दूसरे-दूसरे वाहन विशेषरूपसे देने चाहिये ॥ ५० ½ ॥ कटके कुण्डले चैव ब्रह्मसूत्रं तथा परम् ॥ ५१ ॥ वस्त्रं चैव विचित्रं च गन्धं चैव विशेषतः । देववत् पूजयेत् तं तु विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥ ५२ ॥ कड़े, कुण्डल, यज्ञोपवीत, विचित्र वस्त्र और विशेषतः गन्ध अर्पित करके वाचककी देवताके समान पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला श्रोता भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥ ५१-५२ ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि यानि देयानि भारते । वाच्यमाने तु विप्रेभ्यो राजन् पर्वणि पर्वणि ॥ ५३ ॥ जातिं देशं च सत्यं च माहात्म्यं भरतर्षभ । धर्मं वृत्तिं च विज्ञाय क्षत्रियाणां नराधिप ॥ ५४ ॥ राजन्! भरतश्रेष्ठ! महाभारतकी कथा प्रारम्भ हो जानेपर प्रत्येक पर्वमें क्षत्रियोंकी जाति, देश, सत्यता, माहात्म्य, धर्म और वृत्तिको जानकर ब्राह्मणोंको जो-जो वस्तुएँ अर्पित करनी चाहिये, अब उनका वर्णन करूँगा ॥ ५३-५४ ॥ स्वस्ति वाच्य द्विजानादौ ततः कार्ये प्रवर्तिते । समाप्ते पर्वणि ततः स्वशक्त्या पूजयेद् द्विजान् ॥ ५५ ॥ पहले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर कथावाचनका कार्य प्रारम्भ कराये। फिर पर्व समाप्त होनेपर अपनी शक्तिके अनुसार उन ब्राह्मणोंकी पूजा करे ॥ ५५ ॥ आदौ तु वाचकं चैव वस्त्रगन्धसमन्वितम् । विधिवद् भोजयेद् राजन् मधु पायसमुत्तमम् ॥ ५६ ॥

राजन्! आदिपर्वकी कथाके समय वाचकको नूतन वस्त्र पहनाकर चन्दन आदिसे उसकी पूजा करे और विधिपूर्वक उसे मीठी एवं उत्तम खीर भोजन कराये ।। ५६ ।।
ततो मूलफलप्रायं पायसं मधुसर्पिषा ।
आस्तीके भोजयेद् राजन् दद्याच्चैव गुडौदनम् ।। ५७ ।।
राजन्! तत्पश्चात् आस्तीकपर्वकी कथाके समय ब्राह्मणोंको मधु और घीसे युक्त खीर भोजन कराये। उस भोजनमें फल-मूलकी अधिकता होनी चाहिये। फिर गुड़ और भात दान करे ।। ५७ ।।
अपूपैश्चैव पूपैश्च मोदकैश्च समन्वितम् ।
सभापर्वणि राजेन्द्र हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ।। ५८ ।।
राजेन्द्र! सभापर्व आरम्भ होनेपर ब्राह्मणोंको पूओं, कचौड़ियों और मिठाइयोंके साथ खीर भोजन कराये ।।
आरण्यके मूलफलैस्तर्पयेत्तु द्विजोत्तमान् ।
अरणीपर्व चासाद्य जलकुम्भान् प्रदापयेत् ।। ५९ ।।
वनपर्वमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको फल-मूलोंद्वारा तृप्त करे। अरणीपर्वमें पहुँचकर जलसे भरे हुए घड़ोंका दान करे ।। ५९ ।।
तर्पणानि च मुख्यानि वन्यमूलफलानि च ।
सर्वकामगुणोपेतं विप्रेभ्योऽन्नं प्रदापयेत् ।। ६० ।।
इतना ही नहीं, जिनको खानेसे तृप्ति हो सके, ऐसे उत्तम-उत्तम जंगली मूल-फल और सभी अभीष्ट गुणोंसे सम्पन्न अन्न ब्राह्मणोंको दान करे ।। ६० ।।
विराटपर्वणि तथा वासांसि विविधानि च ।
उद्योगे भरतश्रेष्ठ सर्वकामगुणान्वितम् ।। ६१ ।।
भोजनं भोजयेद् विप्रान् गन्धमाल्यैरलंकृतान् ।
भरतश्रेष्ठ! विराटपर्वमें भाँति-भाँतिके वस्त्र दान करे तथा उद्योगपर्वमें ब्राह्मणोंको चन्दन और फूलोंकी मालासे अलंकृत करके उन्हें सर्वगुणसम्पन्न अन्न भोजन कराये ।। ६१ ½ ।।
भीष्मपर्वणि राजेन्द्र दत्त्वा यानमनुत्तमम् ।। ६२ ।।
ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात् सुसंस्कृतम् ।
राजेन्द्र! भीष्मपर्वमें उत्तम सवारी देकर अच्छी तरह छौंक-बघारकर तैयार किया हुआ सभी उत्तम गुणोंसे युक्त भोजन दान करे ।। ६२ ½ ।।
द्रोणपर्वणि विप्रेभ्यो भोजनं परमार्चितम् ।। ६३ ।।
शरांश्च देया राजेन्द्र चापान्यसिवरांस्तथा ।
राजेन्द्र! द्रोणपर्वमें ब्राह्मणोंको परम उत्तम भोजन कराये और उन्हें धनुष, बाण तथा उत्तम खड्ग प्रदान करे ।। ६३ ½ ।।

