भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 2554

शृणोति श्रावयेद् वापि सततं चैव यो नरः ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो वैष्णवं पदमाप्नुयात् ॥ १०३ ॥
जो मनुष्य सदा महाभारतको सुनता अथवा सुनाता रहता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवान् विष्णुके धामको जाता है ॥ १०३ ॥
पितॄनुद्धरते सर्वानैकादशसमुद्द्भवान् ।
आत्मानं ससुतं चैव स्त्रियं च भरतर्षभ ॥ १०४ ॥
भरतश्रेष्ठ! वह पुरुष अपनी ग्यारह पीढ़ीमें समस्त पितरोंका, अपना तथा अपनी स्त्री और पुत्रका भी उद्धार कर देता है ॥ १०४ ॥
दशांशश्चैव होमोऽपि कर्तव्योऽत्र नराधिप ।
इदं मया तवाग्रे च प्रोक्तं सर्वं नरर्षभ ॥ १०५ ॥
नरेश्वर! महाभारत सुननेके बाद उसके लिये दशांश होम भी करना आवश्यक है। नरश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने तुम्हारे समक्ष इन सब बातोंका विस्तारके साथ वर्णन कर दिया ॥ १०५ ॥

इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यां
हरिवंशोक्तभारतश्रवणविधावध्यायः समाप्तः ॥
इस प्रकार व्यासनिर्मित श्रीमहाभारत शतसाहस्री संहितामें हरिवंशोक्त
भारतश्रवणविधिविषयक अध्याय पूरा हुआ ॥