भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

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पृष्ठ 281

किया। मुझे मेरे ही समान एक सहस्र ब्रह्मवादी पुत्र दिये तथा पुत्रोंसहित मेरी दस लाख वर्षकी आयु नियत कर दी॥ ३८-३९॥

पराशर उवाच

प्रसाद्येह पुरा शर्वं मनसाचिन्तयं नृप। महातपा महातेजा महायोगी महायशाः॥ ४० ॥ वेदव्यासः श्रियावासो ब्राह्मणः करुणान्वितः। अप्यसावीप्सितः पुत्रो मम स्याद् वै महेश्वरात्॥ ४१ ॥ पराशरजीने कहा—नरेश्वर! पूर्वकालमें यहाँ मैंने महादेवजीको प्रसन्न करके मन-ही-मन उनका चिन्तन आरम्भ किया। मेरी इस तपस्याका उद्देश्य यह था कि मुझे महेश्वरकी कृपासे महातपस्वी, महातेजस्वी, महायोगी, महायशस्वी, दयालु, श्रीसम्पन्न एवं ब्रह्मनिष्ठ वेदव्यासनामक मनोवांछित पुत्र प्राप्त हो॥ ४०-४१॥ इति मत्वा हृदि मतं प्राह मां सुरसत्तमः। मयि सम्भावना यास्याः फलात्कृष्णो भविष्यति॥ ४२ ॥ मेरा ऐसा मनोरथ जानकर सुरश्रेष्ठ शिवने मुझसे कहा—'मुने! तुम्हारी मेरे प्रति जो सम्भावना है अर्थात् जिस वरको पानेकी लालसा है, उसीसे तुम्हें कृष्ण नामक पुत्र प्राप्त होगा॥ ४२ ॥ सावर्णस्य मनोः सर्गे सप्तर्षिश्च भविष्यति। वेदानां च स वै वक्ता कुरुवंशकरस्तथा॥ ४३ ॥ इतिहासस्य कर्ता च पुत्रस्ते जगतो हितः। भविष्यति महेन्द्रस्य दयितः स महामुनिः॥ ४४ ॥ अजरश्चामरश्चैव पराशर सुतस्तव। एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ४५ ॥ युधिष्ठिर महायोगी वीर्यवानक्षयोऽव्ययः। 'सावर्णिक मन्वन्तरके समय जो सृष्टि होगी, उसमें तुम्हारा यह पुत्र सप्तर्षिके पदपर प्रतिष्ठित होगा तथा इस वैवस्वत मन्वन्तरमें वह वेदोंका वक्ता, कौरव-वंशका प्रवर्तक, इतिहासका निर्माता, जगत्का हितैषी तथा देवराज इन्द्रका परम प्रिय महामुनि होगा। पराशर! तुम्हारा वह पुत्र सदा अजर-अमर रहेगा।' युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महायोगी, शक्तिशाली, अविनाशी और निर्विकार भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये॥

माण्डव्य उवाच

अचौरश्चौरशङ्कायां शूले भिन्नो ह्यहं तदा॥ ४६ ॥ तत्रस्थेन स्तुतो देवः प्राह मां वै नरेश्वर। मोक्षं प्राप्स्यसि शूलाच्च जीविष्यसि समार्बुदम्॥ ४७ ॥