भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

ब्राह्मणोऽहं भवानीति मया चाराधितो भवः ॥ १६ ॥ तत्प्रसादान्मया प्राप्तं ब्राह्मण्यं दुर्लभं महत् । तदनन्तर विश्वामित्रजीने कहा, 'राजन्! जिस समय मैं क्षत्रिय था, उन दिनोंकी बात है, मेरे मनमें यह दृढ़ संकल्प हुआ कि मैं ब्राह्मण हो जाऊँ—यही उद्देश्य लेकर मैंने भगवान् शंकरकी आराधना की। और उनकी कृपासे मैंने अत्यन्त दुर्लभ ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया' ।। १६ १/२ ।। असितो देवलश्चैव प्राह पाण्डुसुतं नृपम् ॥ १७ ॥ शापाच्छक्रस्य कौन्तेय विभो धर्मोऽनशत् तदा । तन्मे धर्मं यशश्चाग्र्यमायुश्चैवाददत् प्रभुः ॥ १८ ॥ तत्पश्चात् असित देवलने पाण्डुकुमार राजा युधिष्ठिरसे कहा—'कुन्तीनन्दन! प्रभो! इन्द्रके शापसे मेरा धर्म नष्ट हो गया था; किंतु भगवान् शंकरने ही मुझे धर्म, उत्तम यश तथा दीर्घ आयु प्रदान की' ।। ऋषिर्गृत्समदो नाम शक्रस्य दयितः सखा । प्राहाजमीढं भगवान् बृहस्पतिसमद्युतिः ॥ १९ ॥ इसके बाद इन्द्रके प्रिय सखा और बृहस्पतिके समान तेजस्वी मुनिवर भगवान् गृत्समदने अजमीढवंशी युधिष्ठिरसे कहा— ।। १९ ।। वरिष्ठो नाम भगवान्श्चाक्षुषस्य मनोः सुतः । शतक्रतोरचिन्त्यस्य सत्रे वर्षसहस्रिके ॥ २० ॥ वर्तमानेऽब्रवीद् वाक्यं साम्नि ह्युच्चारिते मया । रथन्तरे द्विजश्रेष्ठ न सम्यगिति वर्तते ॥ २१ ॥ “चाक्षुष मनुके पुत्र भगवान् वरिष्ठके नामसे प्रसिद्ध हैं। एक समय अचिन्त्य शक्तिशाली शतक्रतु इन्द्रका एक यज्ञ हो रहा था जो एक हजार वर्षोंतक चलनेवाला था। उसमें मैं रथन्तर सामका पाठ कर रहा था। मेरे द्वारा उस सामका उच्चारण होनेपर वरिष्ठने मुझसे कहा—'द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे द्वारा रथन्तर सामका पाठ ठीक नहीं हो रहा है ।। २०-२१ ।। समीक्ष्यस्व पुनर्बुद्ध्या पापं त्यक्त्वा द्विजोत्तम । अयज्ञवाहिनं पापमकार्षीस्त्वं सुदुर्मते ॥ २२ ॥ “विप्रवर! तुम पापपूर्ण आग्रह छोड़कर फिर अपनी बुद्धिसे विचार करो। सुदुर्मते! तुमने ऐसा पाप कर डाला है, जिससे यह यज्ञ ही निष्फल हो गया' ।। एवमुक्त्वा महाक्रोधः प्राह शम्भुं पुनर्वचः । प्रज्ञया रहितो दुःखी नित्यभीतो वनेचरः ॥ २३ ॥ दशवर्षसहस्राणि दशाष्टौ च शतानि च । नष्टपानीयपवने मृगैरन्यैश्च वर्जिते ॥ २४ ॥ अयज्ञीयद्रुमे देशे रुरुसिंहनिषेविते ।

भविता त्वं मृगः क्रूरो महादुःखसमन्वितः ॥ २५ ॥ ‘ऐसा कहकर महाक्रोधी वरिष्ठने भगवान् शंकरकी ओर देखते हुए फिर कहा—‘तुम ग्यारह हजार आठ सौ वर्षोंतक जल और वायुसे रहित तथा अन्य पशुओंसे परित्यक्त केवल रुरु तथा सिंहोंसे सेवित जो यज्ञोंके लिये उचित नहीं है—ऐसे वृक्षोंसे भरे हुए विशालवनमें बुद्धिशून्य, दुखी, सर्वदा भयभीत, वनचारी और महान् कष्टमें मग्न क्रूर स्वभाववाले पशु होकर रहोगे’ ॥ २३—२५ ॥

तस्य वाक्यस्य निधने पार्थ जातो ह्यहं मृगः । ततो मां शरणं प्राप्तं प्राह योगी महेश्वरः ॥ २६ ॥ ‘कुन्तीनन्दन! उनका यह वाक्य पूरा होते ही मैं क्रूर पशु हो गया। तब मैं भगवान् शंकरकी शरणमें गया। अपनी शरणमें आये हुए मुझ सेवकसे योगी महेश्वर इस प्रकार बोले— ॥ २६ ॥

अजरश्चामरश्चैव भविता दुःखवर्जितः । साम्यं ममास्तु ते सौख्यं युवयोर्वर्धतां क्रतुः ॥ २७ ॥ ‘मुने! तुम अजर-अमर और दुःखरहित हो जाओगे। तुम्हें मेरी समानता प्राप्त हो और तुम दोनों यजमान और पुरोहितका यह यज्ञ सदा बढ़ता रहे’ ॥ २७ ॥

अनुग्रहानेवमेष करोति भगवान् विभुः । परं धाता विधाता च सुखदुःखे च सर्वदा ॥ २८ ॥ “इस प्रकार सर्वव्यापी भगवान् शंकर सबके ऊपर अनुग्रह करते हैं। ये ही सबका अच्छे ढंगसे धारण-पोषण करते हैं और सर्वदा सबके सुख-दुःखका भी विधान करते हैं” ॥ २८ ॥

अचिन्त्य एष भगवान् कर्मणा मनसा गिरा । न मे तात युधिश्रेष्ठ विद्यया पण्डितः समः ॥ २९ ॥ “तात! समरभूमिके श्रेष्ठ वीर! ये अचिन्त्य भगवान् शिव मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा आराधना करने योग्य हैं। उनकी आराधनाका ही यह फल है कि पाण्डित्यमें मेरी समानता करनेवाला आज कोई नहीं है” ॥ २९ ॥

वासुदेवस्तदोवाच पुनर्मतिमतां वरः । सुवर्णाक्षो महादेवस्तपसा तोषितो मया ॥ ३० ॥ उस समय बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण फिर इस प्रकार बोले— “मैंने सुवर्ण-जैसे नेत्रवाले महादेवजीको अपनी तपस्यासे संतुष्ट किया ॥ ३० ॥

ततोऽथ भगवानाह प्रीतो मां वै युधिष्ठिर । अर्थात् प्रियतरः कृष्ण मत्प्रसादाद् भविष्यसि ॥ ३१ ॥ अपराजितश्च युद्धेषु तेजश्चैवानलोपमम् ।

“युधिष्ठिर! तब भगवान् शिवने मुझसे प्रसन्नता-पूर्वक कहा—‘श्रीकृष्ण! तुम मेरी कृपासे प्रिय पदार्थोंकी अपेक्षा भी अत्यन्त प्रिय होओगे। युद्धमें तुम्हारी कभी पराजय नहीं होगी तथा तुम्हें अग्निके समान दुस्सह तेजकी प्राप्ति होगी' ॥ ३१ १/२ ॥

एवं सहस्रशश्चान्यान् महादेवो वरं ददौ ॥ ३२ ॥ मणिमन्थेऽथ शैले वै पुरा सम्पूजितो मया । वर्षायुतसहस्राणां सहस्रं शतमेव च ॥ ३३ ॥

“इस तरह महादेवजीने मुझे और भी सहस्रों वर दिये। पूर्वकालमें अन्य अवतारोंके समय मणिमन्थ पर्वतपर मैंने लाखों-करोड़ों वर्षोंतक भगवान् शंकरकी आराधना की थी ॥ ३२-३३ ॥

ततो मां भगवान् प्रीत इदं वचनमब्रवीत् । वरं वृणीष्व भद्रं ते यस्ते मनसि वर्तते ॥ ३४ ॥

“इससे प्रसन्न होकर भगवान्‌ने मुझसे कहा—‘कृष्ण! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनसें जैसी रुचि हो, उसके अनुसार कोई वर माँगो' ॥ ३४ ॥

