महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 352, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंउज्जानक उपस्पृश्य आर्ष्टिषेणस्य चाश्रमे । पिङ्गायाश्चाश्रमे स्नात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५५ ॥ उज्जानकतीर्थमें स्नान करके आर्ष्टिषेणके आश्रम तथा पिङ्गाके आश्रममें गोता लगानेसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ५५ ॥
कुल्यायां समुपस्पृश्य जप्त्वा चैवाघमर्षणम् । अश्वमेधमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ ५६ ॥ जो मनुष्य कुल्यामें स्नान करके अघमर्षण मन्त्रका जप करता है तथा तीन राततक वहाँ उपवासपूर्वक रहता है उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ५६ ॥
पिण्डारक उपस्पृश्य एकरात्रोषितो नरः । अग्निष्टोममवाप्नोति प्रभातां शर्वरीं शुचिः ॥ ५७ ॥ जो मानव पिण्डारक तीर्थमें स्नान करके वहाँ एक रात निवास करता है वह प्रातःकाल होते ही पवित्र होकर अग्निष्टोमयज्ञका फल प्राप्त कर लेता है ॥ ५७ ॥
तथा ब्रह्मसरो गत्वा धर्मारण्योपशोभितम् । पुण्डरीकमवाप्नोति उपस्पृश्य नरः शुचिः ॥ ५८ ॥ धर्मारण्यसे सुशोभित ब्रह्मसर तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करके पवित्र हुआ मनुष्य पुण्डरीकयज्ञका फल पाता है ॥ ५८ ॥
मैनाके पर्वते स्नात्वा तथा संध्यामुपास्य च । कामं जित्वा च वै मासं सर्वयज्ञफलं लभेत् ॥ ५९ ॥ मैनाक पर्वतपर एक महीनेतक स्नान और संध्योपासन करनेसे मनुष्य कामको जीतकर समस्त यज्ञोंका फल पा लेता है ॥ ५९ ॥
कालोदकं नन्दिकुण्डं तथा चोत्तरमानसम् । अभ्येत्य योजनशताद् भ्रूणहा विप्रमुच्यते ॥ ६० ॥ सौ योजन दूरसे आकर कालोदक, नन्दि-कुण्ड तथा उत्तरमानस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य यदि भ्रूणहत्यारा भी हो तो वह उस पापसे मुक्त हो जाता है ॥ ६० ॥
नन्दीश्वरस्य मूर्तिं तु दृष्ट्वा मुच्येत किल्बिषैः । स्वर्गमार्गे नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकं स गच्छति ॥ ६१ ॥ वहाँ नन्दीश्वरकी मूर्तिका दर्शन करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। स्वर्गमार्गमें स्नान करनेसे वह ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ ६१ ॥
विख्यातो हिमवान् पुण्यः शङ्करश्वशुरो गिरिः । आकरः सर्वरत्नानां सिद्धचारणसेवितः ॥ ६२ ॥ भगवान् शंकरका श्वशुर हिमवान् पर्वत परम पवित्र और संसारमें विख्यात है। वह सब रत्नोंकी खान तथा सिद्ध और चारणोंसे सेवित है ॥ ६२ ॥
शरीरमुत्सृजेत् तत्र विधिपूर्वमनाशके ।