भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 359

तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञैस्त्यागेन वा पुनः।
गतिं तां न लभेज्जन्तुर्गङ्गां संसेव्य यां लभेत् ॥ २७ ॥
गङ्गाजीका सेवन करनेसे जीव जिस उत्तम गतिको प्राप्त करता है उसे वह तपस्या, ब्रह्मचर्य, यज्ञ अथवा त्यागसे भी नहीं पा सकता ॥ २७ ॥
स्पृष्टानि येषां गाङ्गेयैस्तोयैर्गात्राणि देहिनाम्।
न्यस्तानि न पुनस्तेषां त्यागः स्वर्गाद् विधीयते ॥ २८ ॥
जिन देहधारियोंके शरीर गङ्गाजीके जलसे भीगते हैं अथवा मरनेपर जिनकी हड्डियाँ गंगाजीमें डाली जाती हैं वे कभी स्वर्गसे नीचे नहीं गिरते ॥ २८ ॥
सर्वाणि येषां गाङ्गेयैस्तोयैः कार्याणि देहिनाम्।
गां त्यक्त्वा मानवा विप्र दिवि तिष्ठन्ति ते जनाः ॥ २९ ॥
विप्रवर! जिन देहधारियोंके सम्पूर्ण कार्य गङ्गाजलसे ही सम्पन्न होते हैं वे मानव मरनेके बाद पृथ्वीका निवास छोड़कर स्वर्गमें विराजमान होते हैं ॥ २९ ॥
पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि ये नराः।
पश्चात् गङ्गां निषेवन्ते तेऽपि यान्त्युत्तमां गतिम् ॥ ३० ॥

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