ततः प्रणम्य शिरसा इदं वचनमब्रुवम् । यदि प्रीतो महादेवो भक्त्या परमया प्रभुः ॥ ३५ ॥ नित्यकालं तवेशान भक्तिर्भवतु मे स्थिरा । एवमस्त्विति भगवांस्तत्रोक्त्वान्तरधीयत ॥ ३६ ॥

“यह सुनकर मैंने मस्तक झुकाकर प्रणाम किया और कहा—‘यदि मेरी परम भक्तिसे भगवान् महादेव प्रसन्न हों तो ईशान! आपके प्रति नित्य-निरन्तर मेरी स्थिर भक्ति बनी रहे।' तब ‘एवमस्तु' कहकर भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये” ॥ ३५-३६ ॥

जैगीषव्य उवाच

ममाष्टगुणमैश्वर्यं दत्तं भगवता पुरा । यत्नेनान्येन बलिना वाराणस्यां युधिष्ठिर ॥ ३७ ॥

**जैगीषव्य बोले—**युधिष्ठिर! पूर्वकालमें भगवान् शिवने काशीपुरीके भीतर अन्य प्रबल प्रयत्नसे संतुष्ट हो मुझे अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ प्रदान की थीं ॥ ३७ ॥

गर्ग उवाच

चतुःषष्ट्यङ्गमददत् कलाज्ञानं ममाद्भुतम् । सरस्वत्यास्तटे तुष्टो मनोयज्ञेन पाण्डव ॥ ३८ ॥ तुल्यं मम सहस्रं तु सुतानां ब्रह्मवादिनाम् । आयुश्चैव सपुत्रस्य संवत्सरशतायुतम् ॥ ३९ ॥

**गर्गने कहा—**पाण्डुनन्दन! मैंने सरस्वतीके तटपर मानस यज्ञ करके भगवान् शिवको संतुष्ट किया था। इससे प्रसन्न होकर उन्होंने मुझे चौंसठ कलाओंका अद्भुत ज्ञान प्रदान

किया। मुझे मेरे ही समान एक सहस्र ब्रह्मवादी पुत्र दिये तथा पुत्रोंसहित मेरी दस लाख वर्षकी आयु नियत कर दी॥ ३८-३९॥

पराशर उवाच

प्रसाद्येह पुरा शर्वं मनसाचिन्तयं नृप। महातपा महातेजा महायोगी महायशाः॥ ४० ॥ वेदव्यासः श्रियावासो ब्राह्मणः करुणान्वितः। अप्यसावीप्सितः पुत्रो मम स्याद् वै महेश्वरात्॥ ४१ ॥ पराशरजीने कहा—नरेश्वर! पूर्वकालमें यहाँ मैंने महादेवजीको प्रसन्न करके मन-ही-मन उनका चिन्तन आरम्भ किया। मेरी इस तपस्याका उद्देश्य यह था कि मुझे महेश्वरकी कृपासे महातपस्वी, महातेजस्वी, महायोगी, महायशस्वी, दयालु, श्रीसम्पन्न एवं ब्रह्मनिष्ठ वेदव्यासनामक मनोवांछित पुत्र प्राप्त हो॥ ४०-४१॥ इति मत्वा हृदि मतं प्राह मां सुरसत्तमः। मयि सम्भावना यास्याः फलात्कृष्णो भविष्यति॥ ४२ ॥ मेरा ऐसा मनोरथ जानकर सुरश्रेष्ठ शिवने मुझसे कहा—'मुने! तुम्हारी मेरे प्रति जो सम्भावना है अर्थात् जिस वरको पानेकी लालसा है, उसीसे तुम्हें कृष्ण नामक पुत्र प्राप्त होगा॥ ४२ ॥ सावर्णस्य मनोः सर्गे सप्तर्षिश्च भविष्यति। वेदानां च स वै वक्ता कुरुवंशकरस्तथा॥ ४३ ॥ इतिहासस्य कर्ता च पुत्रस्ते जगतो हितः। भविष्यति महेन्द्रस्य दयितः स महामुनिः॥ ४४ ॥ अजरश्चामरश्चैव पराशर सुतस्तव। एवमुक्त्वा स भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ ४५ ॥ युधिष्ठिर महायोगी वीर्यवानक्षयोऽव्ययः। 'सावर्णिक मन्वन्तरके समय जो सृष्टि होगी, उसमें तुम्हारा यह पुत्र सप्तर्षिके पदपर प्रतिष्ठित होगा तथा इस वैवस्वत मन्वन्तरमें वह वेदोंका वक्ता, कौरव-वंशका प्रवर्तक, इतिहासका निर्माता, जगत्का हितैषी तथा देवराज इन्द्रका परम प्रिय महामुनि होगा। पराशर! तुम्हारा वह पुत्र सदा अजर-अमर रहेगा।' युधिष्ठिर! ऐसा कहकर महायोगी, शक्तिशाली, अविनाशी और निर्विकार भगवान् शिव वहीं अन्तर्धान हो गये॥

माण्डव्य उवाच

अचौरश्चौरशङ्कायां शूले भिन्नो ह्यहं तदा॥ ४६ ॥ तत्रस्थेन स्तुतो देवः प्राह मां वै नरेश्वर। मोक्षं प्राप्स्यसि शूलाच्च जीविष्यसि समार्बुदम्॥ ४७ ॥

रुजा शूलकृता चैव न ते विप्र भविष्यति । आधिभिर्व्याधिभिश्चैव वर्जितस्त्वं भविष्यसि ॥ ४८ ॥ **माण्डव्य बोले—**नरेश्वर! मैं चोर नहीं था तो भी चोरीके संदेहमें मुझे शूलीपर चढ़ा दिया गया। वहींसे मैंने महादेवजीकी स्तुति की। तब उन्होंने मुझसे कहा—'विप्रवर! तुम शूलसे छुटकारा पा जाओगे और दस करोड़ वर्षोंतक जीवित रहोगे। तुम्हारे शरीरमें इस शूलके धँसनेसे कोई पीड़ा नहीं होगी। तुम आधि-व्याधिसे मुक्त हो जाओगे ॥ ४६—४८ ॥ पादाच्चतुर्थात् सम्भूत आत्मा यस्मान्मुने तव । त्वं भविष्यस्यनुपमो जन्म वै सफलं कुरु ॥ ४९ ॥ 'मुने! तुम्हारा यह शरीर धर्मके चौथे पाद सत्यसे उत्पन्न हुआ है। अतः तुम अनुपम सत्यवादी होओगे। जाओ, अपना जन्म सफल करो ॥ ४९ ॥ तीर्थाभिषेकं सकलं त्वमविघ्नेन चाप्स्यसि । स्वर्गं चैवाक्षयं विप्र विदधामि तवोर्जितम् ॥ ५० ॥ 'ब्रह्मन्! तुम्हें बिना किसी विघ्न-बाधाके सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नानका सौभाग्य प्राप्त होगा। मैं तुम्हारे लिये अक्षय एवं तेजस्वी स्वर्गलोक प्रदान करता हूँ' ॥ ५० ॥ एवमुक्त्वा तु भगवान् वरेण्यो वृषवाहनः । महेश्वरो महाराज कृत्तिवासा महाद्युतिः ॥ ५१ ॥ सगणो दैवतश्रेष्ठस्तत्रैवान्तरधीयत । महाराज! ऐसा कहकर कृत्तिवासा, महातेजस्वी, वृषभवाहन तथा वरणीय सुरश्रेष्ठ भगवान् महेश्वर अपने गणोंके साथ वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ५१ १/२ ॥

गालव उवाच

विश्वामित्राभ्यनुज्ञातो ह्यहं पितरमागतः ॥ ५२ ॥ अब्रवीन्मां ततो माता दुःखिता रुदती भृशम् । कौशिकेनाभ्यनुज्ञातं पुत्रं वेदविभूषितम् ॥ ५३ ॥ न तात तरुणं दान्तं पिता त्वां पश्यतेऽनघ । **गालवजीने कहा—**राजन्! विश्वामित्र मुनिकी आज्ञा पाकर मैं अपने पिताजीका दर्शन करनेके लिये घरपर आया। उस समय मेरी माता वैधव्यके दुःखसे दुःखी हो जोर-जोरसे रोती हुई मुझसे बोली—'तात! अनघ! कौशिक मुनिकी आज्ञा लेकर घरपर आये हुए वेदविद्यासे विभूषित तुझ तरुण एवं जितेन्द्रिय पुत्रको तुम्हारे पिता नहीं देख सके' ॥ ५२-५३ १/२ ॥ श्रुत्वा जनन्या वचनं निराशो गुरुदर्शने ॥ ५४ ॥ नियतात्मा महादेवमपश्यं सोऽब्रवीच्च माम् । पिता माता च ते त्वं च पुत्र मृत्युविवर्जिताः ॥ ५५ ॥

