महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततः सूर्यस्य भवने चन्द्रस्य भवने तथा ॥ ४८ ॥ शिवस्य भवने राजन् विष्णोर्याति सलोकताम् । राजन्! इसके बाद वह सूर्य, चन्द्रमा, शिव तथा भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥ ४८ ½ ॥ एवमेतन्महाराज नात्र कार्या विचारणा ॥ ४९ ॥ श्रद्दधानेन वै भाव्यमेवमाह गुरुर्मम । महाराज! ठीक ऐसी ही बात है। इस विषयमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। मेरे गुरुका कथन है कि महाभारतकी इस महिमा और फलपर श्रद्धा रखनी चाहिये ॥ ४९ ½ ॥ वाचकस्य तु दातव्यं मनसा यद् यदिच्छति ॥ ५० ॥ हस्त्यश्वरथयानानि वाहनानि विशेषतः । वाचकको उसके मनमें जिस-जिस वस्तुकी इच्छा हो वह सब देनी चाहिये। हाथी, घोड़े, रथ, पालकी तथा दूसरे-दूसरे वाहन विशेषरूपसे देने चाहिये ॥ ५० ½ ॥ कटके कुण्डले चैव ब्रह्मसूत्रं तथा परम् ॥ ५१ ॥ वस्त्रं चैव विचित्रं च गन्धं चैव विशेषतः । देववत् पूजयेत् तं तु विष्णुलोकमवाप्नुयात् ॥ ५२ ॥ कड़े, कुण्डल, यज्ञोपवीत, विचित्र वस्त्र और विशेषतः गन्ध अर्पित करके वाचककी देवताके समान पूजा करनी चाहिये। ऐसा करनेवाला श्रोता भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है ॥ ५१-५२ ॥ अतः परं प्रवक्ष्यामि यानि देयानि भारते । वाच्यमाने तु विप्रेभ्यो राजन् पर्वणि पर्वणि ॥ ५३ ॥ जातिं देशं च सत्यं च माहात्म्यं भरतर्षभ । धर्मं वृत्तिं च विज्ञाय क्षत्रियाणां नराधिप ॥ ५४ ॥ राजन्! भरतश्रेष्ठ! महाभारतकी कथा प्रारम्भ हो जानेपर प्रत्येक पर्वमें क्षत्रियोंकी जाति, देश, सत्यता, माहात्म्य, धर्म और वृत्तिको जानकर ब्राह्मणोंको जो-जो वस्तुएँ अर्पित करनी चाहिये, अब उनका वर्णन करूँगा ॥ ५३-५४ ॥ स्वस्ति वाच्य द्विजानादौ ततः कार्ये प्रवर्तिते । समाप्ते पर्वणि ततः स्वशक्त्या पूजयेद् द्विजान् ॥ ५५ ॥ पहले ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर कथावाचनका कार्य प्रारम्भ कराये। फिर पर्व समाप्त होनेपर अपनी शक्तिके अनुसार उन ब्राह्मणोंकी पूजा करे ॥ ५५ ॥ आदौ तु वाचकं चैव वस्त्रगन्धसमन्वितम् । विधिवद् भोजयेद् राजन् मधु पायसमुत्तमम् ॥ ५६ ॥