महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजो ब्राह्मण नियमित व्रतका पालन करता हुआ वर्षाऋतुके चार महीनोंमें पवित्र भारतका पाठ करता है वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जो पुरुष शुद्ध होकर कुरुके प्रसिद्ध वंशका सदा कीर्तन करता है उसके वंशका विपुल विस्तार होता है; और लोकमें वह पूज्यतम बन जाता है ।।
अनागतश्च मोक्षश्च कृष्णद्वैपायनः प्रभुः । संदर्भं भारतस्यास्य कृतवान् धर्मकाम्यया ।। धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ । यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न कुत्रचित् ।। दीर्घदृष्टि तथा मोक्षरूप भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने केवल धर्मकी कामनासे ही इस महाभारतको रचा है। हे भरतर्षभ! धर्म, अर्थ, काम और मोक्षके सम्बन्धमें जो कुछ इस (महाभारत)-में कहा गया है वही अन्य शास्त्रोंमें भी कहा गया है। जो इसमें नहीं कहा गया, वह कहीं नहीं कहा गया है ।।
एतत् पवित्रं परममेतद् धर्मनिदर्शनम् । एतत् सर्वगुणोपेतं श्रोतव्यं भूतिमिच्छता ।। कायिकं वाचिकं चैव मनसा समुपार्जितम् । तत् सर्वं नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा ।। यह महाभारत परम पवित्र है, धर्मके लिये प्रमाणरूप है, समस्त गुणोंसे सम्पन्न है; कल्याणकी इच्छा करनेवाले मनुष्यको इसे अवश्य सुनना चाहिये। क्योंकि, जैसे सूर्यके उदय होनेपर अन्धकारका नाश हो जाता है, वैसे ही इस महाभारतसे तन, वचन और मनसे किये हुए सब पाप नष्ट हो जाते हैं ।।
य इदं मानवो लोके पुण्यार्थे ब्राह्मणान् शुचीन् । श्रावयेत महापुण्यं तस्य धर्मः सनातनः ।। महाभारतमाख्यानं क्षितिं गां च सरस्वतीम् । ब्राह्मणान् केशवं चैव कीर्तयन्नावसीदति ।। जो मनुष्य महान् पवित्र इस इतिहासको पुण्यार्थ पवित्र ब्राह्मणोंको श्रवण कराता है वह सनातन धर्मको प्राप्त होता है। महाभारतके आख्यान, पृथ्वी, गौ, सरस्वती, ब्राह्मण तथा भगवान् केशव—इनका कीर्तन करनेवाला मनुष्य कभी दुखी नहीं होता ।।
शृणोति श्रावयेद् वापि सततं चैव यो नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवं पदमाप्नुयात् ।। पितॄनुद्धरते सर्वानैकादशसमुद्भवान् । आत्मानं ससुतं चैव स्त्रियं च भरतर्षभ ।। जो मनुष्य निरन्तर श्रीमहाभारत सुनता है या सुनाता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर विष्णु-पदको प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, वह पुरुष अपनी ग्यारह पीढ़ीके समस्त