भविष्यथ विश क्षिप्रं द्रष्टासि पितरं क्षये ।
माताकी बात सुनकर मैं पिताके दर्शनसे निराश हो गया और मनको संयममें रखकर महादेवजीकी आराधना करके उनका दर्शन किया। उस समय वे मुझसे बोले—‘वत्स! तुम्हारे पिता, माता और तुम तीनों ही मृत्युसे रहित हो जाओगे। अब तुम अपने घरमें शीघ्र प्रवेश करो। वहाँ तुम्हें पिताका दर्शन प्राप्त होगा’ ।।
अनुज्ञातो भगवता गृहं गत्वा युधिष्ठिर ।। ५६ ।।
अपश्यं पितरं तात इष्टिं कृत्वा विनिःसृतम् ।
उपस्पृश्य गृहीत्वेध्मं कुशांश्च शरणाकुरून् ।। ५७ ।।
तात युधिष्ठिर! भगवान् शिवकी आज्ञासे मैंने पुनः घर जाकर वहाँ यज्ञ करके यज्ञशालासे निकले हुए पिताका दर्शन किया। वे उस समय समिधा, कुश और वृक्षोंसे अपने-आप गिरे हुए पके फल आदि हव्य पदार्थ लिये हुए थे ।। ५६-५७ ।।
तान् विसृज्य च मां प्राह पिता सास्त्राविलेक्षणः ।
प्रणमन्तं परिष्वज्य मूर्ध्युपाघ्राय पाण्डव ।। ५८ ।।
दिष्ट्या दृष्टोऽसि मे पुत्र कृतविद्य इहागतः ।
पाण्डुनन्दन! उन्हें देखते ही मैं उनके चरणोंमें पड़ गया; फिर पिताजीने भी उन समिधा आदि वस्तुओंको अलग रखकर मुझे हृदयसे लगा लिया और मेरा मस्तक सूँघकर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए मुझसे कहा—‘बेटा! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम विद्वान् होकर घर आ गये और मैंने तुम्हें भर आँख देख लिया’ ।। ५८१/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

एतान्यत्यद्भुतान्येव कर्माण्यथ महात्मनः ।। ५९ ।।
प्रोक्तानि मुनिभिः श्रुत्वा विस्मयामास पाण्डवः ।
ततः कृष्णोऽब्रवीद् वाक्यं पुनर्मतिमतां वरः ।। ६० ।।
युधिष्ठिरं धर्मनिधिं पुरुहूतमिवेश्वरः ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मुनियोंके कहे हुए महादेवजीके ये अद्भुत चरित्र सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको बड़ा विस्मय हुआ। फिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने धर्मनिधि युधिष्ठिरसे उसी प्रकार कहा जैसे श्रीविष्णु देवराज इन्द्रसे कोई बात कहा करते हैं ।। ५९-६०१/२ ।।

वासुदेव उवाच

उपमन्युर्मयि प्राह तपन्निव दिवाकरः ।। ६१ ।।
अशुभैः पापकर्माणो ये नराः कलुषीकृताः ।
ईशानं न प्रपद्यन्ते तमोराजसवृत्तयः ।। ६२ ।।

**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**राजन्! सूर्यके समान तपते हुए-से तेजस्वी उपमन्युने मेरे समीप कहा था कि ‘जो पापकर्मी मनुष्य अपने अशुभ आचरणोंसे कलुषित हो गये हैं, वे तमोगुणी या रजोगुणी वृत्तिके लोग भगवान् शिवकी शरण नहीं लेते हैं ॥ ६१-६२ ॥ ईश्वरं सम्प्रपद्यन्ते द्विजा भावितभावनाः । सर्वथा वर्तमानोऽपि यो भक्तः परमेश्वरे ॥ ६३ ॥ सदृशोऽरण्यवासीनां मुनीनां भावितात्मनाम् । ‘जिनका अन्तःकरण पवित्र है, वे ही द्विज महादेवजीकी शरण लेते हैं। जो परमेश्वर शिवका भक्त है, वह सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी पवित्र अन्तःकरणवाले वनवासी मुनियोंके समान है ॥ ६३ १/२ ॥ ब्रह्मत्वं केशवत्वं वा शक्रत्वं वा सुरैः सह ॥ ६४ ॥ त्रैलोक्यस्याधिपत्यं वा तुष्टो रुद्रः प्रयच्छति । ‘भगवान् रुद्र संतुष्ट हो जायँ तो वे ब्रह्मपद, विष्णुपद, देवताओंसहित देवेन्द्रपद अथवा तीनों लोकोंका आधिपत्य प्रदान कर सकते हैं ॥ ६४ १/२ ॥ मनसापि शिवं तात ये प्रपद्यन्ति मानवाः ॥ ६५ ॥ विधूय सर्वपापानि देवैः सह वसन्ति ते । ‘तात! जो मनुष्य मनसे भी भगवान् शिवकी शरण लेते हैं, वे सब पापोंका नाश करके देवताओंके साथ निवास करते हैं ॥ ६५ ॥ भित्त्वा भित्त्वा च कूलानि हुत्वा सर्वमिदं जगत् ॥ ६६ ॥ यजेद् देवं विरूपाक्षं न स पापेन लिप्यते । ‘बारंबार तालाबके तटभूमिको खोद-खोदकर उन्हें चौपट कर देनेवाला और इस सारे जगत्‌को जलती आगमें झोंक देनेवाला पुरुष भी यदि महादेवजीकी आराधना करता है तो वह पापसे लिप्त नहीं होता है ॥ सर्वलक्षणहीनोऽपि युक्तो वा सर्वपातकैः ॥ ६७ ॥ सर्वं तुदति तत्पापं भावयञ्छिवमात्मना । ‘समस्त लक्षणोंसे हीन अथवा सब पापोंसे युक्त मनुष्य भी यदि अपने हृदयसे भगवान् शिवका ध्यान करता है तो वह अपने सारे पापोंको नष्ट कर देता है ॥ ६७ १/२ ॥ कीटपक्षिपतङ्गानां तिरश्चामपि केशव ॥ ६८ ॥ महादेवप्रपन्नानां न भयं विद्यते क्वचित् । ‘केशव! कीट, पतंग, पक्षी तथा पशु भी यदि महादेवजीकी शरणमें आ जायँ तो उन्हें भी कहीं किसीका भय नहीं प्राप्त होता है ॥ ६८ १/२ ॥ एवमेव महादेवं भक्ता ये मानवा भुवि ॥ ६९ ॥ न ते संसारवशगा इति मे निश्चिता मतिः । ततः कृष्णोऽब्रवीद् वाक्यं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ७० ॥

‘इसी प्रकार इस भूतलपर जो मानव महादेवजीके भक्त हैं, वे संसारके अधीन नहीं होते—यह मेरा निश्चित विचार है।’ तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने स्वयं भी धर्मपुत्र युधिष्ठिरसे कहा— ।। ६९-७० ।।

विष्णुरुवाच

आदित्यचन्द्रावनिलानलौ च द्यौर्भूमिरापो वसवोऽथ विश्वे । धातार्यमा शुक्रबृहस्पती च रुद्राः ससाध्या वरुणोऽथगोपः ।। ७१ ।। ब्रह्मा शक्रो मारुतो ब्रह्म सत्यं वेदा यज्ञा दक्षिणा वेदवाहाः । सोमो यश यच्च हव्यं हविश्च रक्षा दीक्षा संयमा ये च केचित् ।। ७२ ।। स्वाहा वौषट् ब्राह्मणाः सौरभेयी धर्मं चाग्रयं कालचक्रं बलं च । यशो दमो बुद्धिमतां स्थितिश्च शुभाशुभं ये मुनयश्च सप्त ।। ७३ ।। अग्रया बुद्धिर्मनसा दर्शने च स्पर्शश्चाग्रयः कर्मणां या च सिद्धिः । गणा देवानामूष्मपाः सोमपाश्च लेखाः सुयामास्तुषिता ब्रह्मकायाः ।। ७४ ।। आभासुरा गन्धपा धूमपाश्च वाचा विरुद्धाश्च मनोविरुद्धाः । शुद्धाश्च निर्माणरताश्च देवाः स्पर्शाशना दर्शपा आज्यपाश्च ।। ७५ ।। चिन्त्यद्योता ये च देवेषु मुख्या ये चाप्यन्ये देवताश्चाजमीढ । सुपर्णगन्धर्वपिशाचदानवा यक्षास्तथा चारणपन्नगाश्च ।। ७६ ।। स्थूलं सूक्ष्मं मृदु चाप्यसूक्ष्मं दुःखं सुखं दुःखमनन्तरं च । सांख्यं योगं तत्पराणां परं च शर्वाज्जातं विद्धि यत् कीर्तितं मे ।। ७७ ।।