कर्णपर्वण्यपि तथा भोजनं सार्वकामिकम् ।। ६४ ।।
विप्रेभ्यः संस्कृतं सम्यग् दद्यात् संयतमानसः ।
कर्णपर्वमें भी ब्राह्मणोंको अच्छे ढंगसे तैयार किया हुआ सबकी रुचिके अनुकूल उत्तम भोजन दे और अपने मनको वशमें रखे ।। ६४ १/२ ।।

शल्यपर्वणि राजेन्द्र मोदकैः सगुडौदनैः ।। ६५ ।।
अपूपैस्तर्पणैश्चैव सर्वमन्नं प्रदापयेत् ।
राजेन्द्र! शल्यपर्वमें मिठाई, गुड़, भात, पूआ तथा तृप्तिकारक फल आदिके साथ सब प्रकारके उत्तम अन्न दान करे ।। ६५ १/२ ।।

गदापर्वण्यपि तथा मुद्ग‌मिश्रं प्रदापयेत् ।। ६६ ।।
स्त्रीपर्वणि तथा रत्नैस्तर्पयेत्तु द्विजोत्तमान् ।
गदापर्वमें भी मूँग मिलाये हुए चावलका दान करे। स्त्रीपर्वमें रत्नोंद्वारा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त करे ।।

घृतौदनं पुरस्ताच्च ऐषीके दापयेत् पुनः ।। ६७ ।।
ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात् सुसंस्कृतम् ।
ऐषीकपर्वमें पहले घी मिलाया हुआ भात जिमाये। फिर अच्छी तरह संस्कार किये हुए सर्वगुणसम्पन्न अन्नका दान करे ।। ६७ १/२ ।।

शान्तिपर्वण्यपि तथा हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ।। ६८ ।।
आश्वमेधिकमासाद्य भोजनं सार्वकामिकम् ।
शान्तिपर्वमें भी ब्राह्मणोंको हविष्य भोजन कराये। आश्वमेधिकपर्वमें पहुँचनेपर सबकी रुचिके अनुकूल उत्तम भोजन दे ।। ६८ १/२ ।।

तथाऽऽश्रमनिवासे तु हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ।। ६९ ।।
मौसले सार्वगुणीकं गन्धमाल्यानुलेपनम् ।
आश्रमवासिकपर्वमें ब्राह्मणोंको हविष्य भोजन कराये। मौसलपर्वमें सर्वगुणसम्पन्न अन्न, चन्दन, माला और अनुलेपनका दान करे ।। ६९ १/२ ।।

महाप्रस्थानिके तद्वत् सर्वकामगुणान्वितम् ।। ७० ।।
स्वर्गपर्वण्यपि तथा हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ।
इसी प्रकार महाप्रस्थानिकपर्वमें भी समस्त वाञ्छनीय गुणोंसे युक्त अन्न आदिका दान करे। स्वर्गारोहणपर्वमें भी ब्राह्मणोंको हविष्य खिलाये ।। ७० १/२ ।।

हरिवंशसमाप्तौ तु सहस्रं भोजयेद् द्विजान् ।। ७१ ।।
गामेकां निष्कसंयुक्तां ब्राह्मणाय निवेदयेत् ।
हरिवंशकी समाप्ति होनेपर एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराये तथा स्वर्णमुद्रासहित एक गौ ब्राह्मणको दान दे ।। ७१ १/२ ।।

तदर्धेनापि दातव्या दरिद्रेणापि पार्थिव ।। ७२ ।।
प्रतिपर्वसमाप्तौ तु पुस्तकं वै विचक्षणः ।
सुवर्णेन च संयुक्तं वाचकाय निवेदयेत् ।। ७३ ।।
पृथ्वीनाथ! यदि श्रोता दरिद्र हो तो उसे भी आधी दक्षिणाके साथ गोदान अवश्य करना चाहिये। प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर विद्वान् पुरुष सुवर्णसहित पुस्तक वाचकको समर्पित करे ।। ७२-७३ ।।

हरिवंशे पर्वणि च पायसं तत्र भोजयेत् ।
पारणे पारणे राजन् यथावद् भरतर्षभ ।। ७४ ।।
राजन्! भरतश्रेष्ठ! हरिवंशपर्वमें भी प्रत्येक पारणके समय ब्राह्मणोंको यथावत् रूपसे खीर भोजन कराये ।।

समाप्य सर्वाः प्रयतः संहिताः शास्त्रकोविदः ।
शुभे देशे निवेश्याथ क्षौमवस्त्राभिसंवृताः ।। ७५ ।।
शुक्लाम्बरधरः स्रग्वी शुचिर्भूत्वा स्वलंकृतः ।
अर्चयेत यथान्यायं गन्धमाल्यैः पृथक् पृथक् ।। ७६ ।।
संहितापुस्तकान् राजन् प्रयतः सुसमाहितः ।
भक्ष्यैर्माल्यैश्च पेयैश्च कामैश्च विविधैः शुभैः ।। ७७ ।।
इस प्रकार एकाग्रचित्त हो सब पर्वोंकी संहिताओंको समाप्त करके शास्त्रवेत्ता पुरुषको चाहिये कि वह उन्हें रेशमी वस्त्रोंमें लपेटकर किसी उत्तम स्थानमें रखे और स्वयं स्नान आदिसे पवित्र हो श्वेत वस्त्र, फूलकी माला तथा आभूषण धारण करके चन्दन-माला आदि उपचारोंसे उन संहिता-पुस्तककी पृथक्-पृथक् विधिवत् पूजा करे। पूजाके समय चित्तको एकाग्र एवं शुद्ध रखे। भाँति-भाँतिके उत्तम भक्ष्य, भोजन, पेय, माल्य तथा अन्य कमनीय वस्तुएँ भेंटके रूपमें चढ़ाये ।। ७५—७७ ।।

