महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2550, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतदर्धेनापि दातव्या दरिद्रेणापि पार्थिव ।। ७२ ।।
प्रतिपर्वसमाप्तौ तु पुस्तकं वै विचक्षणः ।
सुवर्णेन च संयुक्तं वाचकाय निवेदयेत् ।। ७३ ।।
पृथ्वीनाथ! यदि श्रोता दरिद्र हो तो उसे भी आधी दक्षिणाके साथ गोदान अवश्य करना चाहिये। प्रत्येक पर्वकी समाप्तिपर विद्वान् पुरुष सुवर्णसहित पुस्तक वाचकको समर्पित करे ।। ७२-७३ ।।
हरिवंशे पर्वणि च पायसं तत्र भोजयेत् ।
पारणे पारणे राजन् यथावद् भरतर्षभ ।। ७४ ।।
राजन्! भरतश्रेष्ठ! हरिवंशपर्वमें भी प्रत्येक पारणके समय ब्राह्मणोंको यथावत् रूपसे खीर भोजन कराये ।।
समाप्य सर्वाः प्रयतः संहिताः शास्त्रकोविदः ।
शुभे देशे निवेश्याथ क्षौमवस्त्राभिसंवृताः ।। ७५ ।।
शुक्लाम्बरधरः स्रग्वी शुचिर्भूत्वा स्वलंकृतः ।
अर्चयेत यथान्यायं गन्धमाल्यैः पृथक् पृथक् ।। ७६ ।।
संहितापुस्तकान् राजन् प्रयतः सुसमाहितः ।
भक्ष्यैर्माल्यैश्च पेयैश्च कामैश्च विविधैः शुभैः ।। ७७ ।।
इस प्रकार एकाग्रचित्त हो सब पर्वोंकी संहिताओंको समाप्त करके शास्त्रवेत्ता पुरुषको चाहिये कि वह उन्हें रेशमी वस्त्रोंमें लपेटकर किसी उत्तम स्थानमें रखे और स्वयं स्नान आदिसे पवित्र हो श्वेत वस्त्र, फूलकी माला तथा आभूषण धारण करके चन्दन-माला आदि उपचारोंसे उन संहिता-पुस्तककी पृथक्-पृथक् विधिवत् पूजा करे। पूजाके समय चित्तको एकाग्र एवं शुद्ध रखे। भाँति-भाँतिके उत्तम भक्ष्य, भोजन, पेय, माल्य तथा अन्य कमनीय वस्तुएँ भेंटके रूपमें चढ़ाये ।। ७५—७७ ।।
हिरण्यं च सुवर्णं च दक्षिणामथ दापयेत् ।
सर्वत्र त्रिपलं स्वर्णं दातव्यं प्रयतात्मना ।। ७८ ।।
इसके बाद हिरण्य एवं सुवर्णकी दक्षिणा दे। मनको वशमें रखकर सभी पुस्तकोंपर तीन-तीन पल सोना चढ़ाना चाहिये ।। ७८ ।।
तदर्धं पादशेषं वा वित्तशाठ्यविवर्जितम् ।
यद् यदेवात्मनोऽभीष्टं तत् तद् देयं द्विजातये ।। ७९ ।।
इतना न हो सके तो सबपर डेढ़-डेढ़ पल सोना चढ़ाये और यह भी सम्भव न हो तो पौन-पौन पल चढ़ाये; परंतु धन रहते हुए कंजूसी नहीं करनी चाहिये। जो-जो वस्तु अपनेको प्रिय लगती हो वही-वही ब्राह्मणको दानमें देनी चाहिये ।। ७९ ।।
सर्वथा तोषयेद् भक्त्या वाचकं गुरुमात्मनः ।
देवताः कीर्तयेत् सर्वा नरनारायणौ तथा ।। ८० ।।