महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2548, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! आदिपर्वकी कथाके समय वाचकको नूतन वस्त्र पहनाकर चन्दन आदिसे उसकी पूजा करे और विधिपूर्वक उसे मीठी एवं उत्तम खीर भोजन कराये ।। ५६ ।।
ततो मूलफलप्रायं पायसं मधुसर्पिषा ।
आस्तीके भोजयेद् राजन् दद्याच्चैव गुडौदनम् ।। ५७ ।।
राजन्! तत्पश्चात् आस्तीकपर्वकी कथाके समय ब्राह्मणोंको मधु और घीसे युक्त खीर भोजन कराये। उस भोजनमें फल-मूलकी अधिकता होनी चाहिये। फिर गुड़ और भात दान करे ।। ५७ ।।
अपूपैश्चैव पूपैश्च मोदकैश्च समन्वितम् ।
सभापर्वणि राजेन्द्र हविष्यं भोजयेद् द्विजान् ।। ५८ ।।
राजेन्द्र! सभापर्व आरम्भ होनेपर ब्राह्मणोंको पूओं, कचौड़ियों और मिठाइयोंके साथ खीर भोजन कराये ।।
आरण्यके मूलफलैस्तर्पयेत्तु द्विजोत्तमान् ।
अरणीपर्व चासाद्य जलकुम्भान् प्रदापयेत् ।। ५९ ।।
वनपर्वमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको फल-मूलोंद्वारा तृप्त करे। अरणीपर्वमें पहुँचकर जलसे भरे हुए घड़ोंका दान करे ।। ५९ ।।
तर्पणानि च मुख्यानि वन्यमूलफलानि च ।
सर्वकामगुणोपेतं विप्रेभ्योऽन्नं प्रदापयेत् ।। ६० ।।
इतना ही नहीं, जिनको खानेसे तृप्ति हो सके, ऐसे उत्तम-उत्तम जंगली मूल-फल और सभी अभीष्ट गुणोंसे सम्पन्न अन्न ब्राह्मणोंको दान करे ।। ६० ।।
विराटपर्वणि तथा वासांसि विविधानि च ।
उद्योगे भरतश्रेष्ठ सर्वकामगुणान्वितम् ।। ६१ ।।
भोजनं भोजयेद् विप्रान् गन्धमाल्यैरलंकृतान् ।
भरतश्रेष्ठ! विराटपर्वमें भाँति-भाँतिके वस्त्र दान करे तथा उद्योगपर्वमें ब्राह्मणोंको चन्दन और फूलोंकी मालासे अलंकृत करके उन्हें सर्वगुणसम्पन्न अन्न भोजन कराये ।। ६१ ½ ।।
भीष्मपर्वणि राजेन्द्र दत्त्वा यानमनुत्तमम् ।। ६२ ।।
ततः सर्वगुणोपेतमन्नं दद्यात् सुसंस्कृतम् ।
राजेन्द्र! भीष्मपर्वमें उत्तम सवारी देकर अच्छी तरह छौंक-बघारकर तैयार किया हुआ सभी उत्तम गुणोंसे युक्त भोजन दान करे ।। ६२ ½ ।।
द्रोणपर्वणि विप्रेभ्यो भोजनं परमार्चितम् ।। ६३ ।।
शरांश्च देया राजेन्द्र चापान्यसिवरांस्तथा ।
राजेन्द्र! द्रोणपर्वमें ब्राह्मणोंको परम उत्तम भोजन कराये और उन्हें धनुष, बाण तथा उत्तम खड्ग प्रदान करे ।। ६३ ½ ।।