महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिद्धार्थःसिद्धभूतार्थोऽचिन्त्यःसत्यव्रतः शुचिः ।। १५२ ।। ९९३ स्थावराणां पतिः—पर्वतोंके स्वामी हिमाचलादिरूप, ९९४ नियमेन्द्रियवर्धनः—नियमोंद्वारा मनसहित इन्द्रियोंका दमन करनेवाले, ९९५ सिद्धार्थः—आप्तकाम, ९९६ सिद्धभूतार्थः—जिसके समस्त प्रयोजन सिद्ध हैं, ९९७ अचिन्त्यः—चित्तकी पहुँचसे परे, ९९८ सत्यव्रतः—सत्यप्रतिज्ञ, ९९९ शुचिः—सर्वथा शुद्ध ।। १५२ ।।
व्रताधिपः परं ब्रह्म भक्तानां परमा गतिः । विमुक्तो मुक्ततेजाश्च श्रीमान् श्रीवर्धनो जगत् ।। १५३ ।। १००० व्रताधिपः—व्रतोंके अधिपति, १००१ परम्—सर्वश्रेष्ठ, १००२ ब्रह्म—देश, काल और वस्तुसे अपरिच्छिन्न चिन्मयतत्त्व, १००३ भक्तानां परमा गतिः—भक्तोंके लिये परम गतिस्वरूप, १००४ विमुक्तः—नित्य मुक्त, १००५ मुक्ततेजाः—शत्रुओंपर तेज छोड़नेवाले, १००६ श्रीमान्—योगैश्वर्यसे सम्पन्न, १००७ श्रीवर्धनः—भक्तोंकी सम्पत्तिको बढ़ानेवाले, १००८ जगत्—जगत्स्वरूप ।। १५३ ।।
यथाप्रधानं भगवानिति भक्त्या स्तुतो मया । यन्न ब्रह्मादयो देवा विदुस्तत्त्वेन नर्षयः ।। १५४ ।। स्तोतव्यमर्च्यं वन्द्यं च कः स्तोष्यति जगत्पतिम् । श्रीकृष्ण! इस प्रकार बहुत-से नामोंमेंसे प्रधान-प्रधान नाम चुनकर मैंने उनके द्वारा भक्तिपूर्वक भगवान् शंकरका स्तवन किया। जिन्हें ब्रह्मा आदि देवता तथा ऋषि भी तत्त्वसे नहीं जानते। उन्हीं स्तवनके योग्य, अर्चनीय और वन्दनीय जगत्पति शिवकी कौन स्तुति करेगा? ।। १५४ १/२ ।।
भक्त्या त्वेवं पुरस्कृत्य मया यज्ञपतिर्विभुः ।। १५५ ।। ततोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य स्तुतो मतिमतां वरः । इस तरह भक्तिके द्वारा भगवान्को सामने रखते हुए मैंने उन्हींसे आज्ञा लेकर उन बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भगवान् यज्ञपतिकी स्तुति की ।। १५५ १/२ ।।
शिवमेभिः स्तुवन् देवं नामभिः पुष्टिवर्धनैः ।। १५६ ।। नित्ययुक्तः शुचिर्भक्तः प्राप्नोत्यात्मानमात्मना ।। १५७ ।। जो सदा योगयुक्त एवं पवित्रभावसे रहनेवाला भक्त इन पुष्टिवर्धक नामोंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति करता है, वह स्वयं ही उन परमात्मा शिवको प्राप्त कर लेता है ।। १५६-१५७ ।।
एतद्धि परमं ब्रह्म परं ब्रह्माधिगच्छति । ऋषयश्चैव देवाश्च स्तुवन्त्येतेन तत्परम् ।। १५८ ।। यह उत्तम वेदतुल्य स्तोत्र परब्रह्म परमात्म-स्वरूप शिवको अपना लक्ष्य बनाता है। ऋषि और देवता भी उसके द्वारा उन परमात्मा शिवकी स्तुति करते हैं ।। १५८ ।।
स्तूयमानो महादेवस्तुष्यते नियतात्मभिः ।