भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 353, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 353

अध्रुवं जीवितं ज्ञात्वा यो वै वेदान्तगो द्विजः ।। ६३ ।। अभ्यर्च्य देवतास्तत्र नमस्कृत्य मुनींस्तथा । ततः सिद्धो दिवं गच्छेद ब्रह्मलोकं सनातनम् ।। ६४ ।। जो वेदान्तका ज्ञाता द्विज इस जीवनको नाशवान् समझकर उस पर्वतपर रहता और देवताओंका पूजन तथा मुनियोंको प्रणाम करके विधिपूर्वक अनशनके द्वारा अपने प्राणोंको त्याग देता है वह सिद्ध होकर सनातन ब्रह्मलोकको प्राप्त हो जाता है ।। ६३-६४ ।। कामं क्रोधं च लोभं च यो जित्वा तीर्थमावसेत् । न तेन किञ्चिन्न प्राप्तं तीर्थाभिगमनाद् भवेत् ।। ६५ ।। जो काम, क्रोध और लोभको जीतकर तीर्थोंमें स्नान करता है उसे उस तीर्थयात्राके पुण्यसे कोई वस्तु दुर्लभ नहीं रहती ।। ६५ ।। यान्यगम्यानि तीर्थानि दुर्गानि विषमाणि च । मनसा तानि गम्यानि सर्वतीर्थसमीक्षया ।। ६६ ।। जो समस्त तीर्थोंके दर्शनकी इच्छा रखता हो, वह दुर्गम और विषम होनेके कारण जिन तीर्थोंमें शरीरसे न जा सके, वहाँ मनसे यात्रा करे ।। ६६ ।। इदं मेध्यमिदं पुण्यमिदं स्वर्ग्यमनुत्तमम् । इदं रहस्यं वेदानामाप्लाव्यं पावनं तथा ।। ६७ ।। यह तीर्थ-सेवनका कार्य परम पवित्र, पुण्यप्रद, स्वर्गकी प्राप्तिका सर्वोत्तम साधन और वेदोंका गुप्त रहस्य है। प्रत्येक तीर्थ पावन और स्नानके योग्य होता है ।। इदं दद्याद् द्विजातीनां साधोरात्महितस्य च । सुहृदां च जपेत् कर्णे शिष्यस्यानुगतस्य च ।। ६८ ।। तीर्थोंका यह माहात्म्य द्विजातियोंके, अपने हितैषी श्रेष्ठ पुरुषके, सुहृदोंके तथा अनुगत शिष्यके ही कानमें डालना चाहिये ।। ६८ ।। दत्तवान् गौतमस्यैतदङ्गिरा वै महातपाः । अङ्गिराः समनुज्ञातः काश्यपेन च धीमता ।। ६९ ।। सबसे पहले महातपस्वी अङ्गिराने गौतमको इसका उपदेश दिया। अङ्गिराको बुद्धिमान् काश्यपजीसे इसका ज्ञान प्राप्त हुआ था ।। ६९ ।। महर्षीणामिदं जप्यं पावनानां तथोत्तमम् । जपंश्चाभ्युत्थितः शश्वन्निर्मलः स्वर्गमाप्नुयात् ।। ७० ।। यह कथा महर्षियोंके पढ़ने योग्य और पावन वस्तुओंमें परम पवित्र है। जो सावधान एवं उत्साहयुक्त होकर सदा इसका पाठ करता है वह सब पापोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें जाता है ।। ७० ।। इदं यश्चापि शृणुयाद् रहस्यं त्वङ्गिरोमतम् । उत्तमे च कुले जन्म लभेज्जातींश्च संस्मरेत् ।। ७१ ।।