हिरण्यं च सुवर्णं च दक्षिणामथ दापयेत् ।
सर्वत्र त्रिपलं स्वर्णं दातव्यं प्रयतात्मना ।। ७८ ।।
इसके बाद हिरण्य एवं सुवर्णकी दक्षिणा दे। मनको वशमें रखकर सभी पुस्तकोंपर तीन-तीन पल सोना चढ़ाना चाहिये ।। ७८ ।।

तदर्धं पादशेषं वा वित्तशाठ्यविवर्जितम् ।
यद् यदेवात्मनोऽभीष्टं तत् तद् देयं द्विजातये ।। ७९ ।।
इतना न हो सके तो सबपर डेढ़-डेढ़ पल सोना चढ़ाये और यह भी सम्भव न हो तो पौन-पौन पल चढ़ाये; परंतु धन रहते हुए कंजूसी नहीं करनी चाहिये। जो-जो वस्तु अपनेको प्रिय लगती हो वही-वही ब्राह्मणको दानमें देनी चाहिये ।। ७९ ।।

सर्वथा तोषयेद् भक्त्या वाचकं गुरुमात्मनः ।
देवताः कीर्तयेत् सर्वा नरनारायणौ तथा ।। ८० ।।

कथावाचक अपना गुरु होता है, अतः उसके प्रति भक्तिभाव रखते हुए उसे सर्वथा संतुष्ट करना चाहिये। उस समय सम्पूर्ण देवताओं तथा भगवान् नर-नारायणका कीर्तन करना चाहिये ।। ८० ।।

ततो गन्धैश्च माल्यैश्च स्वलंकृत्य द्विजोत्तमान् ।
तर्पयेद् विविधैः कामैर्दानैश्चोच्चावचैस्तथा ।। ८१ ।।
तदनन्तर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको चन्दन और माला आदिसे विभूषित करके उन्हें नाना प्रकारकी मनोवाञ्छित वस्तुएँ और भाँति-भाँतिके छोटे-बड़े आवश्यक पदार्थ देकर संतुष्ट करे ।। ८१ ।।

अतिरात्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।
प्राप्नुयाच्च ऋतुफलं तथा पर्वणि पर्वणि ।। ८२ ।।
ऐसा करनेसे मनुष्यको अतिरात्र यज्ञका फल मिलता है तथा प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर ब्राह्मणकी पूजा करनेसे श्रौत यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। ८२ ।।

वाचको भरतश्रेष्ठ व्यक्ताक्षरपदस्वरः ।
भविष्यं श्रावयेद् विद्वान् भारतं भरतर्षभ ।। ८३ ।।
भरतश्रेष्ठ! कथावाचकको विद्वान् होना चाहिये और प्रत्येक अक्षर, पद तथा स्वरका सुस्पष्ट उच्चारण करते हुए उसे महाभारत या हरिवंशके भविष्यपर्वकी कथा सुनानी चाहिये ।। ८३ ।।

भुक्तवत्सु द्विजेन्द्रेषु यथावत् सम्प्रदापयेत् ।
वाचकं भरतश्रेष्ठ भोजयित्वा स्वलंकृतम् ।। ८४ ।।
भरतभूषण! सम्पूर्ण कथाकी समाप्ति होनेके बाद श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके भोजन कर लेनेपर उन्हें यथोचित दान देना चाहिये। फिर वाचकको भी वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत करके उत्तम अन्न भोजन कराना चाहिये। इसके बाद उसे दान-मानसे संतुष्ट करना उचित है ।। ८४ ।।

वाचके परितुष्टे तु शुभा प्रीतिरुत्तमा ।
ब्राह्मणेषु तु तुष्टेषु प्रसन्नाः सर्वदेवताः ।। ८५ ।।
कथावाचकके संतुष्ट होनेपर ही परम उत्तम एवं मंगलमयी प्रीति प्राप्त होती है। ब्राह्मणोंके संतुष्ट होनेपर श्रोताके ऊपर समस्त देवता प्रसन्न होते हैं ।। ८५ ।।

ततो हि वरणं कार्यं द्विजानां भरतर्षभ ।
सर्वकामैर्यथान्यायं साधुभिश्च पृथग्विधैः ।। ८६ ।।
इसलिये भरतश्रेष्ठ! साधुस्वभावके श्रोताओंको चाहिये कि वे न्यायपूर्वक ब्राह्मणोंका वरण करें तथा उनकी विभिन्न प्रकारकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण करते हुए उनका यथोचित पूजन करें ।। ८६ ।।

इत्येष विधिरुद्दिष्टो मया ते द्विपदां वर ।
श्रद्दधानेन वै भाव्यं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।। ८७ ।।

मनुष्योंमें श्रेष्ठ नरेश्वर! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे थे, उसके अनुसार यह मैंने महाभारतके सुनने तथा उसका पारायण करनेकी विधि बतलायी है। तुम्हें इसपर श्रद्धा करनी चाहिये ॥ ८७ ॥

भारतश्रवणे राजन् पारणे च नृपोत्तम।
सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता ॥ ८८ ॥
राजन्! नृपश्रेष्ठ! अपने परम कल्याणकी इच्छा रखनेवाले श्रोताको महाभारतको सुनने तथा इसका पारायण करनेके लिये सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥

भारतं शृणुयान्नित्यं भारतं परिकीर्तयेत्।
भारतं भवने यस्य तस्य हस्तगतो जयः ॥ ८९ ॥
प्रतिदिन महाभारत सुने। नित्यप्रति महाभारतका पाठ करे। जिसके घरमें महाभारत ग्रन्थ मौजूद है, विजय उसके हाथमें है ॥ ८९ ॥

