महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 272, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मा प्रोवाच शक्राय शक्रः प्रोवाच मृत्यवे ।। १७५ ।।
यह परम रहस्यमय स्तोत्र ब्रह्माजीके हृदयमें स्थित है। ब्रह्माजीने इन्द्रको इसका उपदेश दिया और इन्द्रने मृत्युको ।। १७५ ।।
मृत्युः प्रोवाच रुद्रेभ्यो रुद्रेभ्यस्तण्डिमागमत् ।
महता तपसा प्राप्तस्तण्डिना ब्रह्मसद्मनि ।। १७६ ।।
मृत्युने एकादश रुद्रोंको इसका उपदेश किया। रुद्रोंसे तण्डिको इसकी प्राप्ति हुई। तण्डिने ब्रह्मलोकमें ही बड़ी भारी तपस्या करके इसे प्राप्त किया था ।। १७६ ।।
तण्डिः प्रोवाच शुक्राय गौतमाय च भार्गवः ।
वैवस्वताय मनवे गौतमः प्राह माधव ।। १७७ ।।
माधव! तण्डिने शुक्रको, शुक्रने गौतमको और गौतमने वैवस्वतमनुको इसका उपदेश दिया ।। १७७ ।।
नारायणाय साध्याय समाधिष्ठाय धीमते ।
यमाय प्राह भगवान् साध्यो नारायणोऽच्युतः ।। १७८ ।।
वैवस्वत मनुने समाधिनिष्ठ और ज्ञानी नारायण नामक किसी साध्यदेवताको यह स्तोत्र प्रदान किया। धर्मसे कभी च्युत न होनेवाले उन पूजनीय नारायण नामक साध्यदेवने यमको इसका उपदेश किया ।। १७८ ।।
नाचिकेताय भगवानाह वैवस्वतो यमः ।
मार्कण्डेयाय वार्ष्णेय नाचिकेतोऽभ्यभाषत ।। १७९ ।।
वृष्णिनन्दन! ऐश्वर्यशाली वैवस्वत यमने नाचिकेताको और नाचिकेताने मार्कण्डेय मुनिको यह स्तोत्र प्रदान किया ।। १७९ ।।
मार्कण्डेयान्मया प्राप्तो नियमेन जनार्दन ।
तवाप्यहममित्रघ्न स्तवं दद्यां ह्यविश्रुतम् ।। १८० ।।
शत्रुसूदन जनार्दन! मार्कण्डेयजीसे मैंने नियमपूर्वक यह स्तोत्र ग्रहण किया था। अभी इस स्तोत्रकी अधिक प्रसिद्धि नहीं हुई है, अतः मैं तुम्हें इसका उपदेश देता हूँ ।। १८० ।।
स्वर्ग्यमारोग्यमायुष्यं धन्यं वेदेन सम्मितम् ।
नास्य विघ्नं विकुर्वन्ति दानवा यक्षराक्षसाः ।
पिशाचा यातुधाना वा गुह्यका भुजगा अपि ।। १८१ ।।
यह वेदतुल्य स्तोत्र स्वर्ग, आरोग्य, आयु तथा धन-धान्य प्रदान करनेवाला है। यक्ष, राक्षस, दानव, पिशाच, यातुधान, गुह्यक और नाग भी इसमें विघ्न नहीं डाल पाते हैं ।। १८१ ।।
यः पठेत् शुचिः पार्थ ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।
अभग्नयोगो वर्षं तु सोऽश्वमेधफलं लभेत् ।। १८२ ।।