महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनुष्योंमें श्रेष्ठ नरेश्वर! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे थे, उसके अनुसार यह मैंने महाभारतके सुनने तथा उसका पारायण करनेकी विधि बतलायी है। तुम्हें इसपर श्रद्धा करनी चाहिये ॥ ८७ ॥
भारतश्रवणे राजन् पारणे च नृपोत्तम।
सदा यत्नवता भाव्यं श्रेयस्तु परमिच्छता ॥ ८८ ॥
राजन्! नृपश्रेष्ठ! अपने परम कल्याणकी इच्छा रखनेवाले श्रोताको महाभारतको सुनने तथा इसका पारायण करनेके लिये सदा प्रयत्नशील रहना चाहिये ॥
भारतं शृणुयान्नित्यं भारतं परिकीर्तयेत्।
भारतं भवने यस्य तस्य हस्तगतो जयः ॥ ८९ ॥
प्रतिदिन महाभारत सुने। नित्यप्रति महाभारतका पाठ करे। जिसके घरमें महाभारत ग्रन्थ मौजूद है, विजय उसके हाथमें है ॥ ८९ ॥
भारतं परमं पुण्यं भारते विविधाः कथाः।
भारतं सेव्यते देवैर्भारतं परमं पदम् ॥ ९० ॥
महाभारत परम पवित्र ग्रन्थ है। इसमें नाना प्रकारकी कथाएँ हैं। देवता भी महाभारतका सेवन करते हैं। महाभारत परमपदस्वरूप है ॥ ९० ॥
भारतं सर्वशास्त्राणामुत्तमं भरतर्षभ।
भारतात् प्राप्यते मोक्षस्तत्त्वमेतद् ब्रवीमि तत् ॥ ९१ ॥
भरतश्रेष्ठ! महाभारत सम्पूर्ण शास्त्रोंमें उत्तम है। महाभारतसे मोक्ष प्राप्त होता है। यह मैं तुमसे सच्ची बात बता रहा हूँ ॥ ९१ ॥
महाभारतमाख्यानं क्षितिं गां च सरस्वतीम्।
ब्राह्मणान् केशवं चैव कीर्तयन् नावसीदति ॥ ९२ ॥
महाभारत नामक इतिहास, पृथ्वी, गौ, सरस्वती, ब्राह्मण और भगवान् श्रीकृष्णका कीर्तन करनेवाला मनुष्य कभी विपत्तिमें नहीं पड़ता ॥ ९२ ॥
वेदे रामायणे पुण्ये भारते भरतर्षभ।
आदौ चान्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ॥ ९३ ॥
भरतश्रेष्ठ! वेद, रामायण तथा पवित्र महाभारतके आदि, मध्य एवं अन्तमें सर्वत्र भगवान् श्रीहरिका ही गान किया जाता है ॥ ९३ ॥
यत्र विष्णुकथा दिव्याः श्रुतयश्च सनातनाः।
तत् श्रोतव्यं मनुष्येण परं पदमिहेच्छता ॥ ९४ ॥
जहाँ भगवान् विष्णुकी दिव्य कथाओं तथा सनातन श्रुतियोंका समावेश है उस महाभारतका इस जगत्में परमपदकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको अवश्य श्रवण करना चाहिये ॥ ९४ ॥
एतत् पवित्रं परममेतद् धर्मनिदर्शनम्।