भारतं परमं पुण्यं भारते विविधाः कथाः।
भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परमं पदम् ॥ ९० ॥
महाभारत परम पवित्र ग्रन्थ है। इसमें नाना प्रकारकी कथाएँ हैं। देवता भी महाभारतका सेवन करते हैं। महाभारत परमपदस्वरूप है ॥ ९० ॥

भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ।
भारतात् प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद् ब्रवीमि तत् ॥ ९१ ॥
भरतश्रेष्ठ! महाभारत सम्पूर्ण शास्त्रोंमें उत्तम है। महाभारतसे मोक्ष प्राप्त होता है। यह मैं तुमसे सच्ची बात बता रहा हूँ ॥ ९१ ॥

महाभारतमाख्यानं क्षितिं गां च सरस्वतीम्।
ब्राह्मणान् केशवं चैव कीर्तयन् नावसीदति ॥ ९२ ॥
महाभारत नामक इतिहास, पृथ्वी, गौ, सरस्वती, ब्राह्मण और भगवान् श्रीकृष्णका कीर्तन करनेवाला मनुष्य कभी विपत्तिमें नहीं पड़ता ॥ ९२ ॥

वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ।
आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥ ९३ ॥
भरतश्रेष्ठ! वेद, रामायण तथा पवित्र महाभारतके आदि, मध्य एवं अन्तमें सर्वत्र भगवान् श्रीहरिका ही गान किया जाता है ॥ ९३ ॥

यत्र विष्णुकथा दिव्याः श्रुतयश्च सनातनाः।
तत् श्रोतव्यं मनुष्येण परं पदमिहेच्छता ॥ ९४ ॥
जहाँ भगवान् विष्णुकी दिव्य कथाओं तथा सनातन श्रुतियोंका समावेश है उस महाभारतका इस जगत्में परमपदकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको अवश्य श्रवण करना चाहिये ॥ ९४ ॥

एतत् पवित्रं परममेतद् धर्मनिदर्शनम्।

एतत् सर्वगुणोपेतं श्रोतव्यं भूतिमिच्छता ॥ ९५ ॥
यह महाभारत परम पवित्र है। यह धर्मके स्वरूपका साक्षात्कार करानेवाला है तथा यह समस्त उत्तम गुणोंसे सम्पन्न है। अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको इसका श्रवण अवश्य करना चाहिये ॥ ९५ ॥

कायिकं वाचिकं चैव मनसा समुपार्जितम् ।
तत् सर्वं नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा ॥ ९६ ॥
महाभारतके श्रवणसे शरीर, वाणी और मनके द्वारा सञ्चित किये हुए सारे पाप वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार ॥ ९६ ॥

अष्टादशपुराणानां श्रवणाद् यत् फलं भवेत् ।
तत् फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ॥ ९७ ॥
अठारह पुराणोंके सुननेसे जो फल होता है वह सारा फल वैष्णव पुरुषको अकेले महाभारतके श्रवणसे मिल जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ९७ ॥

स्त्रियश्च पुरुषाश्चैव वैष्णवं पदमाप्नुयुः ।
स्त्रीभिश्च पुत्रकामाभिः श्रोतव्यं वैष्णवं यशः ॥ ९८ ॥
स्त्रियाँ हों या पुरुष, सभी इसके श्रवणसे भगवान् विष्णुके धामको चले जाते हैं। पुत्रकी कामना रखनेवाली स्त्रियोंको भगवान् विष्णुके यशस्वरूप इस महाभारतका श्रवण अवश्य करना चाहिये ॥ ९८ ॥

दक्षिणा चात्र देया वै निष्कपञ्चसुवर्णकम् ।
वाचकाय यथाशक्त्या यथोक्तं फलमिच्छता ॥ ९९ ॥
शास्त्रोक्त फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह महाभारत-श्रवणके पश्चात् वाचकको यथाशक्ति सोनेके पाँच सिक्के दक्षिणाके रूपमें दान करे ॥ ९९ ॥

स्वर्णशृङ्गीं च कपिलां सवत्सां वस्त्रसंवृताम् ।
वाचकाय च दद्याद्धि आत्मनः श्रेय इच्छता ॥ १०० ॥
अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको उचित है कि वह कपिला गौके सींगोंमें सोना मढ़ाकर उसे वस्त्रसे आच्छादित करके बछड़ेसहित वाचकको दान दे ॥ १०० ॥

अलङ्कारं प्रदद्याच्च पाण्योर्वै भरतर्षभ ।
कर्णस्याभरणं दद्याद् धनं चैव विशेषतः ॥ १०१ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसके सिवा कथावाचकके लिये दोनों हाथोंके कड़े, कानोंके कुण्डल और विशेषतः धन प्रदान करे ॥ १०१ ॥

भूमिदानं समादद्याद् वाचकाय नराधिप ।
भूमिदानसमं दानं न भूतं न भविष्यति ॥ १०२ ॥
नरेश्वर! वाचकके लिये भूमिदान तो अवश्य ही करना चाहिये; क्योंकि भूमिदानके समान दूसरा कोई दान न हुआ है, न होगा ॥ १०२ ॥

शृणोति श्रावयेद् वापि सततं चैव यो नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवं पदमाप्नुयात् ॥ १०३ ॥
जो मनुष्य सदा महाभारतको सुनता अथवा सुनाता रहता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके धामको जाता है ॥ १०३ ॥
पितॄनुद्धरते सर्वानैकादशसमुद्द्भवान् ।
आत्मानं ससुतं चैव स्त्रियं च भरतर्षभ ॥ १०४ ॥
भरतश्रेष्ठ! वह पुरुष अपनी ग्यारह पीढ़ीमें समस्त पितरोंका, अपना तथा अपनी स्त्री और पुत्रका भी उद्धार कर देता है ॥ १०४ ॥
दशांशश्चैव होमोऽपि कर्तव्योऽत्र नराधिप ।
इदं मया तवाग्रे च प्रोक्तं सर्वं नरर्षभ ॥ १०५ ॥
नरेश्वर! महाभारत सुननेके बाद उसके लिये दशांश होम भी करना आवश्यक है। नरश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष इन सब बातोंका विस्तारके साथ वर्णन कर दिया ॥ १०५ ॥

