भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 2545

षष्ठे द्विगुणमस्तीति सप्तमे त्रिगुणं फलम् ।

कैलासशिखराकारं वैदूर्यमणिवेदिकम् ।। ३२ ।।

परिक्षिप्तं च बहुधा मणिविद्रुमभूषितम् ।

विमानं समधिष्ठाय कामगं साप्सरोगणम् ।। ३३ ।।

सर्वांल्लोकान् विचरते द्वितीय इव भास्करः ।

छठे पारणमें इससे दूना और सातवेंमें तिगुना फल मिलता है। वह मनुष्य अप्सराओंसे

भरे हुए और इच्छानुसार चलनेवाले, कैलासशिखरकी भाँति उज्ज्वल, वैदूर्यमणिकी

वेदियोंसे विभूषित, नाना प्रकारसे सुसज्जित तथा मणियों और मूँगोंसे अलंकृत विमानपर

बैठकर दूसरे सूर्यकी भाँति सम्पूर्ण लोकोंमें विचरता है ।। ३२-३३ १/२ ।।

अष्टमे राजसूयस्य पारणे लभते फलम् ।। ३४ ।।

चन्द्रोदयनिभं रम्यं विमानमधिरोहति ।

चन्द्ररश्मिप्रतीकाशैर्हयैर्युक्तं मनोजवैः ।। ३५ ।।

आठवें पारणमें मनुष्य राजसूय यज्ञका फल पाता है। वह मनके समान वेगशाली और

चन्द्रमाकी किरणोंके समान रंगवाले श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए चन्द्रोदयतुल्य रमणीय विमानपर

आरूढ़ होता है ।। ३४-३५ ।।

सेव्यमानो वरस्त्रीणां चन्द्रात् कान्ततरैर्मुखैः ।

मेखलानां निनादेन नूपुराणां च निःस्वनैः ।। ३६ ।।

अङ्के परमनारीणां सुखसुप्तो विबुध्यते ।

चन्द्रमासे भी अधिक कमनीय मुखोंद्वारा सुशोभित होनेवाली सुन्दरी दिव्याङ्गनाएँ

उसकी सेवामें रहती हैं तथा सुरसुन्दरियोंके अंकमें सुखसे सोया हुआ वह पुरुष उन्हींकी

मेखलाओंके खन-खन शब्दों और नूपुरोंकी मधुर झनकारोंसे जगाया जाता है ।। ३६ १/२ ।।

नवमे क्रतुराजस्य वाजिमेधस्य भारत ।। ३७ ।।

काञ्चनस्तम्भनिर्यूहवैदूर्यकृतवेदिकम् ।

जाम्बूनदमयैर्दिव्यैर्गवाक्षैः सर्वतो वृतम् ।। ३८ ।।

सेवितं चाप्सरः सङ्घैर्गन्धर्वैर्दिविचारिभिः ।

विमानं समधिष्ठाय श्रिया परमया ज्वलन् ।। ३९ ।।

दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यचन्दनरूषितः ।

मोदते दैवतैः सार्धं दिवि देव इवापरः ।। ४० ।।

भारत! नवाँ पारण पूर्ण होनेपर श्रोताको यज्ञोंके राजा अश्वमेधका फल प्राप्त होता है।

वह सोनेके खंभों और छज्जोंसे सुशोभित, वैदूर्यमणिकी बनी हुई वेदियोंसे विभूषित, चारों

ओरसे जाम्बूनदमय दिव्य वातायनोंसे अलंकृत, स्वर्गवासी गन्धर्वों एवं अप्सराओंसे सेवित

दिव्य विमानपर आरूढ़ हो अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होता हुआ स्वर्गमें दूसरे