श्रीकृष्ण बोले— अजमीढवंशी धर्मराज! जो सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, स्वर्ग, भूमि, जल, वसु, विश्वदेव, धाता, अर्यमा, शुक्र, बृहस्पति, रुद्रगण, साध्यगण, राजा वरुण, ब्रह्मा, इन्द्र, वायुदेव, ॐकार, सत्य, वेद, यज्ञ, दक्षिणा, वेदपाठी ब्राह्मण, सोमरस, यजमान, हवनीय हविष्य, रक्षा, दीक्षा, सब प्रकारके संयम, स्वाहा, वौषट्, ब्राह्मणगण, गौ, श्रेष्ठ धर्म, कालचक्र, बल, यश, दम, बुद्धिमानोंकी स्थिति, शुभाशुभ कर्म, सप्तर्षि, श्रेष्ठ बुद्धि, मन, दर्शन, श्रेष्ठ स्पर्श, कर्मोंकी सिद्धि, ऊष्मप, सोमप, लेख, याम तथा तुषित आदि देवगण, ब्राह्मण-शरीर, दीप्तिशाली गन्धप, धूमप ऋषि, वाग्विरुद्ध और मनोविरुद्ध भाव, शुद्धभाव, निर्माण-कार्यमें तत्पर रहनेवाले देवता, स्पर्शमात्रसे भोजन करनेवाले, दर्शनमात्रसे पेय रसका पान करनेवाले, घृत पीनेवाले हैं, जिनके संकल्प करनेमात्रसे अभीष्ट वस्तु नेत्रोंके समक्ष प्रकाशित होने लगती है, ऐसे जो देवताओंमें मुख्य गण हैं, जो दूसरे-दूसरे देवता हैं, जो सुपर्ण, गन्धर्व, पिशाच, दानव, यक्ष, चारण तथा नाग हैं, जो स्थूल, सूक्ष्म, कोमल, असूक्ष्म, सुख, इस लोकके दुःख, परलोकके दुःख, सांख्य, योग एवं पुरुषार्थोंमें श्रेष्ठ मोक्षरूप परम पुरुषार्थ बताया गया है; इन सबको तुम महादेवजीसे ही उत्पन्न हुआ समझो ॥ ७१—७७ ॥

तत्सम्भूता भूतकृतो वरेण्याः
सर्वे देवा भुवनस्यास्य गोपाः ।
आविश्येमां धरणीं येऽभ्यरक्षन्
पुरातनीं तस्य देवस्य सृष्टिम् ॥ ७८ ॥

जो इस भूतलमें प्रवेश करके महादेवजीकी पूर्वकृत सृष्टिकी रक्षा करते हैं, जो समस्त जगत्‌के रक्षक, विभिन्न प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले और श्रेष्ठ हैं, वे सम्पूर्ण देवता भगवान् शिवसे ही प्रकट हुए हैं ॥

विचिन्वन्तस्तपसा तत्स्थवीयः
किंचित् तत्त्वं प्राणहेतोर्नतोऽस्मि ।
ददातु देवः स वरानिहेष्टा-
नभिष्टुतो नः प्रभुरव्ययः सदा ॥ ७९ ॥

ऋषि-मुनि तपस्याद्वारा जिसका अन्वेषण करते हैं, उस सदा स्थिर रहनेवाले अनिर्वचनीय परम सूक्ष्म तत्त्वस्वरूप सदाशिवको मैं जीवन-रक्षाके लिये नमस्कार करता हूँ। जिन अविनाशी प्रभुकी मेरे द्वारा सदा ही स्तुति की गयी है, वे महादेव यहाँ मुझे अभीष्ट वरदान दें ॥

इमं स्तवं संनियतेन्द्रियश्च
भूत्वा शुचिर्यः पुरुषः पठेत् ।
अभग्नयोगो नियतो मासमेकं
सम्प्राप्नुयादश्वमेधे फलं यत् ॥ ८० ॥

जो पुरुष इन्द्रियोंको वशमें करके पवित्र होकर इस स्तोत्रका पाठ करेगा और नियमपूर्वक एक मासतक अखण्डरूपसे इस पाठको चलाता रहेगा, वह अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त कर लेगा ॥ ८० ॥

वेदान् कृत्स्नान् ब्राह्मणः प्राप्नुयात् तु जयेन्नृपः पार्थ महीं च कृत्स्नाम् । वैश्यो लाभं प्राप्नुयान्नैपुणं च शूद्रो गतिं प्रेत्य तथा सुखं च ॥ ८१ ॥ कुन्तीनन्दन! ब्राह्मण इसके पाठसे सम्पूर्ण वेदोंके स्वाध्यायका फल पाता है। क्षत्रिय समस्त पृथ्वीपर विजय प्राप्त कर लेता है। वैश्य व्यापारकुशलता एवं महान् लाभका भागी होता है और शूद्र इहलोकमें सुख तथा परलोकमें सद्गति पाता है ॥ ८१ ॥

स्तवराजमिमं कृत्वा रुद्राय दधिरे मनः । सर्वदोषापहं पुण्यं पवित्रं च यशस्विनः ॥ ८२ ॥ जो लोग सम्पूर्ण दोषोंका नाश करनेवाले इस पुण्यजनक पवित्र स्तवराजका पाठ करके भगवान् रुद्रके चिन्तनमें मन लगाते हैं, वे यशस्वी होते हैं ॥ ८२ ॥

यावन्त्यस्य शरीरेषु रोमकूपाणि भारत । तावन्त्यब्दसहस्राणि स्वर्गे वसति मानवः ॥ ८३ ॥ भरतनन्दन! मनुष्यके शरीरमें जितने रोमकूप होते हैं, इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला मनुष्य उतने ही हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है ॥ ८३ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपर्वाख्याने अष्टादशोऽध्यायः ॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मेघवाहनपर्वकी कथाविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८ ॥

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनविंशोऽध्यायः

अष्टावक्र मुनिका वदान्य ऋषिके कहनेसे उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान, मार्गमें कुबेरके द्वारा उनका स्वागत तथा स्त्रीरूपधारिणी उत्तरदिशाके साथ उनका संवाद

युधिष्ठिर उवाच

यदिदं सहधर्मेति प्रोच्यते भरतर्षभ ।
पाणिग्रहणकाले तु स्त्रीणामेतत् कथं स्मृतम् ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—भरतश्रेष्ठ! जो यह स्त्रियोंके लिये विवाहकालमें सहधर्मकी बात कही जाती है, वह किस प्रकार बतायी गयी है? ॥ १ ॥

आर्ष एष भवेद् धर्मः प्राजापत्योऽथवाऽऽसुरः ।
यदेतत् सहधर्मेति पूर्वमुक्तं महर्षिभिः ॥ २ ॥
महर्षियोंने पूर्वकालमें जो यह स्त्री-पुरुषोंके सहधर्मकी बात कही है, यह आर्ष धर्म है या प्राजापत्य धर्म; अथवा आसुर धर्म है? ॥ २ ॥

संदेहः सुमहानेष विरुद्ध इति मे मतिः ।
इह यः सहधर्मो वै प्रेत्यायं विहितः क्व नु ॥ ३ ॥
मेरे मनमें यह महान् संदेह पैदा हो गया है। मैं तो ऐसा समझता हूँ कि यह सहधर्मका कथन विरुद्ध है। यहाँ जो सहधर्म है, वह मृत्युके पश्चात् कहाँ रहता है? ॥

