भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 304

तदनन्तर वे मुनि अत्यन्त आश्चर्यचकित होकर उठ बैठे। उन्होंने देखा कि पूर्व-दिशाके आकाशमें सूर्यदेवका उदय हो गया है। वे सोचने लगे, क्या यह मेरा मोह है या वास्तवमें सूर्योदय हो गया है ।। ६-७ ।।

अथोपास्य सहस्त्रांशुं किं करोमीत्युवाच ताम् ।
सा चामृतरसप्रख्यं ऋषेरन्नमुपाहरत् ।। ८ ।।
फिर तो तत्काल स्नान, संध्योपासना और सूर्योपस्थान करके उससे बोले, ‘अब क्या करूँ?’ तब उस स्त्रीने ऋषिके समक्ष अमृतरसके समान मधुर अन्न परोसकर रखा ।। ८ ।।

तस्य स्वादुतयान्नस्य न प्रभूतं चकार सः ।
व्यगमच्चाप्यहःशेषं ततः संध्यागमत् पुनः ।। ९ ।।
उस अन्नके स्वादसे वे इतने आकृष्ट हो गये कि उसे पर्याप्त न मान सके—‘बस अब पूरा हो गया’ यह बात न कह सके। इसीमें सारा दिन निकल गया और पुनः संध्याकाल आ पहुँचा ।। ९ ।।

अथ सा स्त्री भगवन्तं सुप्यतामित्यचोदयत् ।
तत्र वै शयने दिव्ये तस्य तस्याश्च कल्पिते ।। १० ।।
इसके बाद उस स्त्रीने भगवान् अष्टावक्रसे कहा—‘अब आप सो जाइये।’ फिर वहीं उनके और उस स्त्रीके लिये दो शय्याएँ बिछायी गयीं ।। १० ।।

पृथक् चैव तथा सुप्तौ सा स्त्री स च मुनिस्तदा ।
तथार्धरात्रे सा स्त्री तु शयनं तदुपागमत् ।। ११ ।।
उस समय वह स्त्री और मुनि दोनों अलग-अलग सो गये। जब आधी रात हुई तब वह स्त्री उठकर मुनिकी शय्यापर आ बैठी ।। ११ ।।

अष्टावक्र उवाच

न भद्रे परदारेषु मनो मे सम्प्रसज्जति ।
उत्तिष्ठ भद्रे भद्रं ते स्वयं वै विरमस्व च ।। १२ ।।
**अष्टावक्र बोले—**भद्रे! मेरा मन परायी स्त्रियोंमें आसक्त नहीं होता है। तुम्हारा भला हो, यहाँसे उठो और स्वयं ही इस पापकर्मसे विरत हो जाओ ।। १२ ।।

भीष्म उवाच

सा तदा तेन विप्रेण तथा तेन निवर्तिता ।
स्वतन्त्रास्मीत्युवाचर्षिं न धर्मच्छलमस्ति ते ।। १३ ।।
**भीष्मजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार उन ब्रह्मर्षिके लौटानेपर उसने कहा—‘मैं स्वतन्त्र हूँ; अतः मेरे साथ समागम करनेसे आपके धर्मकी छलना नहीं होगी’ ।। १३ ।।

अष्टावक्र उवाच