महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 278, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मणोऽहं भवानीति मया चाराधितो भवः ॥ १६ ॥ तत्प्रसादान्मया प्राप्तं ब्राह्मण्यं दुर्लभं महत् । तदनन्तर विश्वामित्रजीने कहा, 'राजन्! जिस समय मैं क्षत्रिय था, उन दिनोंकी बात है, मेरे मनमें यह दृढ़ संकल्प हुआ कि मैं ब्राह्मण हो जाऊँ—यही उद्देश्य लेकर मैंने भगवान् शंकरकी आराधना की। और उनकी कृपासे मैंने अत्यन्त दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया' ।। १६ १/२ ।। असितो देवलश्चैव प्राह पाण्डुसुतं नृपम् ॥ १७ ॥ शापाच्छक्रस्य कौन्तेय विभो धर्मोऽनशत् तदा । तन्मे धर्मं यशश्चाग्र्यमायुश्चैवाददत् प्रभुः ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् असित देवलने पाण्डुकुमार राजा युधिष्ठिरसे कहा—'कुन्तीनन्दन! प्रभो! इन्द्रके शापसे मेरा धर्म नष्ट हो गया था; किंतु भगवान् शंकरने ही मुझे धर्म, उत्तम यश तथा दीर्घ आयु प्रदान की' ।। ऋषिर्गृत्समदो नाम शक्रस्य दयितः सखा । प्राहाजमीढं भगवान् बृहस्पतिसमद्युतिः ॥ १९ ॥ इसके बाद इन्द्रके प्रिय सखा और बृहस्पतिके समान तेजस्वी मुनिवर भगवान् गृत्समदने अजमीढवंशी युधिष्ठिरसे कहा— ।। १९ ।। वरिष्ठो नाम भगवान्श्चाक्षुषस्य मनोः सुतः । शतक्रतोरचिन्त्यस्य सत्रे वर्षसहस्रिके ॥ २० ॥ वर्तमानेऽब्रवीद् वाक्यं साम्नि ह्युच्चारिते मया । रथन्तरे द्विजश्रेष्ठ न सम्यगिति वर्तते ॥ २१ ॥ “चाक्षुष मनुके पुत्र भगवान् वरिष्ठके नामसे प्रसिद्ध हैं। एक समय अचिन्त्य शक्तिशाली शतक्रतु इन्द्रका एक यज्ञ हो रहा था जो एक हजार वर्षोंतक चलनेवाला था। उसमें मैं रथन्तर सामका पाठ कर रहा था। मेरे द्वारा उस सामका उच्चारण होनेपर वरिष्ठने मुझसे कहा—'द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे द्वारा रथन्तर सामका पाठ ठीक नहीं हो रहा है ।। २०-२१ ।। समीक्ष्यस्व पुनर्बुद्ध्या पापं त्यक्त्वा द्विजोत्तम । अयज्ञवाहिनं पापमकार्षीस्त्वं सुदुर्मते ॥ २२ ॥ “विप्रवर! तुम पापपूर्ण आग्रह छोड़कर फिर अपनी बुद्धिसे विचार करो। सुदुर्मते! तुमने ऐसा पाप कर डाला है, जिससे यह यज्ञ ही निष्फल हो गया' ।। एवमुक्त्वा महाक्रोधः प्राह शम्भुं पुनर्वचः । प्रज्ञया रहितो दुःखी नित्यभीतो वनेचरः ॥ २३ ॥ दशवर्षसहस्राणि दशाष्टौ च शतानि च । नष्टपानीयपवने मृगैरन्यैश्च वर्जिते ॥ २४ ॥ अयज्ञीयद्रुमे देशे रुरुसिंहनिषेविते ।