स्वर्गो मृतानां भवति सहधर्मः पितामह ।
पूर्वमेकस्तु म्रियते क्व चैकस्तिष्ठते वद ॥ ४ ॥
पितामह! जबकि मरे हुए मनुष्योंका स्वर्गवास हो जाता है एवं पति और पत्नीमेंसे एककी पहले मृत्यु हो जाती है, तब एक व्यक्तिमें सहधर्म कहाँ रहता है? यह बताइये ॥ ४ ॥

नानाधर्मफलोपेता नानाकर्मनिवासिताः ।
नानानिरयनिष्ठान्ता मानुषा बहवो यदा ॥ ५ ॥
जब बहुत-से मनुष्य नाना प्रकारके धर्मफलसे संयुक्त होते हैं, नाना प्रकारके कर्मवश विभिन्न स्थानोंमें निवास करते हैं और शुभाशुभ कर्मोंके फल-स्वरूप स्वर्ग-नरक आदि नाना अवस्थाओंमें पड़ते हैं, तब वे सहधर्मका निर्वाह किस प्रकार कर सकते हैं? ॥ ५ ॥

अनृताः स्त्रिय इत्येवं सूत्रकारो व्यवस्यति ।
यदानृताः स्त्रियस्तात सहधर्मः कुतः स्मृतः ॥ ६ ॥

धर्मसूत्रकार यह निश्चितरूपसे कहते हैं कि स्त्रियाँ असत्यपरायण होती हैं। तात! जब स्त्रियाँ असत्यवादिनी ही हैं तब उन्हें साथ रखकर सहधर्मका अनुष्ठान कैसे किया जा सकता है? ॥ ६ ॥

अनृताः स्त्रिय इत्येवं वेदेष्वपि हि पठ्यते ।
धर्मोऽयं पूर्विका संज्ञा उपचारः क्रियाविधिः ॥ ७ ॥
वेदोंमें भी यह बात पढ़ी गयी है कि स्त्रियाँ असत्यभाषिणी होती हैं, ऐसी दशामें उनका वह असत्य भी सहधर्मके अन्तर्गत आ सकता है, किंतु असत्य कभी धर्म नहीं हो सकता; अतः दाम्पत्यधर्मको जो सहधर्म कहा गया है, यह उसकी गौण संज्ञा है। वे पति-पत्नी साथ रहकर जो भी कार्य करते हैं, उसीको उपचारतः धर्म नाम दे दिया गया है ॥ ७ ॥

गह्वरं प्रतिभात्येतन्मम चिन्तयतोऽनिशम् ।
निःसंदेहमिदं सर्वं पितामह यथाश्रुति ॥ ८ ॥
पितामह! मैं ज्यों-ज्यों इस विषयपर विचार करता हूँ, त्यों-त्यों यह बात मुझे अत्यन्त दुर्बोध प्रतीत होती है। अतः आपने इस विषयमें जो कुछ श्रुतिका विधान हो, उसके अनुसार यह सब समझाइये जिससे मेरा संदेह दूर हो जाय ॥ ८ ॥

यदैतद् यादृशं चैतद् यथा चैतत् प्रवर्तितम् ।
निखिलेन महाप्राज्ञ भवानेतद् ब्रवीतु मे ॥ ९ ॥
महामते! यह सहधर्म जबसे प्रचलित हुआ, जिस रूपमें सामने आया और जिस प्रकार इसकी प्रवृत्ति हुई, ये सारी बातें आप मुझे बताइये ॥ ९ ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अष्टावक्रस्य संवादं दिशया सह भारत ॥ १० ॥
भीष्मजीने कहा— भरतनन्दन! इस विषयमें अष्टावक्र मुनिका उत्तर दिशाकी अधिष्ठात्रीदेवीके साथ जो संवाद हुआ था, उसी प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ १० ॥

निर्वेष्टुकामस्तु पुरा अष्टावक्रो महातपाः ।
ऋषेरथ वदान्यस्य वव्रे कन्यां महात्मनः ॥ ११ ॥
पूर्वकालकी बात है, महातपस्वी अष्टावक्र विवाह करना चाहते थे, उन्होंने इसके लिये महात्मा वदान्य ऋषिसे उनकी कन्या माँगी ॥ ११ ॥

सुप्रभां नाम वै नाम्ना रूपेणाप्रतिमां भुवि ।
गुणप्रभावशीलेन चारित्रेण च शोभनाम् ॥ १२ ॥
उस कन्याका नाम था सुप्रभा। इस पृथ्वीपर उसके रूपकी कहीं तुलना नहीं थी। गुण, प्रभाव, शील और चरित्र सभी दृष्टियोंसे वह परम सुन्दर थी ॥ १२ ॥

सा तस्य दृष्ट्वैव मनो जहार शुभलोचना ।
वनराजी यथा चित्रा वसन्ते कुसुमाचिता ॥ १३ ॥
जैसे वसंतऋतुमें सुन्दर फूलोंसे सजी हुई विचित्र वनश्रेणी मनुष्यके मनको लुभा लेती है, उसी प्रकार उस शुभलोचना मुनिकुमारीने दर्शनमात्रसे अष्टावक्रका मन चुरा लिया था ॥ १३ ॥

ऋषिस्तमाह देया मे सुता तुभ्यं हि तच्छृणु ।
(अनन्यस्त्रीजनः प्राज्ञो ह्यप्रवासी प्रियंवदः ।
सुरूपः सम्मतो वीरः शीलवान् भोगभुक्छविः ॥
दारानुमतयज्ञश्च सुनक्षत्रामथोद्वहेत् ।
स्वभर्त्रा स्वजनोपेत इह प्रेत्य च मोदते ॥)
गच्छ तावद् दिशं पुण्यामुत्तरां द्रक्ष्यसे ततः ॥ १४ ॥
वदान्य ऋषिने अष्टावक्रके माँगनेपर इस प्रकार उत्तर दिया—‘विप्रवर! जिसके दूसरी कोई स्त्री न हो, जो परदेशमें न रहता हो, विद्वान्, प्रिय वचन बोलनेवाला, लोकसम्मानित, वीर, सुशील, भोग भोगनेमें समर्थ, कान्तिमान् और सुन्दर पुरुष हो, उसीके साथ मुझे अपनी पुत्रीका विवाह करना है। जो स्त्रीकी अनुमतिसे यज्ञ करता और उत्तम नक्षत्रवाली कन्याको ब्याहता है, वह पुरुष अपनी पत्नीके साथ तथा पत्नी अपने पतिके साथ रहकर दोनों ही इहलोक और परलोकमें आनन्द भोगते हैं। मैं तुम्हें अपनी कन्या अवश्य दे दूँगा, परंतु पहले एक बात सुनो, यहाँसे परम पवित्र उत्तर दिशाकी ओर चले जाओ। वहाँ तुम्हें उसका दर्शन होगा’ ॥ १४ ॥

अष्टावक्र उवाच

किं द्रष्टव्यं मया तत्र वक्तुमर्हति मे भवान् ।
तथेदानीं मया कार्यं यथा वक्ष्यति मां भवान् ॥ १५ ॥
**अष्टावक्रने पूछा—**महर्षे! उत्तर दिशामें जाकर मुझे किसका दर्शन करना होगा? आप यह बतानेकी कृपा करें तथा उस समय मुझे क्या और किस प्रकार करना चाहिये, यह भी आप ही बतायेंगे ॥ १५ ॥

वदान्य उवाच

धनदं समतिक्रम्य हिमवन्तं च पर्वतम् ।
रुद्रस्यायतनं दृष्ट्वा सिद्धचारणसेवितम् ॥ १६ ॥
**वदान्यने कहा—**वत्स! तुम कुबेरकी अलकापुरीको लाँघकर जब हिमालय पर्वतको भी लाँघ जाओगे तब तुम्हें सिद्धों और चारणोंसे सेवित रुद्रके निवासस्थान कैलास पर्वतका दर्शन होगा ॥ १६ ॥
संहृष्टैः पार्षदैर्जुष्टं नृत्यद्भिर्विविधाननैः ।