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां
हरिवंशोक्तभारतश्रवणविधावध्यायः समाप्तः ॥
इस प्रकार व्यासनिर्मित श्रीमहाभारत शतसाहस्री संहितामें हरिवंशोक्त
भारतश्रवणविधिविषयक अध्याय पूरा हुआ ॥

महाभारत-माहात्म्य

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महाभारत-माहात्म्य

पाराशर्यवचःसरोजममलं गीतार्थगन्धोत्कटं
नानाख्यानककेसरं हरिकथासंबोधनाबोधितम् ।
लोके सज्जनषट्पदैरहरहः पेपीयमानं मुदा
भूयाद् भारतपङ्कजं कलिमलप्रध्वंसि नः श्रेयसे ॥
पराशरके पुत्र महर्षि व्यासकी वाणीरूपी सरोवरमें उदित यह महाभारतरूपी अमल कमल जो गीतार्थरूपी तीव्र सुगन्धसे युक्त, नाना प्रकारके आख्यानरूपी केसरसे सम्पन्न तथा हरिकथारूपी सूर्यतापसे प्रफुल्लित है, सज्जनरूपी भ्रमर इस लोकमें जिसके रसका निरन्तर प्रमुदित होकर पान किया करते हैं और जो कलिकालके पापरूपी मलका नाश करनेवाला है, सदा हमारा कल्याण करनेवाला हो ।।
यत्र विष्णुकथा दिव्याः श्रुतयश्च सनातनाः।
तत् श्रोतव्यं मनुष्येण परं पदमिहेच्छता ॥
श्रूयतां सिंहनादोऽयमृषेस्तस्य महात्मनः ।
अष्टादशपुराणानां कर्तुर्वेदमहोदधेः ॥
जिसमें भगवान् विष्णुकी दिव्य कथाओंका वर्णन है और जिसमें कल्याणमयी श्रुतियोंका सार दिया गया है, इस लोकमें परमपदकी इच्छा करनेवाले मनुष्यको उस महाभारतका श्रवण करना चाहिये। अष्टादश पुराणोंके रचयिता और वेद (ज्ञान)-के महान् समुद्र महात्मा श्रीव्यासदेवका यह सिंहनाद है कि 'तुम नित्य महाभारतका श्रवण करो ।। '
धर्मशास्त्रमिदं पुण्यमर्थशास्त्रमिदं परम् ।
मोक्षशास्त्रमिदं प्रोक्तं व्यासेनामितबुद्धिना ॥
भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ ।
सम्प्रत्याचक्षते चेदं तथा श्रोष्यन्ति चापरे ॥
अपरिमितबुद्धि भगवान् व्यासदेवके द्वारा कथित यह महाभारत पवित्र धर्मशास्त्र है, श्रेष्ठ अर्थशास्त्र है और सर्वोत्तम मोक्षशास्त्र भी है। हे भरतश्रेष्ठ! महाभारत समस्त शास्त्रोंका शिरोमणि है, इसीसे सम्प्रति विद्वान् लोग इसका पठन-श्रवण करते हैं और आगे भी करेंगे ।।
योऽधीते भारतं पुण्यं ब्राह्मणो नियतव्रतः ।
चतुरो वार्षिकान् मासान् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
कुरूणां प्रथितं वंशं कीर्तयन् सततं शुचिः ।
वंशमाप्नोति विपुलं लोके पूज्यतमो भवेत् ॥

जो ब्राह्मण नियमित व्रतका पालन करता हुआ वर्षाऋतुके चार महीनोंमें पवित्र भारतका पाठ करता है वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो पुरुष शुद्ध होकर कुरुके प्रसिद्ध वंशका सदा कीर्तन करता है उसके वंशका विपुल विस्तार होता है; और लोकमें वह पूज्यतम बन जाता है ।।

अनागतश्च मोक्षश्च कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । संदर्भं भारतस्यास्य कृतवान् धर्मकाम्यया ।। धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ।। दीर्घदृष्टि तथा मोक्षरूप भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने केवल धर्मकी कामनासे ही इस महाभारतको रचा है। हे भरतर्षभ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके सम्बन्धमें जो कुछ इस (महाभारत)-में कहा गया है वही अन्य शास्त्रोंमें भी कहा गया है। जो इसमें नहीं कहा गया, वह कहीं नहीं कहा गया है ।।

एतत् पवित्रं परममेतद् धर्मनिदर्शनम् । एतत् सर्वगुणोपेतं श्रोतव्यं भूतिमिच्छता ।। कायिकं वाचिकं चैव मनसा समुपार्जितम् । तत् सर्वं नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा ।। यह महाभारत परम पवित्र है, धर्मके लिये प्रमाणरूप है, समस्त गुणोंसे सम्पन्न है; कल्याणकी इच्छा करनेवाले मनुष्यको इसे अवश्य सुनना चाहिये। क्योंकि, जैसे सूर्यके उदय होनेपर अन्धकारका नाश हो जाता है, वैसे ही इस महाभारतसे तन, वचन और मनसे किये हुए सब पाप नष्ट हो जाते हैं ।।

