भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 351, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 351

द्वादशाहं निराहारः कल्मषाद् विप्रमुच्यते ॥ ४७ ॥ रामह्रद (परशुराम-कुण्ड)-में स्नान और विपाशा नदीमें तर्पण करके बारह दिनोंतक उपवास करनेवाला पुरुष सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ४७ ॥

महाह्रद उपस्पृश्य शुद्धेन मनसा नरः । एकमासं निराहारो जमदग्निगतिं लभेत् ॥ ४८ ॥ महाह्रदमें स्नान करके यदि मनुष्य शुद्ध चित्तसे वहाँ एक मासतक निराहार रहे तो उसे जमदग्निके समान सद्गति प्राप्त होती है ॥ ४८ ॥

विन्ध्ये संताप्य चात्मानं सत्यसंधस्त्वहिंसकः । विनयात्तप आस्थाय मासेनैकेन सिध्यति ॥ ४९ ॥ जो हिंसाका त्याग करके सत्यप्रतिज्ञ होकर विन्ध्याचलमें अपने शरीरको कष्ट दे विनीतभावसे तपस्याका आश्रय लेकर रहता है उसे एक महीनेमें सिद्धि प्राप्त हो जाती है ॥ ४९ ॥

नर्मदायामुपस्पृश्य तथा शूर्पारकोदके । एकपक्षं निराहारो राजपुत्रो विधीयते ॥ ५० ॥ नर्मदा नदी और शूर्पारक क्षेत्रके जलमें स्नान करके एक पक्षतक निराहार रहनेवाला मनुष्य दूसरे जन्ममें राजकुमार होता है ॥ ५० ॥

जम्बूमार्गे त्रिभिर्मासैः संयतः सुसमाहितः । अहोरात्रेण चैकेन सिद्धिं समधिगच्छति ॥ ५१ ॥ साधारण भावसे तीन महीनेतक जम्बूमार्गमें स्नान करनेसे तथा इन्द्रिय-संयमपूर्वक एकाग्रचित्त हो वहाँ एक ही दिन स्नान करनेसे भी मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ ५१ ॥

कोकामुखे विगाह्याथ गत्वा चाञ्जलिकाश्रमम् । शाकभक्षश्चीरवासाः कुमारीर्विन्दते दश ॥ ५२ ॥ वैवस्वतस्य सदनं न स गच्छेत् कदाचन । यस्य कन्याह्रदे वासो देवलोकं स गच्छति ॥ ५३ ॥ जो कोकामुख तीर्थमें स्नान करके अञ्जलिकाश्रम-तीर्थमें जाकर सागका भोजन करता हुआ चीरवस्त्र धारण करके कुछ कालतक निवास करता है उसे दस बार कन्याकुमारी तीर्थके सेवनका फल प्राप्त होता है तथा उसे कभी यमराजके घर नहीं जाना पड़ता। जो कन्याकुमारी तीर्थमें निवास करता है वह मृत्युके पश्चात् देवलोकमें जाता है ॥ ५२-५३ ॥

प्रभासे त्वेकरात्रेण अमावास्यां समाहितः । सिध्यते तु महाबाहो यो नरो जायतेऽमरः ॥ ५४ ॥ महाबाहो! जो एकाग्रचित्त होकर अमावास्याको प्रभास-तीर्थका सेवन करता है उसे एक ही रातमें सिद्धि मिल जाती है तथा वह मृत्युके पश्चात् देवता होता है ॥ ५४ ॥