दिव्याङ्गरागैः पैशाचैरन्यैर्नानाविधैः प्रभोः ॥ १७ ॥
वहाँ नाना प्रकारके मुखवाले भाँति-भाँतिके दिव्य अंगराग लगाये अनेकानेक पिशाच तथा अन्य भूत-वैताल आदि भगवान् शिवके पार्षदगण हर्ष और उल्लासमें भरकर नाच रहे होंगे ॥ १७ ॥
पाणितालसुतालैश्च शम्पातालैः समैस्तथा ।
सम्प्रहृष्टैः प्रनृत्यद्भिः शर्वस्तत्र निषेव्यते ॥ १८ ॥
वे करताल और सुन्दर ताल बजाकर शम्पा ताल देते हुए समभावसे हर्षविभोर हो जोर-जोरसे नृत्य करते हुए वहाँ भगवान् शंकरकी सेवा करते हैं ॥ १८ ॥
इष्टं किल गिरौ स्थानं तद्दिव्यमिति शुश्रुम ।
नित्यं संनिहितो देवस्तथा ते पार्षदाः स्मृताः ॥ १९ ॥
उस पर्वतका वह दिव्य स्थान भगवान् शंकरको बहुत प्रिय है। यह बात हमारे सुननेमें आयी है। वहाँ महादेवजी तथा उनके पार्षद नित्य निवास करते हैं ॥
तत्र देव्या तपस्तप्तं शङ्करार्थं सुदुश्चरम् ।
अतस्तदिष्टं देवस्य तथोमाया इति श्रुतिः ॥ २० ॥
वहाँ देवी पार्वती ने भगवान् शंकरकी प्राप्तिके लिये अत्यन्त दुष्कर तपस्या की थी, इसीलिये वह स्थान भगवान् शिव और पार्वतीको अधिक प्रिय है, ऐसा सुना जाता है ॥ २० ॥
पूर्वे तत्र महापाश्र्वं देवस्योत्तरतस्तथा ।
ऋतवः कालरात्रिश्च ये दिव्या ये च मानुषाः ॥ २१ ॥
देवं चोपासते सर्वे रूपिणः किल तत्र ह ।
तदतिक्रम्य भवनं त्वया यातव्यमेव हि ॥ २२ ॥
महादेवजीके पूर्व तथा उत्तर भागमें महापाश्र्व नामक पर्वत है, जहाँ ऋतु, कालरात्रि तथा दिव्य और मानुषभाव सब-के-सब मूर्तिमान् होकर महादेवजीकी उपासना करते हैं। उस स्थानको लाँघकर तुम आगे बढ़ते ही चले जाना ॥ २१-२२ ॥
ततो नीलं वनोद्देशं द्रक्ष्यसे मेघसंनिभम् ।
रमणीयं मनोग्राहि तत्र वै द्रक्ष्यसे स्त्रियम् ॥ २३ ॥
तपस्विनीं महाभागां वृद्धां दीक्षामनुष्ठिताम् ।
द्रष्टव्या सा त्वया तत्र सम्पूज्या चैव यत्नतः ॥ २४ ॥
तदनन्तर तुम्हें मेघोंकी घटाके समान नीला एक वन्य प्रदेश दिखायी देगा। वह बड़ा ही मनोरम और रमणीय है। उस वनमें तुम एक स्त्रीको देखोगे जो तपस्विनी, महान् सौभाग्यवती, वृद्धा और दीक्षापरायण है। तुम यत्नपूर्वक वहाँ उसका दर्शन और पूजन करना ॥ २३-२४ ॥
तां दृष्ट्वा विनिवृत्तस्त्वं ततः पाणिं ग्रहीष्यसि ।

यद्येष समयः सर्वः साध्यतां तत्र गम्यताम् ॥ २५ ॥ उसे देखकर लौटनेपर ही तुम मेरी पुत्रीका पाणिग्रहण कर सकोगे। यदि यह सारी शर्त स्वीकार हो तो इसे पूरी करनेमें लग जाओ और अभी वहाँकी यात्रा आरम्भ कर दो ॥ २५ ॥

अष्टावक्र उवाच

तथास्तु साधयिष्यामि तत्र यास्याम्यसंशयम् ।
यत्र त्वं वदसे साधो भवान् भवतु सत्यवाक् ॥ २६ ॥
अष्टावक्र बोले— ऐसा ही होगा, मैं यह शर्त पूरी करूँगा। श्रेष्ठ पुरुष! आप जहाँ कहते हैं वहाँ अवश्य जाऊँगा। आपकी वाणी सत्य हो ॥ २६ ॥

भीष्म उवाच

ततोऽगच्छत् स भगवानुत्तरामुत्तरां दिशम् ।
हिमवन्तं गिरिश्रेष्ठं सिद्धचारणसेवितम् ॥ २७ ॥
स गत्वा द्विजशार्दूलो हिमवन्तं महागिरिम् ।
अभ्यगच्छन्नदीं पुण्यां बाहुदां धर्मशालिनीम् ॥ २८ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तदनन्तर भगवान् अष्टावक्र उत्तरोत्तर दिशाकी ओर चल दिये। सिद्धों और चारणोंसे सेवित गिरिश्रेष्ठ महापर्वत हिमालयपर पहुँचकर वे श्रेष्ठ द्विज धर्मसे शोभा पानेवाली पुण्यमयी बाहुदा नदीके तटपर गये ॥ २७-२८ ॥
अशोके विमले तीर्थे स्नात्वा वै तर्प्य देवताः ।
तत्र वासाय शयने कौशे सुखमुवास ह ॥ २९ ॥
वहाँ निर्मल अशोक तीर्थमें स्नान करके देवताओंका तर्पण करनेके पश्चात् उन्होंने कुशकी चटाईपर सुखपूर्वक निवास किया ॥ २९ ॥
ततो रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरुत्थाय स द्विजः ।
स्नात्वा प्रादुश्चकाराग्निं स्तुत्वा चैनं प्रधानतः ॥ ३० ॥
रुद्राणीं रुद्रमासाद्य ह्रदे तत्र समाश्वसत् ।
विश्रान्तश्च समुत्थाय कैलासमभितो ययौ ॥ ३१ ॥
तदनन्तर रात बीतनेपर वे द्विज प्रातःकाल उठे और उन्होंने स्नान करके अग्निदेवको प्रज्वलित किया। फिर मुख्य-मुख्य वैदिक मन्त्रोंसे अग्निदेवकी स्तुति करके ‘रुद्राणी रुद्र’ नामक तीर्थमें गये और वहाँ सरोवरके तटपर कुछ कालतक विश्राम करते रहे। विश्रामके पश्चात् उठकर वे कैलासकी ओर चल दिये ॥ ३०-३१ ॥
सोऽपश्यत् काञ्चनद्वारं दीप्यमानमिव श्रिया ।
मन्दाकिनीं च नलिनीं धनदस्य महात्मनः ॥ ३२ ॥

कुछ दूर जानेपर उन्होंने कुबेरकी अलकापुरीका सुवर्णमय द्वार देखा, जो दिव्य दीप्तिसे देदीप्यमान हो रहा था। वहीं महात्मा कुबेरकी कमलपुष्पोंसे सुशोभित एक बावड़ी देखी, जो गंगाजीके जलसे परिपूर्ण होनेके कारण मन्दाकिनी नामसे विख्यात थी ॥ ३२ ॥

अथ ते राक्षसाः सर्वे येऽभिरक्षन्ति पद्मिनीम्।
प्रत्युत्थिता भगवन्तं मणिभद्रपुरोगमाः ॥ ३३ ॥
वहाँ जो उस पद्मपूर्ण पुष्करिणीकी रक्षा कर रहे थे, वे सब मणिभद्र आदि राक्षस भगवान् अष्टावक्रको देखकर उनके स्वागतके लिये उठकर खड़े हो गये ॥

स तान् प्रत्यर्चयामास राक्षसान् भीमविक्रमान्।
निवेदयत मां क्षिप्रं धनदायेति चाब्रवीत् ॥ ३४ ॥
मुनिने भी उन भयंकर पराक्रमी राक्षसोंके प्रति सम्मान प्रकट किया और कहा—‘आपलोग शीघ्र ही धनपति कुबेरको मेरे आगमनकी सूचना दे दें’ ॥ ३४ ॥

ते राक्षसास्तथा राजन् भगवन्तमथाब्रुवन्।
असौ वैश्रवणो राजा स्वयमायाति तेऽन्तिकम् ॥ ३५ ॥
राजन्! वे राक्षस वैसा करके भगवान् अष्टावक्रसे बोले—‘प्रभो! राजा कुबेर स्वयं ही आपके निकट पधार रहे हैं’ ॥ ३५ ॥

