महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 283, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंभविष्यथ विश क्षिप्रं द्रष्टासि पितरं क्षये ।
माताकी बात सुनकर मैं पिताके दर्शनसे निराश हो गया और मनको संयममें रखकर महादेवजीकी आराधना करके उनका दर्शन किया। उस समय वे मुझसे बोले—‘वत्स! तुम्हारे पिता, माता और तुम तीनों ही मृत्युसे रहित हो जाओगे। अब तुम अपने घरमें शीघ्र प्रवेश करो। वहाँ तुम्हें पिताका दर्शन प्राप्त होगा’ ।।
अनुज्ञातो भगवता गृहं गत्वा युधिष्ठिर ।। ५६ ।।
अपश्यं पितरं तात इष्टिं कृत्वा विनिःसृतम् ।
उपस्पृश्य गृहीत्वेध्मं कुशांश्च शरणाकुरून् ।। ५७ ।।
तात युधिष्ठिर! भगवान् शिवकी आज्ञासे मैंने पुनः घर जाकर वहाँ यज्ञ करके यज्ञशालासे निकले हुए पिताका दर्शन किया। वे उस समय समिधा, कुश और वृक्षोंसे अपने-आप गिरे हुए पके फल आदि हव्य पदार्थ लिये हुए थे ।। ५६-५७ ।।
तान् विसृज्य च मां प्राह पिता सास्त्राविलेक्षणः ।
प्रणमन्तं परिष्वज्य मूर्ध्युपाघ्राय पाण्डव ।। ५८ ।।
दिष्ट्या दृष्टोऽसि मे पुत्र कृतविद्य इहागतः ।
पाण्डुनन्दन! उन्हें देखते ही मैं उनके चरणोंमें पड़ गया; फिर पिताजीने भी उन समिधा आदि वस्तुओंको अलग रखकर मुझे हृदयसे लगा लिया और मेरा मस्तक सूँघकर नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए मुझसे कहा—‘बेटा! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम विद्वान् होकर घर आ गये और मैंने तुम्हें भर आँख देख लिया’ ।। ५८१/२ ।।
वैशम्पायन उवाच
एतान्यत्यद्भुतान्येव कर्माण्यथ महात्मनः ।। ५९ ।।
प्रोक्तानि मुनिभिः श्रुत्वा विस्मयामास पाण्डवः ।
ततः कृष्णोऽब्रवीद् वाक्यं पुनर्मतिमतां वरः ।। ६० ।।
युधिष्ठिरं धर्मनिधिं पुरुहूतमिवेश्वरः ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! मुनियोंके कहे हुए महादेवजीके ये अद्भुत चरित्र सुनकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको बड़ा विस्मय हुआ। फिर बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्णने धर्मनिधि युधिष्ठिरसे उसी प्रकार कहा जैसे श्रीविष्णु देवराज इन्द्रसे कोई बात कहा करते हैं ।। ५९-६०१/२ ।।
वासुदेव उवाच
उपमन्युर्मयि प्राह तपन्निव दिवाकरः ।। ६१ ।।
अशुभैः पापकर्माणो ये नराः कलुषीकृताः ।
ईशानं न प्रपद्यन्ते तमोराजसवृत्तयः ।। ६२ ।।