भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 264

७९६ बहुमालः—बहुत-सी मालाएँ धारण करनेवाले, ७९७ महामालः—महती—पैरोंतक लटकनेवाली माला धारण करनेवाले, ७९८ शशी हरसुलोचनः—चन्द्रमाके समान सौम्य दृष्टियुक्त महादेव, ७९९ विस्तारो लवणः कूपः—विस्तृत क्षारसमुद्रस्वरूप, ८०० त्रियुगः—सत्ययुग, त्रेता और द्वापर त्रिविध युगस्वरूप, ८०१ सफलोदयः—जिसका अवताररूपमें प्रकट होना सफल है ॥ १२७ ॥

त्रिलोचनो विषण्णाङ्गो मणिविद्धो जटाधरः ।
बिन्दुर्विसर्गः सुमुखः शरः सर्वायुधः सहः ॥ १२८ ॥
८०२ त्रिलोचनः—त्रिनेत्रधारी, ८०३ विषण्णाङ्गः—अंगरहित अर्थात् सर्वथा निराकार, ८०४ मणिविद्धः—मणिका कुण्डल पहननेके लिये छिदे हुए कर्णवाले, ८०५ जटाधरः—जटाधारी, ८०६ बिन्दुः—अनुस्वाररूप, ८०७ विसर्गः—विसर्जनीयस्वरूप, ८०८ सुमुखः—सुन्दर मुखवाले, ८०९ शरः—बाणस्वरूप, ८१० सर्वायुधः—सम्पूर्ण आयुधोंसे युक्त, ८११ सहः—सहनशील ॥ १२८ ॥

निवेदनः सुखाजातः सुगन्धारो महाधनुः ।
गन्धपाली च भगवानुत्थानः सर्वकर्मणाम् ॥ १२९ ॥
८१२ निवेदनः—सब प्रकारकी वृत्तिसे रहित ज्ञानवाले, ८१३ सुखाजातः—सब वृत्तियोंका लय होनेपर सुखरूपसे प्रकट होनेवाले, ८१४ सुगन्धारः—उत्तम गन्धसे युक्त, ८१५ महाधनुः—पिनाक नामक विशाल धनुष धारण करनेवाले, ८१६ भगवान् गन्धपाली—उत्तम गन्धकी रक्षा करनेवाले भगवान्, ८१७ सर्वकर्मणामुत्थानः—समस्त कर्मोंके उत्थानस्थान ॥ १२९ ॥

मन्थानो बहुलो वायुः सकलः सर्वलोचनः ।
तलस्तालः करस्थाली ऊर्ध्वसंहननो महान् ॥ १३० ॥
८१८ मन्थानो बहुलो वायुः—विश्वको मथ डालनेमें समर्थ प्रलयकालकी महान् वायुस्वरूप, ८१९ सकलः—सम्पूर्ण कलाओंसे युक्त, ८२० सर्वलोचनः—सबके द्रष्टा, ८२१ तलस्तालः—हाथपर ही ताल देनेवाले, ८२२ करस्थाली—हाथोंसे ही भोजनपात्रका काम लेनेवाले, ८२३ ऊर्ध्वसंहननः—सुदृढ़ शरीरवाले, ८२४ महान्—श्रेष्ठतम ॥ १३० ॥

छत्रं सुच्छत्रो विख्यातो लोकः सर्वाश्रयः क्रमः ।
मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डी कुण्डी विकुर्वणः ॥ १३१ ॥
८२५ छत्रम्—छत्रके समान पाप-तापसे सुरक्षित रखनेवाले, ८२६ सुच्छत्रः—उत्तम छत्रस्वरूप, ८२७ विख्यातो लोकः—सुप्रसिद्ध लोकस्वरूप, ८२८ सर्वाश्रयः क्रमः—सबके आधारभूत गति, ८२९ मुण्डः—मुण्डित-मस्तक, ८३० विरूपः—विकट रूपवाले, ८३१ विकृतः—सम्पूर्ण विपरीत क्रियाओंको धारण करनेवाले, ८३२ दण्डी—दण्डधारी, ८३३ कुण्डी—खप्परधारी, ८३४ विकुर्वणः—क्रियाद्वारा अलभ्य ॥ १३१ ॥

हर्यक्षः ककुभो वज्री शतजिह्वः सहस्रपात् ।