विदितो भगवानस्य कार्यमागमनस्य यत्।
पश्यैनं त्वं महाभागं ज्वलन्तमिव तेजसा ॥ ३६ ॥
‘आपका आगमन और इस आगमनका जो उद्देश्य है, वह सब कुछ कुबेरको पहलेसे ही ज्ञात है। देखिये, ये महाभाग धनाध्यक्ष अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए आ रहे हैं’ ॥ ३६ ॥

ततो वैश्रवणोऽभ्येत्य अष्टावक्रमनिन्दितम्।
विधिवत्कुशलं पृष्ट्वा ततो ब्रह्मर्षिमब्रवीत् ॥ ३७ ॥
तदनन्तर विश्रवाके पुत्र कुबेरने निकट आकर निन्दारहित ब्रह्मर्षि अष्टावक्रसे विधिपूर्वक कुशल-समाचार पूछते हुए कहा— ॥ ३७ ॥

सुखं प्राप्तो भवान् कच्चित् किं वा मत्तश्चिकीर्षति।
ब्रूहि सर्वं करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि वै द्विज ॥ ३८ ॥
‘ब्रह्मन्! आप सुखपूर्वक यहाँ आये हैं न? बताइये मुझसे किस कार्यकी सिद्धि चाहते हैं? आप मुझसे जो-जो कहेंगे, वह सब पूर्ण करूँगा’ ॥ ३८ ॥

भवनं प्रविश त्वं मे यथाकामं द्विजोत्तम।
सत्कृतः कृतकार्यश्च भवान् यास्यत्यविघ्नतः ॥ ३९ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! आप इच्छानुसार मेरे भवनमें प्रवेश कीजिये और यहाँका सत्कार ग्रहण करके कृतकृत्य हो यहाँसे निर्विघ्न यात्रा कीजियेगा ॥ ३९ ॥

प्राविशद् भवनं स्वं वै गृहीत्वा तं द्विजोत्तमम्।

आसनं स्वं ददौ चैव पाद्यमर्घ्यं तथैव च ॥ ४० ॥
ऐसा कहकर कुबेरने विप्रवर अष्टावक्रको साथ लेकर अपने भवनमें प्रवेश किया और उन्हें पाद्य, अर्घ्य तथा अपना आसन दिया ॥ ४० ॥
अथोपविष्टयोस्तत्र मणिभद्रपुरोगमाः ।
निषेदुस्तत्र कौबेरा यक्षगन्धर्वकिन्नराः ॥ ४१ ॥
जब कुबेर और अष्टावक्र दोनों वहाँ आरामसे बैठ गये तब कुबेरके सेवक मणिभद्र आदि यक्ष, गन्धर्व और किन्नर भी नीचे बैठ गये ॥ ४१ ॥
ततस्तेषां निषण्णानां धनदो वाक्यमब्रवीत् ।
भवच्छन्दं समाज्ञाय नृत्येयुरप्सरोगणाः ॥ ४२ ॥
आतिथ्यं परमं कार्यं शुश्रूषा भवतस्तथा ।
संवर्ततामित्युवाच मुनिर्मधुरया गिरा ॥ ४३ ॥
उन सबके बैठ जानेपर कुबेरने कहा—'आपकी इच्छा हो तो उसे जानकर यहाँ अप्सराएँ नृत्य करें; क्योंकि आपका आतिथ्य सत्कार और सेवा करना हमलोगोंका परम कर्तव्य है।' तब मुनिने मधुर वाणीमें कहा, 'तथास्तु—ऐसा ही हो' ॥ ४२-४३ ॥
अथोर्वरा मिश्रकेशी रम्भा चैवोर्वशी तथा ।
अलम्बुषा घृताची च चित्रा चित्राङ्गदा रुचिः ॥ ४४ ॥
मनोहरा सुकेशी च सुमुखी हासिनी प्रभा ।
विद्युता प्रशमी दान्ता विद्योता रतिरेव च ॥ ४५ ॥
एताश्चान्याश्च वै बह्व्यः प्रनृत्ताप्सरसः शुभाः ।
अवादयंश्च गन्धर्वा वाद्यानि विविधानि च ॥ ४६ ॥
तदनन्तर उर्वरा, मिश्रकेशी, रम्भा, उर्वशी, अलम्बुषा, घृताची, चित्रा, चित्रांगदा, रुचि, मनोहरा, सुकेशी, सुमुखी, हासिनी, प्रभा, विद्युता, प्रशमी, दान्ता, विद्योता और रति—ये तथा और भी बहुत-सी शुभलक्षणा अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और गन्धर्वगण नाना प्रकारके बाजे बजाने लगे ॥ ४४—४६ ॥
अथ प्रवृत्ते गान्धर्वे दिव्ये ऋषिरुपाविशत् ।
दिव्यं संवत्सरं तत्रारमतैष महातपाः ॥ ४७ ॥
वह दिव्य नृत्य-गीत आरम्भ होनेपर महातपस्वी ऋषि अष्टावक्र भी दर्शक-मण्डलीमें आ बैठे और वे देवताओंके वर्षसे एक वर्षतक इसी आमोद-प्रमोदमें रमते रहे ॥ ४७ ॥
ततो वैश्रवणो राजा भगवन्तमुवाच ह ।
साग्रः संवत्सरो जातो विप्रेह तव पश्यतः ॥ ४८ ॥
तब राजा वैश्रवण (कुबेर)-ने भगवान् अष्टावक्रसे कहा—'विप्रवर! यहाँ नृत्य देखते हुए आपका एक वर्षसे कुछ अधिक समय व्यतीत हो गया है ॥ ४८ ॥
हार्योऽयं विषयो ब्रह्मन् गान्धर्वो नाम नामतः ।

छन्दतो वर्ततां विप्र यथा वदति वा भवान् ।। ४९ ।।
‘ब्रह्मन्! यह नृत्य-गीतका विषय जिसे ‘गान्धर्व’ नाम दिया गया है बड़ा मनोहारी है; अतः यदि आपकी इच्छा हो तो यह आयोजन कुछ दिन और इसी तरह चलता रहे अथवा विप्रवर! आप जैसी आज्ञा दें वैसा किया जाय ।। ४९ ।।
अतिथिः पूजनीयस्त्वमिदं च भवतो गृहम् ।
सर्वमाज्ञाप्यतामाशु परवन्तो वयं त्वयि ।। ५० ।।
‘आप मेरे पूजनीय अतिथि हैं। यह घर आपका ही है। आप निस्संकोच भावसे शीघ्र ही सभी कार्योंके लिये हमें आज्ञा दें। हम आपके वशवर्ती किंकर हैं’ ।।
अथ वैश्रवणं प्रीतो भगवान् प्रत्यभाषत ।
अर्चितोऽस्मि यथान्यायं गमिष्यामि धनेश्वर ।। ५१ ।।
तब अत्यन्त प्रसन्न हुए भगवान् अष्टावक्रने कुबेरसे कहा—‘धनेश्वर! आपने यथोचित रूपसे मेरा सत्कार किया है। अब आज्ञा दें, मैं यहाँसे जाऊँगा ।। ५१ ।।
प्रीतोऽस्मि सदृशं चैव तव सर्वं धनाधिप ।
तव प्रसादाद् भगवन् महर्षेश्च महात्मनः ।। ५२ ।।
नियोगादद्य यास्यामि वृद्धिमानृद्धिमान् भव ।
अथ निष्क्रम्य भगवान् प्रययावुत्तरामुखः ।। ५३ ।।
‘धनाधिप! मैं बहुत प्रसन्न हूँ। आपकी सारी बातें आपके अनुरूप ही हैं। भगवन्! अब मैं आपकी कृपासे उन महात्मा महर्षि वदान्यकी आज्ञाके अनुसार आगे जाऊँगा। आप अभ्युदयशील एवं समृद्धिशाली हों।' इतना कहकर भगवान् अष्टावक्र उत्तर दिशाकी ओर मुँह करके चल दिये ।। ५२-५३ ।।
कैलासं मन्दरं हैमं सर्वाननुचचार ह ।
एवं समूचे कैलास, मन्दराचल और हिमालयपर विचरण करने लगे ।। ५३ ½ ।।
तानतीत्य महाशैलान् कैरातं स्थानमुत्तमम् ।। ५४ ।।
प्रदक्षिणं तथा चक्रे प्रयतः शिरसा नतः ।
धरणीमवतीर्याथ पूतात्मासौ तदाभवत् ।। ५५ ।।
उन बड़े-बड़े पर्वतोंको लाँघकर यतचित्त हो उन्होंने किरातवेषधारी महादेवजीके उत्तम स्थानकी परिक्रमा की और उसे मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। फिर नीचे पृथ्वीपर उतरकर वे उस स्थानके माहात्म्यसे तत्काल पवित्रात्मा हो गये ।। ५४-५५ ।।
स तं प्रदक्षिणं कृत्वा त्रिः शैलं चोत्तरामुखः ।
समेन भूमिभागेन ययौ प्रीतिपुरस्कृतः ।। ५६ ।।
तीन बार उस पर्वतकी परिक्रमा करके वे उत्तराभिमुख हो समतल भूमिसे प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़े ।। ५६ ।।
ततोऽपरं वनोद्देशं रमणीयमपश्यत ।