य इदं मानवो लोके पुण्यार्थे ब्राह्मणान् शुचीन् । श्रावयेत महापुण्यं तस्य धर्मः सनातनः ।। महाभारतमाख्यानं क्षितिं गां च सरस्वतीम् । ब्राह्मणान् केशवं चैव कीर्तयन्नावसीदति ।। जो मनुष्य महान् पवित्र इस इतिहासको पुण्यार्थ पवित्र ब्राह्मणोंको श्रवण कराता है वह सनातन धर्मको प्राप्त होता है। महाभारतके आख्यान, पृथ्वी, गौ, सरस्वती, ब्राह्मण तथा भगवान् केशव—इनका कीर्तन करनेवाला मनुष्य कभी दुखी नहीं होता ।।

शृणोति श्रावयेद् वापि सततं चैव यो नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवं पदमाप्नुयात् ।। पितॄनुद्धरते सर्वानैकादशसमुद्भवान् । आत्मानं ससुतं चैव स्त्रियं च भरतर्षभ ।। जो मनुष्य निरन्तर श्रीमहाभारत सुनता है या सुनाता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णु-पदको प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, वह पुरुष अपनी ग्यारह पीढ़ीके समस्त

पितरोंका तथा पुत्र और पत्नीसहित अपना भी उद्धार करता है ।। यथा समुद्रो भगवान् यथा मेरुर्महान् गिरिः । उभौ ख्यातौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते ।। न तां स्वर्गगतिं प्राप्य तुष्टिं प्राप्नोति मानवः । यां श्रुत्वैव महापुण्यमितिहासमुपाश्नुते ।। जैसे समुद्र तथा महापर्वत सुमेरु दोनों रत्ननिधिके नामसे विख्यात हैं, वैसे ही यह महाभारत भी रत्नोंका भंडार कहा गया है। मनुष्यको इस महान् पवित्र इतिहासके पढ़ने-सुननेसे जैसी तुष्टि प्राप्त होती है वैसी स्वर्गमें जानेसे भी नहीं प्राप्त होती ।। शरीरेण कृतं पापं वाचा च मनसैव च । सर्वं संत्यजति क्षिप्रं य इदं शृणुयान्नरः ।। भरतानां महज्जन्म शृण्वतामनसूयताम् । नास्ति व्याधिभयं तेषां परलोकभयं कुतः ।। जो मनुष्य इस महाभारतको पढ़ता-सुनता है, वह शरीर, वाणी तथा मनसे किये हुए सब पापोंका निःशेषरूपसे त्याग कर देता है। अर्थात् उसके ये सब पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य दोषबुद्धिका त्याग करके भरतवंशियोंके महान् जीवनकी बातोंको पढ़ते-सुनते हैं उनको यहाँ व्याधिका भी भय नहीं रहता, फिर परलोकका भय तो रहता ही कहाँसे? ।। इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् । श्राव्यं श्रुतिसुखं चैव पावनं शीलवर्धनम् ।। य इदं भारतं राजन् वाचकाय प्रयच्छति । तेन सर्वा मही दत्ता भवेत् सागरमेखला ।। यह महाभारत वेदसदृश (पंचम वेद) है, उत्तम है, साथ ही पवित्र भी है, श्रवण करने योग्य है, कानोंको सुख देनेवाला है, पवित्र शीलको बढ़ानेवाला है। अतएव हे राजन्! जो मनुष्य यह भारत ग्रन्थ पढ़नेवालेको दान करता है उसको समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीके दानका फल मिलता है ।। अष्टादश पुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वशः । वेदाः साङ्गास्तथैकत्र भारतं चैकतः स्थितम् ।। महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते । निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। अठारहों पुराण, समस्त धर्मशास्त्र, अंगोंसहित वेद—इन सबकी बराबरी अकेला महाभारत कर सकता है। क्योंकि यह ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण है और रहस्यरूपी असाधारण भारसे युक्त है, इसीसे इसे महाभारत कहा जाता है। जो पुरुष 'महाभारत' शब्दके इस अर्थको जानता है, वह सब पापोंसे छूट जाता है ।। जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो मोक्षमिच्छता ।

ब्राह्मणेन च राज्ञा च गर्भिण्या चैव योषिता ।। स्वर्गकामो लभेत् स्वर्गं जयकामो लभेज्जयम् । गर्भिणी लभते पुत्रं कन्यां वा बहुभागिनीम् ।। ‘जय’ नामक यह इतिहास मोक्षकी इच्छा रखनेवाले, ब्राह्मण, राजा और गर्भवती स्त्रियोंको तो अवश्य सुनना चाहिये। इसके सुननेसे स्वर्गकी इच्छा करनेवालेको स्वर्ग, जयकी इच्छावालेको जय और गर्भवती स्त्रीको पुत्र या बड़े भाग्यवाली कन्या प्राप्त होती है ।।

यो गोशतं कनकश्शृङ्गमयं ददाति विप्राय वेदविदुषे सुबहुश्रुताय । पुण्यां च भारतकथां सततं शृणोति तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव ।। वेदको जाननेवाले बहुश्रुत ब्राह्मणको कोई सुवर्णसे मँढ़े सींगोंवाली सौ गौदान दे, और दूसरा कोई निरन्तर महाभारतकी कथा सुने तो इन दोनोंको समान फलकी प्राप्ति होती है ।।

