भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 271

भगवान् शंकरकी कृपासे ही मनुष्योंके हृदयमें उनकी अनन्यभक्ति उत्पन्न होती है, जिससे वे अपने चित्तको उन्हींके चिन्तनमें लगाकर परमसिद्धिको प्राप्त होते हैं ॥ १६७ ॥ ये सर्वभावानुगताः प्रपद्यन्ते महेश्वरम् । प्रपन्नवत्सलो देवः संसारात् तान् समुद्धरेत् ॥ १६८ ॥ जो सम्पूर्ण भावसे अनुगत होकर महेश्वरकी शरण लेते हैं, शरणागतवत्सल महादेवजी इस संसारसे उनका उद्धार कर देते हैं ॥ १६८ ॥ एवमन्ये विकुर्वन्ति देवाः संसारमोचनम् । मनुष्याणामृते देवं नान्या शक्तिस्तपोबलम् ॥ १६९ ॥ इसी प्रकार भगवान्की स्तुतिद्वारा अन्य देवगण भी अपने संसारबन्धनका नाश करते हैं; क्योंकि महादेवजीकी शरण लेनेके सिवा ऐसी दूसरी कोई शक्ति या तपका बल नहीं है जिससे मनुष्योंका संसारबन्धनसे छुटकारा हो सके ॥ १६९ ॥ इति तेनेन्द्रकल्पेन भगवान् सदसत्पतिः । कृत्तिवासाः स्तुतः कृष्ण तण्डिना शुभबुद्धिना ॥ १७० ॥ श्रीकृष्ण! यह सोचकर उन इन्द्रके समान तेजस्वी एवं कल्याणमयी बुद्धिवाले तण्डि मुनिने गजचर्मधारी एवं समस्त कार्यकारणके स्वामी भगवान् शिवकी स्तुति की ॥ १७० ॥ स्तवमेतं भगवतो ब्रह्मा स्वयमधारयत् । गीयते च स बुद्धयेत ब्रह्मा शंकरसंनिधौ ॥ १७१ ॥ भगवान् शंकरके इस स्तोत्रको ब्रह्माजीने स्वयं अपने हृदयमें धारण किया है। वे भगवान् शिवके समीप इस वेदतुल्य स्तुतिका गान करते रहते हैं; अतः सबको इस स्तोत्रका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये ॥ १७१ ॥ इदं पुण्यं पवित्रं च सर्वदा पापनाशनम् । योगदं मोक्षदं चैव स्वर्गदं तोषदं तथा ॥ १७२ ॥ यह परम पवित्र, पुण्यजनक तथा सर्वदा सब पापोंका नाश करनेवाला है। यह योग, मोक्ष, स्वर्ग और संतोष—सब कुछ देनेवाला है ॥ १७२ ॥ एवमेतत् पठन्ते य एकभक्त्या तु शङ्करम् । या गतिः सांख्ययोगानां व्रजन्त्येतां गतिं तदा ॥ १७३ ॥ जो लोग अनन्यभक्तिभावसे भगवान् शिवके स्वरूप-भूत इस स्तोत्रका पाठ करते हैं उन्हें वही गति प्राप्त होती है जो सांख्यवेत्ताओं और योगियोंको मिलती है ॥ १७३ ॥ स्तवमेतं प्रयत्नेन सदा रुद्रस्य संनिधौ । अब्दमेकं चरेद् भक्तः प्राप्नुयादीप्सितं फलम् ॥ १७४ ॥ जो भक्त भगवान् शंकरके समीप एक वर्षतक सदा प्रयत्नपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करता है वह मनोवांछित फल प्राप्त कर लेता है ॥ १७४ ॥ एतद् रहस्यं परमं ब्रह्मणो हृदि संस्थितम् ।