भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 279

भविता त्वं मृगः क्रूरो महादुःखसमन्वितः ॥ २५ ॥ ‘ऐसा कहकर महाक्रोधी वरिष्ठने भगवान् शंकरकी ओर देखते हुए फिर कहा—‘तुम ग्यारह हजार आठ सौ वर्षोंतक जल और वायुसे रहित तथा अन्य पशुओंसे परित्यक्त केवल रुरु तथा सिंहोंसे सेवित जो यज्ञोंके लिये उचित नहीं है—ऐसे वृक्षोंसे भरे हुए विशालवनमें बुद्धिशून्य, दुखी, सर्वदा भयभीत, वनचारी और महान् कष्टमें मग्न क्रूर स्वभाववाले पशु होकर रहोगे’ ॥ २३—२५ ॥

तस्य वाक्यस्य निधने पार्थ जातो ह्यहं मृगः । ततो मां शरणं प्राप्तं प्राह योगी महेश्वरः ॥ २६ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! उनका यह वाक्य पूरा होते ही मैं क्रूर पशु हो गया। तब मैं भगवान् शंकरकी शरणमें गया। अपनी शरणमें आये हुए मुझ सेवकसे योगी महेश्वर इस प्रकार बोले— ॥ २६ ॥

अजरश्चामरश्चैव भविता दुःखवर्जितः । साम्यं ममास्तु ते सौख्यं युवयोर्वर्धतां क्रतुः ॥ २७ ॥ ‘मुने! तुम अजर-अमर और दुःखरहित हो जाओगे। तुम्हें मेरी समानता प्राप्त हो और तुम दोनों यजमान और पुरोहितका यह यज्ञ सदा बढ़ता रहे’ ॥ २७ ॥

अनुग्रहानेवमेष करोति भगवान् विभुः । परं धाता विधाता च सुखदुःखे च सर्वदा ॥ २८ ॥ “इस प्रकार सर्वव्यापी भगवान् शंकर सबके ऊपर अनुग्रह करते हैं। ये ही सबका अच्छे ढंगसे धारण-पोषण करते हैं और सर्वदा सबके सुख-दुःखका भी विधान करते हैं” ॥ २८ ॥

अचिन्त्य एष भगवान् कर्मणा मनसा गिरा । न मे तात युधिश्रेष्ठ विद्यया पण्डितः समः ॥ २९ ॥ “तात! समरभूमिके श्रेष्ठ वीर! ये अचिन्त्य भगवान् शिव मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा आराधना करने योग्य हैं। उनकी आराधनाका ही यह फल है कि पाण्डित्यमें मेरी समानता करनेवाला आज कोई नहीं है” ॥ २९ ॥

वासुदेवस्तदोवाच पुनर्मतिमतां वरः । सुवर्णाक्षो महादेवस्तपसा तोषितो मया ॥ ३० ॥ उस समय बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण फिर इस प्रकार बोले— “मैंने सुवर्ण-जैसे नेत्रवाले महादेवजीको अपनी तपस्यासे संतुष्ट किया ॥ ३० ॥

ततोऽथ भगवानाह प्रीतो मां वै युधिष्ठिर । अर्थात् प्रियतरः कृष्ण मत्प्रसादाद् भविष्यसि ॥ ३१ ॥ अपराजितश्च युद्धेषु तेजश्चैवानलोपमम् ।