कार्ष्णं वेदमिमं सर्वं शृणुयाद् यः समाहितः । ब्रह्महत्यादिपापानां कोटिस्तस्य विनश्यति ।। पुत्राः शुश्रूषवः सन्ति प्रेष्याश्च प्रियकारिणः । भरतानां महज्जन्म महाभारतमुच्यते ।। व्यासदेवरचित इस (पञ्चम) वेदरूप महाभारतका जो समाहितचित्तसे आद्योपान्त श्रवण करता है, उसके ब्रह्महत्या आदि करोड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं। फिर, इस इतिहासको सुननेवाले पुत्र माता-पिताके सेवकोन्मुख, तथा सेवक अपने स्वामीका प्रिय कार्य करनेवाले बन जाते हैं। इसमें महान् भरतवंशियोंकी जीवन-कथाका वर्णन है, इससे भी इसको महाभारत कहते हैं ।।

देवा राजर्षयो ह्यात्र पुण्या ब्रह्मर्षयस्तथा । कीर्त्यन्ते धूतपाप्मानः कीर्त्यते केशवस्तथा ।। भगवांश्चापि देवेशो यत्र देवी च कीर्त्यते । अनेकजननो यत्र कार्तिकेयस्य सम्भवः ।। इस महाभारतमें पवित्र देवताओं, राजर्षियों और पुण्यस्वरूप ब्रह्मर्षियोंका वर्णन है; इसमें भगवान् केशवके चरित्रोंका कीर्तन है, इसमें भगवान् महादेव तथा देवी पार्वतीका वर्णन है। और इसमें अनेक माताओंवाले कार्तिकेयके जन्मका भी वर्णन है ।।

ब्राह्मणानां गवां चैव माहात्म्यं यत्र कीर्त्यते । सर्वं श्रुतिसमूहोऽयं श्रोतव्यो धर्मबुद्धिभिः ।। मुच्यते सर्वपापेभ्यो राहुणा चन्द्रमा यथा ।

जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो विजिगीषुणा ।।
फिर इस इतिहासमें ब्राह्मणों तथा गौओंका माहात्म्य बतलाया गया है। और यह समस्त श्रुतियोंका समूहरूप है। अतः धर्मबुद्धि मनुष्योंको इसे पढ़ना-सुनना चाहिये। विजयकी इच्छा करनेवालोंको यह ‘जय’ नामक इतिहास अवश्य सुनना चाहिये। इसके सुननेसे मनुष्य सब पापोंसे वैसे ही मुक्त हो जाता है जैसे राहुके ग्रहणसे चन्द्रमा मुक्त हो जाता है ।।
अस्मिन्नर्थश्च कामश्च निखिलेनोपदिश्यते ।
इतिहासे महापुण्ये बुद्धिश्च परिनैष्ठिकी ।।
भारतं शृणुयान्नित्यं भारतं परिकीर्तयेत् ।
भारतं भवने यस्य तस्य हस्तगतो जयः ।।
इस महान् पवित्र इतिहासमें अर्थ और कामका ऐसा सर्वांगपूर्ण उपदेश है कि जिससे इसे पढ़ने-सुननेवालेकी बुद्धि परमात्मामें परिनिष्ठित हो जाती है। अतएव महाभारतका श्रवण-कीर्तन सदा करना चाहिये। जिसके घर महाभारतका श्रवण-कीर्तन होता है उसके विजय तो हस्तगत ही है ।।
पुण्योऽयमितिहासाख्यः पवित्रं चेदमुत्तमम् ।
कृष्णेन मुनिना विप्रनिर्मितं सत्यवादिना ।।
सर्वज्ञेन विधिज्ञेन धर्मज्ञानवता सता ।
अतीन्द्रियेण शुचिना तपसा भावितात्मना ।।
ऐश्वर्ये वर्तता चैव सांख्ययोगवता तथा ।
नैकतन्त्रविबुद्धेन दृष्ट्वा दिव्येन चक्षुषा ।।
कीर्तिं प्रथयता लोके पाण्डवानां महात्मनाम् ।
अन्येषां क्षत्रियाणां च भूरिद्रविणतेजसाम् ।।
श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी सत्यवादी, सर्वज्ञ, शास्त्र-विधिके ज्ञाता, धर्मज्ञानयुक्त संत, अतीन्द्रियज्ञानी, पवित्र, तपस्याके द्वारा शुद्धचित्त, ऐश्वर्यवान्, सांख्ययोगी, योगनिष्ठ तथा अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता तथा दिव्यदृष्टिसम्पन्न हैं। उन्होंने अपनी दिव्यदृष्टिसे देखकर ही महात्मा पाण्डव तथा अन्यान्य महान् तेजस्वी एवं ऐश्वर्यशाली क्षत्रियोंकी कीर्तिको जगत्‌में प्रसिद्ध किया है। उन्हींने ‘इतिहास’ नामसे प्रसिद्ध इस पुण्यमय पवित्र महाभारतकी रचना की है, इसीसे यह ऐसा उत्तम हुआ है ।।
अष्टादशपुराणानां श्रवणाद् यत् फलं भवेत् ।
तत् फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ।।
स्त्रियश्च पुरुषाश्चैव वैष्णवं पदमाप्नुयुः ।
स्त्रीभिश्च पुत्रकामाभिः श्रोतव्यं वैष्णवं यशः ।।

अठारह पुराणोंके श्रवणसे जो फल होता है, वही फल महाभारतके श्रवणसे वैष्णवोंको प्राप्त होता है—इसमें संदेह नहीं है। स्त्री और पुरुष इस महाभारतके श्रवणसे वैष्णव पदको प्राप्त कर सकते हैं। पुत्रकी इच्छावाली स्त्रियोंको तो भगवान् विष्णुकी कीर्तिरूप महाभारत अवश्य सुनना चाहिये ।।

