महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 347, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंअपां ह्रद उपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत् । ब्रह्मचारी जितक्रोधः सत्यसंधस्त्वहिंसकः ॥ १४ ॥ यदि कोई क्रोधहीन, सत्यप्रतिज्ञ और अहिंसक होकर ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक सलिलह्रद नामक तीर्थमें डुबकी लगाये तो उसे अश्वमेध यज्ञका फल मिलता है ॥ १४ ॥ यत्र भागीरथी गङ्गा पतते दिशमुत्तराम् । महेश्वरस्य त्रिस्थाने यो नरस्त्वभिषिच्यते ॥ १५ ॥ एकमासं निराहारः स पश्यति हि देवताः । जहाँ उत्तर दिशामें भागीरथी गंगा गिरती हैं और वहाँ उनका स्रोत तीन भागोंमें विभक्त हो जाता है, वह भगवान् महेश्वरका त्रिस्थान नामक तीर्थ है। जो मनुष्य एक मासतक निराहार रहकर वहाँ स्नान करता है, उसे देवताओंका प्रत्यक्ष दर्शन होता है ॥ १५ १/२ ॥ सप्तगङ्गे त्रिगङ्गे च इन्द्रमार्गे च तर्पयन् ॥ १६ ॥ सुधां वै लभते भोक्तुं यो नरो जायते पुनः । सप्तगङ्ग, त्रिगङ्ग और इन्द्रमार्गमें पितरोंका तर्पण करनेवाला मनुष्य यदि पुनर्जन्म लेता है तो उसे अमृत भोजन मिलता है (अर्थात् वह देवता हो जाता है)॥ १६ १/२ ॥ महाश्रम उपस्पृश्य योऽग्निहोत्रपरः शुचिः ॥ १७ ॥ एकमासं निराहारः सिद्धिं मासेन स व्रजेत् । महाश्रम तीर्थमें स्नान करके प्रतिदिन पवित्र भावसे अग्निहोत्र करते हुए जो एक महीनेतक उपवास करता है, वह उतने ही समयमें सिद्ध हो जाता है ॥ १७ १/२ ॥ महाह्रद उपस्पृश्य भृगुतुङ्गे त्वलोलुपः ॥ १८ ॥ त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया । जो लोभका त्याग करके भृगुतुङ्ग-क्षेत्रके महाह्रद नामक तीर्थमें स्नान करता है और तीन राततक भोजन छोड़ देता है, वह ब्रह्महत्याके पापसे मुक्त हो जाता है ॥ १८ १/२ ॥ कन्याकूप उपस्पृश्य बलाकायां कृतोदकः ॥ १९ ॥ देवेषु लभते कीर्तिं यशसा च विराजते ॥ २० ॥ कन्याकूपमें स्नान करके बलाका तीर्थमें तर्पण करनेवाला पुरुष देवताओंमें कीर्ति पाता है और अपने यशसे प्रकाशित होता है ॥ १९-२० ॥ देविकायामुपस्पृश्य तथा सुन्दरिकाह्रदे । अश्विन्यां रूपवर्चस्कं प्रेत्य वै लभते नरः ॥ २१ ॥ देविकामें स्नान करके सुन्दरिकाकुण्ड और अश्विनीतीर्थमें स्नान करनेपर मृत्युके पश्चात् दूसरे जन्ममें मनुष्यको रूप और तेजकी प्राप्ति होती है ॥ २१ ॥ महागङ्गामुपस्पृश्य कृत्तिकाङ्गारके तथा । पक्षमेकं निराहारः स्वर्गमाप्नोति निर्मलः ॥ २२ ॥