महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2544, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ॥ २३ ॥ ईदृशाद् वाचकाद् राजन् श्रुत्वा भारत भारतम् । नियमस्थः शुचिः श्रोता शृण्वन् स फलमश्नुते ॥ २४ ॥ राजन्! भरतनन्दन! नियमपरायण पवित्र श्रोता ऐसे वाचकसे महाभारतकी कथा सुनकर श्रवणका पूरा-पूरा फल पाता है ॥ २४ ॥ पारणं प्रथमं प्राप्य द्विजान् कामैश्च तर्पयन् । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं वै लभते नरः ॥ २५ ॥ अप्सरोगणसंकीर्णं विमानं लभते महत् । प्रहृष्टः स तु देवैश्च दिवं याति समाहितः ॥ २६ ॥ जो मनुष्य प्रथम पारणके समय ब्राह्मणोंको अभीष्ट वस्तुएँ देकर तृप्त करता है वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है। उसे अप्सराओंसे भरा हुआ विमान प्राप्त होता है और वह प्रसन्नतापूर्वक एकाग्रचित्त हो देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २५-२६ ॥ द्वितीयं पारणं प्राप्य सोऽतिरात्रफलं लभेत् । सर्वरत्नमयं दिव्यं विमानमधिरोहति ॥ २७ ॥ जो मनुष्य दूसरा पारण पूरा करता है उसे अतिरात्र यज्ञका फल मिलता है। वह सर्वरत्नमय दिव्य विमानपर आरूढ़ होता है ॥ २७ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धविभूषितः । दिव्याङ्गदधरो नित्यं देवलोके महीयते ॥ २८ ॥ वह दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करता, दिव्य चन्दनसे चर्चित एवं दिव्य सुगन्धसे वासित होता और दिव्य अंगद धारण करके सदा देवलोकमें सम्मानित होता है ॥ २८ ॥ तृतीयं पारणं प्राप्य द्वादशाहफलं लभेत् । वसत्यमरसंकाशो वर्षाण्ययुतशो दिवि ॥ २९ ॥ तीसरा पारण पूरा करनेपर मनुष्य द्वादशाहयज्ञका फल पाता है और देवताओंके तुल्य तेजस्वी होकर हजारों वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है ॥ २९ ॥ चतुर्थे वाजपेयस्य पञ्चमे द्विगुणं फलम् । उदितादित्यसंकाशं ज्वलन्तमनलोपमम् ॥ ३० ॥ विमानं विबुधैः सार्धमारुह्य दिवि गच्छति । वर्षायुतानि भवने शक्रस्य दिवि मोदते ॥ ३१ ॥ चौथे पारणमें वाजपेय-यज्ञका और पाँचवेंमें उससे दूना फल प्राप्त होता है। वह पुरुष उदयकालके सूर्य तथा प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी विमानपर आरूढ़ हो देवताओंके साथ स्वर्गलोकमें जाता है और वहाँ इन्द्रभवनमें दस हजार वर्षोंतक आनन्द भोगता है ॥