भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 284, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 284

**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**राजन्! सूर्यके समान तपते हुए-से तेजस्वी उपमन्युने मेरे समीप कहा था कि ‘जो पापकर्मी मनुष्य अपने अशुभ आचरणोंसे कलुषित हो गये हैं, वे तमोगुणी या रजोगुणी वृत्तिके लोग भगवान् शिवकी शरण नहीं लेते हैं ॥ ६१-६२ ॥ ईश्वरं सम्प्रपद्यन्ते द्विजा भावितभावनाः । सर्वथा वर्तमानोऽपि यो भक्तः परमेश्वरे ॥ ६३ ॥ सदृशोऽरण्यवासीनां मुनीनां भावितात्मनाम् । ‘जिनका अन्तःकरण पवित्र है, वे ही द्विज महादेवजीकी शरण लेते हैं। जो परमेश्वर शिवका भक्त है, वह सब प्रकारसे बर्तता हुआ भी पवित्र अन्तःकरणवाले वनवासी मुनियोंके समान है ॥ ६३ १/२ ॥ ब्रह्मत्वं केशवत्वं वा शक्रत्वं वा सुरैः सह ॥ ६४ ॥ त्रैलोक्यस्याधिपत्यं वा तुष्टो रुद्रः प्रयच्छति । ‘भगवान् रुद्र संतुष्ट हो जायँ तो वे ब्रह्मपद, विष्णुपद, देवताओंसहित देवेन्द्रपद अथवा तीनों लोकोंका आधिपत्य प्रदान कर सकते हैं ॥ ६४ १/२ ॥ मनसापि शिवं तात ये प्रपद्यन्ति मानवाः ॥ ६५ ॥ विधूय सर्वपापानि देवैः सह वसन्ति ते । ‘तात! जो मनुष्य मनसे भी भगवान् शिवकी शरण लेते हैं, वे सब पापोंका नाश करके देवताओंके साथ निवास करते हैं ॥ ६५ ॥ भित्त्वा भित्त्वा च कूलानि हुत्वा सर्वमिदं जगत् ॥ ६६ ॥ यजेद् देवं विरूपाक्षं न स पापेन लिप्यते । ‘बारंबार तालाबके तटभूमिको खोद-खोदकर उन्हें चौपट कर देनेवाला और इस सारे जगत्‌को जलती आगमें झोंक देनेवाला पुरुष भी यदि महादेवजीकी आराधना करता है तो वह पापसे लिप्त नहीं होता है ॥ सर्वलक्षणहीनोऽपि युक्तो वा सर्वपातकैः ॥ ६७ ॥ सर्वं तुदति तत्पापं भावयञ्छिवमात्मना । ‘समस्त लक्षणोंसे हीन अथवा सब पापोंसे युक्त मनुष्य भी यदि अपने हृदयसे भगवान् शिवका ध्यान करता है तो वह अपने सारे पापोंको नष्ट कर देता है ॥ ६७ १/२ ॥ कीटपक्षिपतङ्गानां तिरश्चामपि केशव ॥ ६८ ॥ महादेवप्रपन्नानां न भयं विद्यते क्वचित् । ‘केशव! कीट, पतंग, पक्षी तथा पशु भी यदि महादेवजीकी शरणमें आ जायँ तो उन्हें भी कहीं किसीका भय नहीं प्राप्त होता है ॥ ६८ १/२ ॥ एवमेव महादेवं भक्ता ये मानवा भुवि ॥ ६९ ॥ न ते संसारवशगा इति मे निश्चिता मतिः । ततः कृष्णोऽब्रवीद् वाक्यं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ ७० ॥

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