महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2553, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंएतत् सर्वगुणोपेतं श्रोतव्यं भूतिमिच्छता ॥ ९५ ॥
यह महाभारत परम पवित्र है। यह धर्मके स्वरूपका साक्षात्कार करानेवाला है तथा यह समस्त उत्तम गुणोंसे सम्पन्न है। अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको इसका श्रवण अवश्य करना चाहिये ॥ ९५ ॥
कायिकं वाचिकं चैव मनसा समुपार्जितम् ।
तत् सर्वं नाशमायाति तमः सूर्योदये यथा ॥ ९६ ॥
महाभारतके श्रवणसे शरीर, वाणी और मनके द्वारा सञ्चित किये हुए सारे पाप वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार ॥ ९६ ॥
अष्टादशपुराणानां श्रवणाद् यत् फलं भवेत् ।
तत् फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ॥ ९७ ॥
अठारह पुराणोंके सुननेसे जो फल होता है वह सारा फल वैष्णव पुरुषको अकेले महाभारतके श्रवणसे मिल जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ९७ ॥
स्त्रियश्च पुरुषाश्चैव वैष्णवं पदमाप्नुयुः ।
स्त्रीभिश्च पुत्रकामाभिः श्रोतव्यं वैष्णवं यशः ॥ ९८ ॥
स्त्रियाँ हों या पुरुष, सभी इसके श्रवणसे भगवान् विष्णुके धामको चले जाते हैं। पुत्रकी कामना रखनेवाली स्त्रियोंको भगवान् विष्णुके यशस्वरूप इस महाभारतका श्रवण अवश्य करना चाहिये ॥ ९८ ॥
दक्षिणा चात्र देया वै निष्कपञ्चसुवर्णकम् ।
वाचकाय यथाशक्त्या यथोक्तं फलमिच्छता ॥ ९९ ॥
शास्त्रोक्त फलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह महाभारत-श्रवणके पश्चात् वाचकको यथाशक्ति सोनेके पाँच सिक्के दक्षिणाके रूपमें दान करे ॥ ९९ ॥
स्वर्णशृङ्गीं च कपिलां सवत्सां वस्त्रसंवृताम् ।
वाचकाय च दद्याद्धि आत्मनः श्रेय इच्छता ॥ १०० ॥
अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको उचित है कि वह कपिला गौके सींगोंमें सोना मढ़ाकर उसे वस्त्रसे आच्छादित करके बछड़ेसहित वाचकको दान दे ॥ १०० ॥
अलङ्कारं प्रदद्याच्च पाण्योर्वै भरतर्षभ ।
कर्णस्याभरणं दद्याद् धनं चैव विशेषतः ॥ १०१ ॥
भरतश्रेष्ठ! इसके सिवा कथावाचकके लिये दोनों हाथोंके कड़े, कानोंके कुण्डल और विशेषतः धन प्रदान करे ॥ १०१ ॥
भूमिदानं समादद्याद् वाचकाय नराधिप ।
भूमिदानसमं दानं न भूतं न भविष्यति ॥ १०२ ॥
नरेश्वर! वाचकके लिये भूमिदान तो अवश्य ही करना चाहिये; क्योंकि भूमिदानके समान दूसरा कोई दान न हुआ है, न होगा ॥ १०२ ॥