सर्वर्तुभिर्मूलफलैः पक्षिभिश्च समन्वितैः ॥ ५७ ॥ रमणीयैर्वनोद्देशैस्तत्र तत्र विभूषितम् । आगे जानेपर उन्हें एक दूसरी रमणीय वनस्थली दिखायी दी, जो सभी ऋतुओंके फल-मूलों, पक्षिसमूहों और मनोरम वनप्रान्तोंसे जहाँ-तहाँ शोभासम्पन्न हो रही थी ॥ ५७ १/२ ॥

तत्राश्रमपदं दिव्यं ददर्श भगवानथ ॥ ५८ ॥ शैलांश्च विविधाकारान् काञ्चनान् रत्नभूषितान् । मणिभूमौ निविष्टांश्च पुष्करिण्यस्तथैव च ॥ ५९ ॥ वहाँ भगवान् अष्टावक्रने एक दिव्य आश्रम देखा। उस आश्रमके चारों ओर नाना प्रकारके सुवर्णमय एवं रत्नभूषित पर्वत शोभा पा रहे थे। वहाँकी मणिमयी भूमिपर कई सुन्दर बावड़ियाँ बनी थीं ॥ ५८-५९ ॥

अन्यान्यपि सुरम्याणि पश्यतः सुबहून्यथ । भृशं तस्य मनो रेमे महर्षेर्भावितात्मनः ॥ ६० ॥ इनके सिवा और भी बहुत-से सुरम्य दृश्य वहाँ दिखायी देते थे। उन सबको देखते हुए उन भावितात्मा महर्षिका मन वहाँ विशेष आनन्दका अनुभव करने लगा ॥

स तत्र काञ्चनं दिव्यं सर्वरत्नमयं गृहम् । ददर्शाद्भुतसंकाशं धनदस्य गृहाद् वरम् ॥ ६१ ॥ महर्षिने उस प्रदेशमें एक दिव्य सुवर्णमय भवन देखा, जिसमें सब प्रकारके रत्न जड़े गये थे। वह मनोहर गृह कुबेरके राजभवनसे भी सुन्दर, श्रेष्ठ एवं अद्भुत था ॥ ६१ ॥

महान्तो यत्र विविधा मणिकाञ्चनपर्वताः । विमानानि च रम्याणि रत्नानि विविधानि च ॥ ६२ ॥ वहाँ भाँति-भाँतिके मणिमय और सुवर्णमय विशाल पर्वत शोभा पाते थे। अनेकानेक सुरम्य विमान तथा नाना प्रकारके रत्न दृष्टिगोचर होते थे ॥ ६२ ॥

मन्दारपुष्पैः संकीर्णां तथा मन्दाकिनीं नदीम् । स्वयंप्रभांश्च मणयो वज्रैर्भूमिश्च भूषिता ॥ ६३ ॥ उस प्रदेशमें मन्दाकिनी नदी प्रवाहित होती थी, जिसके स्रोतमें मन्दारके पुष्प बह रहे थे। वहाँ स्वयं प्रकाशित होनेवाली मणियाँ अपनी अद्भुत छटा बिखेर रही थीं। वहाँकी भूमि हीरोंसे जड़ी गयी थी ॥ ६३ ॥

नानाविधैश्च भवनैर्विचित्रमणितोरणैः । मुक्ताजालविनिक्षिप्तैर्मणिरत्नविभूषितैः ॥ ६४ ॥ मनोदृष्टिहरै रम्यैः सर्वतः संवृतं शुभैः । ऋषिभिश्चावृतं तत्र आश्रमं तं मनोहरम् ॥ ६५ ॥ उस आश्रमके चारों ओर विचित्र मणिमय तोरणोंसे सुशोभित, मोतीकी झालरोंसे अलंकृत तथा मणि एवं रत्नोंसे विभूषित सुन्दर भवन शोभा पा रहे थे। वे मनको मोह

लेनेवाले तथा दृष्टिको बरबस अपनी ओर आकृष्ट कर लेनेवाले थे। उन मंगलमय भवनोंसे घिरा और ऋषि-मुनियोंसे भरा हुआ वह आश्रम बड़ा मनोहर जान पड़ता था ॥ ६४-६५ ॥

ततस्तस्याभवच्चिन्ता कुत्र वासो भवेदिति ।
अथ द्वारं समभितो गत्वा स्थित्वा ततोऽब्रवीत् ॥ ६६ ॥
वहाँ पहुँचकर अष्टावक्रके मनमें यह चिन्ता हुई कि अब कहाँ ठहरा जाय। यह विचार उठते ही वे प्रमुख द्वारके समीप गये और खड़े होकर बोले— ॥ ६६ ॥

अतिथिं समनुप्राप्तमभिजानन्तु येऽत्र वै ।
अथ कन्याः परिवृता गृहात् तस्माद् विनिर्गताः ॥ ६७ ॥
नानारूपाः सप्त विभो कन्याः सर्वा मनोहराः ।
यां यामपश्यत् कन्यां वै सा सा तस्य मनोऽहरत् ॥ ६८ ॥
'इस घरमें जो लोग रहते हों, उन्हें यह विदित होना चाहिये कि मैं एक अतिथि यहाँ आया हूँ।' उनके इस प्रकार कहते ही उस घरसे एक साथ सात कन्याएँ निकलीं। वे सब-की-सब भिन्न-भिन्न रूपवाली तथा बड़ी मनोहर थीं। विभो! अष्टावक्र मुनि उनमेंसे जिस-जिस कन्याकी ओर देखते, वही-वही उनका मन हर लेती थी ॥ ६७-६८ ॥

न च शक्तो वारयितुं मनोऽस्याथावसीदति ।
ततो धृतिः समुत्पन्ना तस्य विप्रस्य धीमतः ॥ ६९ ॥
वे अपने मनको रोक नहीं पाते थे। बलपूर्वक रोकनेपर उनका मन शिथिल होता जाता था। तदनन्तर उन बुद्धिमान् ब्राह्मणके हृदयमें किसी तरह धैर्य उत्पन्न हुआ ॥ ६९ ॥

अथ तं प्रमदाः प्राहुर्भगवान् प्रविशत्विति ।
स च तासां सुरूपाणां तस्यैव भवनस्य हि ॥ ७० ॥
कौतूहलं समाविष्टः प्रविवेश गृहं द्विजः ।
तत्पश्चात् वे सातों तरुणी स्त्रियाँ बोलीं—'भगवन्! आप घरके भीतर प्रवेश करें।' ऋषिके मनमें उन सुन्दरियोंके तथा उस घरके विषयमें कौतूहल पैदा हो गया था; अतः उन्होंने उस घरमें प्रवेश किया ॥ ७० १/२ ॥

तत्रापश्यज्जरायुक्तामरजोऽम्बरधारिणीम् ॥ ७१ ॥
वृद्धां पर्यङ्कमासीनां सर्वाभरणभूषिताम् ।
वहाँ उन्होंने एक जराजीर्ण वृद्धा स्त्रीको देखा, जो निर्मल वस्त्र धारण किये समस्त आभूषणोंसे विभूषित हो पलँगपर बैठी हुई थी ॥ ७१ १/२ ॥

स्वस्तीति तेन चैवोक्ता सा स्त्री प्रत्यवदत् तदा ॥ ७२ ॥
प्रत्युत्थाय च तं विप्रमास्यतामित्युवाच ह ।
अष्टावक्रने 'स्वस्ति' कहकर उसे आशीर्वाद दिया। वह स्त्री उनके स्वागतके लिये पलँगसे उठकर खड़ी हो गयी और इस प्रकार बोली—'विप्रवर! बैठिये' ॥ ७२ १/२ ॥