नरेण धर्मकामेन सर्वः श्रोतव्य इत्यपि ।
निखिलेनेतिहासोऽयं ततः सिद्धिमवाप्नुयात् ।।
शृण्वन् श्राद्धः पुण्यशीलः श्रावयँश्चेदमद्भुतम् ।
नरः फलमवाप्नोति राजसूयाश्वमेधयोः ।।
धर्मकी कामनावाले मनुष्यको यह सम्पूर्ण इतिहास सुनना चाहिये, इससे सिद्धिकी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य श्रद्धालुयुक्त और पुण्यस्वभाव होकर इस अद्भुत इतिहासका श्रवण करता है या कराता है, वह राजसूय और अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है ।।

त्रिभिर्वर्षैर्लब्धकामः कृष्णद्वैपायनो मुनिः ।
नित्योत्थितः शुचिः शक्तो महाभारतमादितः ।।
तपो नियममास्थाय कृतमेतन्महर्षिणा ।
तस्मान्नियमसंयुक्तैः श्रोतव्यं ब्राह्मणैरिदम् ।।
शक्तिशाली श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासदेव पवित्रताके साथ तीन वर्ष लगातार लगे रहकर इसकी प्रारम्भसे रचना करके पूर्णमनोरथ हुए थे। महर्षि व्यासने तप और नियम धारण करके इसकी रचना की थी। अतएव ब्राह्मणोंको भी नियमयुक्त होकर ही इसका श्रवण-कीर्तन करना चाहिये ।।

महीं विजयते राजा शत्रूंश्चापि पराजयेत् ।
इदं पुंसवनं श्रेष्ठमिदं स्वस्त्ययनं महत् ।।
महिषीयुवराजाभ्यां श्रोतव्यं बहुशस्तथा ।
वीरं जनयते पुत्रं कन्यां वा राज्यभागिनीम् ।।
इस इतिहासके सुननेसे राजा पृथ्वीपर विजय प्राप्त करता तथा शत्रुओंको पराजित करता है। उसे श्रेष्ठ पुत्रकी प्राप्ति और महान् कल्याण होता है। यह इतिहास राजरानियोंको अपने युवराजके साथ बार-बार सुनना चाहिये। इससे वीर पुत्रका जन्म होता है अथवा राज्यभागिनी कन्या होती है ।।

यश्चेदं श्रावयेद् विद्वान् सदा पर्वणि पर्वणि ।
धूतपाप्मा जितस्वर्गो ब्रह्मभूयाय कल्पते ।।
यश्चेदं श्रावयेत् श्राद्धे ब्राह्मणान् पादमन्ततः ।
अक्षय्यमन्नपानं वै पितृंस्तस्योपतिष्ठते ।।
जो विद्वान् पुरुष सदा प्रत्येक पर्वपर इसका श्रवण कराता है, वह पापरहित और स्वर्गविजयी होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है। जो पुरुष श्राद्धके अवसरपर ब्राह्मणोंको इसका

एक पाद भी श्रवण कराता है, उसके पितृगण अक्षय अन्नपानको प्राप्त करते हैं ।। इतिहासमिमं पुण्यं महार्थं वेदसम्मितम् । व्यासोक्तं श्रूयते येन कृत्वा ब्राह्मणमग्रतः ।। स नरः सर्वकामांश्च कीर्तिं प्राप्येह शौनक । गच्छेत् परमिकां सिद्धिमत्र मे नास्ति संशयः ।। हे शौनक! जो मनुष्य व्यासजीके द्वारा कथित महान् अर्थमय और वेदतुल्य इस पवित्र इतिहासका श्रेष्ठ ब्राह्मणके द्वारा श्रवण करता है, वह इस लोकमें सब मनोरथोंको और कीर्तिको प्राप्त करता है और अन्तमें परमसिद्धि मोक्षको प्राप्त होता है, इसमें संदेह नहीं है। श्रावयेद् ब्राह्मणान् श्राद्धे यश्चैनं पादमन्ततः । अक्षय्यं तस्य तत् श्राद्धमुपावर्तेत् पितॄनिह ।। भारतं परमं पुण्यं भारते विविधाः कथाः । भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परमं पदम् ।। जो मनुष्य श्राद्धके अन्तमें इसका कम-से-कम एक पाद भी ब्राह्मणोंको सुनाता है, उसका श्राद्ध उसके पितृगणको अक्षय होकर प्राप्त होता है। महाभारत परमपुण्यदायक है, इसमें विविध कथाएँ हैं, देवता भी महाभारतका सेवन करते हैं; क्योंकि महाभारतसे परम-पदकी प्राप्ति होती है ।। भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ । भारतात् प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद् ब्रवीमि तत् ।। एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा । श्रद्दधानेन वै भाव्यमेवमाह गुरुर्मम ।। हे भरतश्रेष्ठ! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि महाभारत सभी शास्त्रोंमें उत्तम है, और उसके श्रवण-कीर्तनसे मोक्षकी प्राप्ति होती है—यह मैं तुमसे यथार्थ कहता हूँ। हे महाराज! मैंने जो कुछ कहा है, वह ऐसा ही है; यहाँ कोई विचार-वितर्क नहीं करना है। मेरे गुरुने भी मुझसे यही कहा है कि महाभारतपर मनुष्यको श्रद्धावान् होना चाहिये ।। वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ । आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ।। भारतश्रवणे राजन् पारणे च नृपोत्तम । सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता ।। हे भरतर्षभ! वेद, रामायण और पवित्र महाभारत—इन सबमें आदि, मध्य और अन्तमें सर्वत्र श्रीहरिका ही कीर्तन किया गया है। अतः हे नृपश्रेष्ठ! उत्तम श्रेय—मोक्षकी इच्छा रखनेवाले प्रत्येक पुरुषको महाभारतका श्रवण और पारायण करनेमें सदा प्रयत्नवान् रहना चाहिये ।।