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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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उमापतिरुमाकान्तो जाह्नवीधृदुमाधवः ।। १३७ ।। ८७४ कर्णिकारमहास्रग्वी—कनेरकी बहुत बड़ी माला धारण करनेवाले, ८७५ नीलमौलिः—मस्तकपर नीलमणिमय मुकुट धारण करनेवाले, ८७६ पिनाकधृत्—पिनाक धनुषको धारण करनेवाले, ८७७ उमापतिः—उमा—ब्रह्मविद्याके स्वामी, ८७८ उमाकान्तः—पार्वतीके प्राण-प्रियतम, ८७९ जाह्नवीधृत्—गंगाको मस्तकपर धारण करनेवाले, ८८० उमाधवः—पार्वतीपति ।। १३७ ।।

वरो वराहो वरदो वरेण्यः सुमहास्वनः । महाप्रसादो दमनः शत्रुहा श्वेतपिङ्गलः ।। १३८ ।। ८८१ वरो वराहः—श्रेष्ठ वराहरूपधारी भगवान्, ८८२ वरदः—वरदाता, ८८३ वरेण्यः—स्वामी बनाने योग्य, ८८४ सुमहास्वनः—महान् गर्जना करनेवाले, ८८५ महाप्रसादः—भक्तोंपर महान् अनुग्रह करनेवाले, ८८६ दमनः—दुष्टोंका दमन करनेवाले, ८८७ शत्रुहा—शत्रुनाशक, ८८८ श्वेतपिङ्गलः—अर्धनारीनेश्वर वेशमें श्वेत-पिंगल वर्णवाले ।। १३८ ।।

पीतात्मा परमात्मा च प्रयतात्मा प्रधानधृत् । सर्वपार्श्वमुखस्त्र्यक्षो धर्मसाधारणो वरः ।। १३९ ।। ८८९ पीतात्मा—हिरण्मय पुरुष, ८९० परमात्मा—परब्रह्म परमेश्वर, ८९१ प्रयतात्मा—विशुद्धचित्त, ८९२ प्रधानधृत्—जगत्के कारणभूत त्रिगुणमय प्रधानके अधिष्ठानस्वरूप, ८९३ सर्वपार्श्वमुखः—सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर मुखवाले, ८९४ त्र्यक्षः—त्रिनेत्रधारी, ८९५ धर्मसाधारणो वरः—धर्म-पालनके अनुसार वर देनेवाले ।। १३९ ।।

चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा अमृतो गोवृषेश्वरः । साध्यर्षिर्वसुरादित्यो विवस्वान् सवितामृतः ।। १४० ।। ८९६ चराचरात्मा—चराचर प्राणियोंके आत्मा, ८९७ सूक्ष्मात्मा—अति सूक्ष्मस्वरूप, ८९८ अमृतो गोवृषेश्वरः—निष्काम धर्मके स्वामी, ८९९ साध्यर्षिः—साध्य देवताओंके आचार्य, ९०० आदित्यो वसुः—अदितिकुमार वसु, ९०१ विवस्वान् सवितामृतः—किरणोंसे सुशोभित एवं जगत्को उत्पन्न करनेवाले अमृतस्वरूप सूर्य ।। १४० ।।

व्यासः सर्गः सुसंक्षेपो विस्तरः पर्ययो नरः । ऋतुः संवत्सरो मासः पक्षः संख्यासमापनः ।। १४१ ।। ९०२ व्यासः—पुराण-इतिहास आदिके स्रष्टा वेदव्यासस्वरूप, ९०३ सर्गःसुसंक्षेपो विस्तरः—संक्षिप्त और विस्तृत सृष्टिस্বরূপ, ९०४ पर्ययो नरः—सब ओरसे व्याप्त करनेवाले वैश्वानरस्वरूप, ९०५ ऋतुः—ऋतुरूप, ९०६ संवत्सरः—संवत्सररूप, ९०७ मासः—मासरूप, ९०८ पक्षः—पक्षरूप, ९०९ संख्यासमापनः—पूर्वोक्त ऋतु आदिकी संख्या समाप्त करनेवाले पर्व (संक्रान्ति, दर्श, पूर्णमासादि) रूप ।। १४१ ।।

कलाः काष्ठा लवा मात्रा मुहूर्ताहःक्षपाः क्षणाः ।