महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 280, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें“युधिष्ठिर! तब भगवान् शिवने मुझसे प्रसन्नता-पूर्वक कहा—‘श्रीकृष्ण! तुम मेरी कृपासे प्रिय पदार्थोंकी अपेक्षा भी अत्यन्त प्रिय होओगे। युद्धमें तुम्हारी कभी पराजय नहीं होगी तथा तुम्हें अग्निके समान दुस्सह तेजकी प्राप्ति होगी' ॥ ३१ १/२ ॥
एवं सहस्रशश्चान्यान् महादेवो वरं ददौ ॥ ३२ ॥ मणिमन्थेऽथ शैले वै पुरा सम्पूजितो मया । वर्षायुतसहस्राणां सहस्रं शतमेव च ॥ ३३ ॥
“इस तरह महादेवजीने मुझे और भी सहस्रों वर दिये। पूर्वकालमें अन्य अवतारोंके समय मणिमन्थ पर्वतपर मैंने लाखों-करोड़ों वर्षोंतक भगवान् शंकरकी आराधना की थी ॥ ३२-३३ ॥
ततो मां भगवान् प्रीत इदं वचनमब्रवीत् । वरं वृणीष्व भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते ॥ ३४ ॥
“इससे प्रसन्न होकर भगवान्ने मुझसे कहा—‘कृष्ण! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनसें जैसी रुचि हो, उसके अनुसार कोई वर माँगो' ॥ ३४ ॥
ततः प्रणम्य शिरसा इदं वचनमब्रुवम् । यदि प्रीतो महादेवो भक्त्या परमया प्रभुः ॥ ३५ ॥ नित्यकालं तवेशान भक्तिर्भवतु मे स्थिरा । एवमस्त्विति भगवांस्तत्रोक्त्वान्तरधीयत ॥ ३६ ॥
“यह सुनकर मैंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और कहा—‘यदि मेरी परम भक्तिसे भगवान् महादेव प्रसन्न हों तो ईशान! आपके प्रति नित्य-निरन्तर मेरी स्थिर भक्ति बनी रहे।' तब ‘एवमस्तु' कहकर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये” ॥ ३५-३६ ॥
जैगीषव्य उवाच
ममाष्टगुणमैश्वर्यं दत्तं भगवता पुरा । यत्नेनान्येन बलिना वाराणस्यां युधिष्ठिर ॥ ३७ ॥
**जैगीषव्य बोले—**युधिष्ठिर! पूर्वकालमें भगवान् शिवने काशीपुरीके भीतर अन्य प्रबल प्रयत्नसे संतुष्ट हो मुझे अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ प्रदान की थीं ॥ ३७ ॥
गर्ग उवाच
चतुःषष्ट्यङ्गमददत् कलाज्ञानं ममाद्भुतम् । सरस्वत्यास्तटे तुष्टो मनोयज्ञेन पाण्डव ॥ ३८ ॥ तुल्यं मम सहस्रं तु सुतानां ब्रह्मवादिनाम् । आयुश्चैव सपुत्रस्य संवत्सरशतायुतम् ॥ ३९ ॥
**गर्गने कहा—**पाण्डुनन्दन! मैंने सरस्वतीके तटपर मानस यज्ञ करके भगवान् शिवको संतुष्ट किया था। इससे प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे चौंसठ कलाओंका अद्भुत ज्ञान प्रदान