भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 2557

पितरोंका तथा पुत्र और पत्नीसहित अपना भी उद्धार करता है ।। यथा समुद्रो भगवान् यथा मेरुर्महान् गिरिः । उभौ ख्यातौ रत्ननिधी तथा भारतमुच्यते ।। न तां स्वर्गगतिं प्राप्य तुष्टिं प्राप्नोति मानवः । यां श्रुत्वैव महापुण्यमितिहासमुपाश्नुते ।। जैसे समुद्र तथा महापर्वत सुमेरु दोनों रत्ननिधिके नामसे विख्यात हैं, वैसे ही यह महाभारत भी रत्नोंका भंडार कहा गया है। मनुष्यको इस महान् पवित्र इतिहासके पढ़ने-सुननेसे जैसी तुष्टि प्राप्त होती है वैसी स्वर्गमें जानेसे भी नहीं प्राप्त होती ।। शरीरेण कृतं पापं वाचा च मनसैव च । सर्वं संत्यजति क्षिप्रं य इदं शृणुयान्नरः ।। भरतानां महज्जन्म शृण्वतामनसूयताम् । नास्ति व्याधिभयं तेषां परलोकभयं कुतः ।। जो मनुष्य इस महाभारतको पढ़ता-सुनता है, वह शरीर, वाणी तथा मनसे किये हुए सब पापोंका निःशेषरूपसे त्याग कर देता है। अर्थात् उसके ये सब पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य दोषबुद्धिका त्याग करके भरतवंशियोंके महान् जीवनकी बातोंको पढ़ते-सुनते हैं उनको यहाँ व्याधिका भी भय नहीं रहता, फिर परलोकका भय तो रहता ही कहाँसे? ।। इदं हि वेदैः समितं पवित्रमपि चोत्तमम् । श्राव्यं श्रुतिसुखं चैव पावनं शीलवर्धनम् ।। य इदं भारतं राजन् वाचकाय प्रयच्छति । तेन सर्वा मही दत्ता भवेत् सागरमेखला ।। यह महाभारत वेदसदृश (पंचम वेद) है, उत्तम है, साथ ही पवित्र भी है, श्रवण करने योग्य है, कानोंको सुख देनेवाला है, पवित्र शीलको बढ़ानेवाला है। अतएव हे राजन्! जो मनुष्य यह भारत ग्रन्थ पढ़नेवालेको दान करता है उसको समुद्रपर्यन्त सारी पृथ्वीके दानका फल मिलता है ।। अष्टादश पुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वशः । वेदाः साङ्गास्तथैकत्र भारतं चैकतः स्थितम् ।। महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते । निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। अठारहों पुराण, समस्त धर्मशास्त्र, अंगोंसहित वेद—इन सबकी बराबरी अकेला महाभारत कर सकता है। क्योंकि यह ग्रन्थ महत्त्वपूर्ण है और रहस्यरूपी असाधारण भारसे युक्त है, इसीसे इसे महाभारत कहा जाता है। जो पुरुष 'महाभारत' शब्दके इस अर्थको जानता है, वह सब पापोंसे छूट जाता है ।। जयो नामेतिहासोऽयं श्रोतव्यो मोक्षमिच्छता ।