महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 348, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहागङ्गा और कृतिकाङ्गारक तीर्थमें स्नान करके एक पक्षतक निराहार रहनेवाला मनुष्य निर्मल—निष्पाप होकर स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २२ ॥ वैमानिक उपस्पृश्य किङ्किणीकाश्रमे तथा । निवासेऽप्सरसां दिव्ये कामचारी महीयते ॥ २३ ॥ जो वैमानिक और किङ्किणीकाश्रमतीर्थमें स्नान करता है, वह अप्सराओंके दिव्यलोकमें जाकर सम्मानित होता और इच्छानुसार विचरता है ॥ २३ ॥ कालिकाश्रममासाद्य विपाशायां कृतोदकः । ब्रह्मचारी जितक्रोधस्त्रिसत्रं मुच्यते भवात् ॥ २४ ॥ जो कालिकाश्रममें स्नान करके विपाशा (व्यास) नदीमें पितरोंका तर्पण करता है और क्रोधको जीतकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए तीन रात वहाँ निवास करता है, वह जन्म-मरणके बन्धनसे छूट जाता है ॥ २४ ॥ आश्रमे कृत्तिकानां तु स्नात्वा यस्तर्पयेत् पितॄन् । तोषयित्वा महादेवं निर्मलाः स्वर्गमाप्नुयात् ॥ २५ ॥ जो कृत्तिकाश्रममें स्नान करके पितरोंका तर्पण करता है और महादेवजीको संतुष्ट करता है, वह पापमुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाता है ॥ २५ ॥ महापुर उपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितः शुचिः । त्रसानां स्थावराणां च द्विपदानां भयं त्यजेत् ॥ २६ ॥ महापुरतीर्थमें स्नान करके पवित्रतापूर्वक तीन रात उपवास करनेसे मनुष्य चराचर प्राणियों तथा मनुष्योंसे प्राप्त होनेवाले भयको त्याग देता है ॥ २६ ॥ देवदारुवने स्नात्वा धूतपाप्मा कृतोदकः । देवलोकमवाप्नोति सप्तरात्रोषितः शुचिः ॥ २७ ॥ जो देवदारुवनमें स्नान करके तर्पण करता है, उसके सारे पाप धुल जाते हैं तथा जो वहाँ सात राततक निवास करता है, वह पवित्र हो मृत्युके पश्चात् देवलोकमें जाता है ॥ शरस्तम्बे कुशस्तम्बे द्रोणशर्मपदे तथा । अपां प्रपतनासेवी सेव्यते सोऽप्सरोगणैः ॥ २८ ॥ जो शरसाम्ब, कुशसाम्ब और द्रोणशर्मपदतीर्थके झरनोंमें स्नान करता है वह स्वर्गमें अप्सराओंद्वारा सेवित होता है ॥ २८ ॥ चित्रकूटे जनस्थाने तथा मन्दाकिनीजले । विगाह्य वै निराहारो राजलक्ष्म्या निषेव्यते ॥ २९ ॥ जो चित्रकूटमें मन्दाकिनीके जलमें तथा जनस्थानमें गोदावरीके जलमें स्नान करके उपवास करता है वह पुरुष राजलक्ष्मीसे सेवित होता है ॥ २९ ॥ श्यामायास्त्वाश्रमं गत्वा उषित्वा चाभिषिच्य च । एकपक्षं निराहारस्त्वन्तर्धानफलं लभेत् ॥ ३० ॥