महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 305, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंनास्ति स्वतन्त्रता स्त्रीणामस्वतन्त्रा हि योषितः । प्रजापतिमतं ह्येतन्न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति ॥ १४ ॥ अष्टावक्र बोले— भद्रे! स्त्रियोंकी स्वतन्त्रता नहीं सिद्ध होती; क्योंकि वे परतन्त्र मानी गयी हैं। प्रजापतिका यह मत है कि स्त्री स्वतन्त्र रहनेयोग्य नहीं है ॥ १४ ॥
स्त्र्युवाच बाधते मैथुनं विप्र मम भक्तिं च पश्य वै । अधर्मं प्राप्स्यसे विप्र यन्मां त्वं नाभिनन्दसि ॥ १५ ॥ स्त्री बोली— ब्रह्मन्! मुझे मैथुनकी भूख सता रही है। आपके प्रति जो मेरी भक्ति है, इसपर भी तो दृष्टिपात कीजिये। विप्रवर! यदि आप मुझे संतुष्ट नहीं करते हैं तो आपको पाप लगेगा ॥ १५ ॥
अष्टावक्र उवाच हरन्ति दोषजातानि नरं जातं यथेच्छकम् । प्रभवामि सदा धृत्या भद्रे स्वशयनं व्रज ॥ १६ ॥ अष्टावक्रने कहा— भद्रे! स्वेच्छाचारी मनुष्यको ही सब प्रकारके पापसमूह अपनी ओर खींचते हैं। मैं धैर्यके द्वारा सदा अपने मनको काबूमें रखता हूँ; अतः तुम अपनी शय्यापर लौट जाओ ॥ १६ ॥
स्त्र्युवाच शिरसा प्रणमे विप्र प्रसादं कर्तुमर्हसि । भूमौ निपतमानायाः शरणं भव मेऽनघ ॥ १७ ॥ स्त्री बोली— अनघ! विप्रवर! मैं सिर झुकाकर प्रणाम करती हूँ और आपके सामने पृथ्वीपर पड़ी हूँ। आप मुझपर कृपा करें और मुझे शरण दें ॥ १७ ॥ यदि वा दोषजातं त्वं परदारेषु पश्यसि । आत्मानं स्पर्शयाम्यद्य पाणिं गृह्णीष्व मे द्विज ॥ १८ ॥ ब्रह्मन्! यदि आप परायी स्त्रियोंके साथ समागममें दोष देखते हैं तो मैं स्वयं आपको अपना दान करती हूँ। आप मेरा पाणिग्रहण कीजिये ॥ १८ ॥ न दोषो भविता चैव सत्येनैतद् ब्रवीम्यहम् । स्वतन्त्रां मां विजानीहि योऽधर्मः सोऽस्तु वै मयि । त्वय्यावेशितचित्ता च स्वतन्त्रास्मि भजस्व माम् ॥ १९ ॥ मैं सच कहती हूँ, आपको कोई दोष नहीं लगेगा। आप मुझे स्वतन्त्र समझिये। इसमें जो पाप होता है, वह मुझे ही लगे। मेरा चित्त आपके ही चिन्तनमें लगा है। मैं स्वतन्त्र हूँ; अतः मुझे स्वीकार कीजिये ॥ १९ ॥