महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततः स ऋषिरैकाग्रस्तां स्त्रियं प्रत्यभाषत । आस्यतां रुचितश्छन्दः किं च कार्यं ब्रवीहि मे ॥ ९५ ॥ भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तब ऋषिने एकाग्रचित्त होकर उस स्त्रीसे कहा—'चुप रहो। मनमें भोगकी रुचि होनेपर स्वेच्छाचार होता है। मेरी रुचि नहीं है, अतः मुझसे यह काम नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त यदि मुझसे कोई काम हो तो बताओ' ॥ ९५ ॥
सा स्त्री प्रोवाच भगवन् द्रक्ष्यसे देशकालतः । वस तावन्महाभाग कृतकृत्यो भविष्यसि ॥ ९६ ॥ उस स्त्रीने कहा—'भगवन्! महाभाग! देश और कालके अनुसार आपको अनुभव हो जायगा। आप यहाँ रहिये, कृतकृत्य हो जाइयेगा' ॥ ९६ ॥
ब्रह्मर्षिस्तामथोवाच स तथेति युधिष्ठिर । वत्स्येऽहं यावदुत्साहो भवत्या नात्र संशयः ॥ ९७ ॥ युधिष्ठिर! तब ब्रह्मर्षिने उससे कहा—'ठीक है, जबतक मेरे मनमें यहाँ रहनेका उत्साह होगा तबतक आपके साथ रहूँगा, इसमें संशय नहीं है' ॥ ९७ ॥
अथर्षिरभिसम्प्रेक्ष्य स्त्रियं तां जरयार्दिताम् । चिन्तां परमिकां भेजे संतप्त इव चाभवत् ॥ ९८ ॥ इसके बाद ऋषि उस स्त्रीको जरावस्थासे पीड़ित देख बड़ी चिन्तामें पड़ गये और संतप्त-से हो उठे ॥ ९८ ॥
यद् यदङ्गं हि सोऽपश्यत् तस्या विप्रर्षभस्तदा । नारमत् तत्र तत्रास्य दृष्टी रूपविरागिता ॥ ९९ ॥ विप्रवर अष्टावक्र उसका जो-जो अंग देखते थे वहाँ-वहाँ उनकी दृष्टि रमती नहीं थी, अपितु उसके रूपसे विरक्त हो उठती थी ॥ ९९ ॥
देवतेयं गृहस्यास्य शापात् किं नु विरूपिता । अस्याश्च कारणं वेत्तुं न युक्तं सहसा मया ॥ १०० ॥ वे सोचने लगे 'यह नारी तो इस घरकी अधिष्ठात्री देवी है। फिर इसे इतना कुरूप किसने बना दिया? इसकी कुरूपताका कारण क्या है? इसे किसीका शाप तो नहीं लग गया। इसकी कुरूपताका कारण जाननेके लिये सहसा चेष्टा करना मेरे लिये उचित नहीं है' ॥ १०० ॥
इति चिन्ताविविक्तस्य तमर्थं ज्ञातुमिच्छतः । व्यगच्छत् तदहःशेषं मनसा व्याकुलेन तु ॥ १०१ ॥ इस प्रकार व्याकुल चित्तसे एकान्तमें बैठकर चिन्ता करते और उसकी कुरूपताका कारण जाननेकी इच्छा रखते हुए महर्षिका वह सारा दिन बीत चला ॥
अथ सा स्त्री तथोवाच भगवन् पश्य वै रवेः । रूपं संध्याभ्रसंरक्तं किमुपस्थाप्यतां तव ॥ १०२ ॥