महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 360, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंजो मनुष्य जीवनकी पहली अवस्थामें पापकर्म करके भी पीछे गङ्गाजीका सेवन करने लगते हैं वे भी उत्तम गतिको ही प्राप्त होते हैं ।। ३० ।। स्नातानां शुचिभिस्तोयैर्गाङ्गेयैः प्रयतात्मनाम् । व्युष्टिर्भवति या पुंसां न सा क्रतुशतैरपि ।। ३१ ।। गङ्गाजीके पवित्र जलसे स्नान करके जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है उन पुरुषोंके पुण्यकी जैसी वृद्धि होती है; वैसी सैकड़ों यज्ञ करनेसे भी नहीं हो सकती ।। ३१ ।। यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गातोयेषु तिष्ठति । तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ।। ३२ ।। मनुष्यकी हड्डी जितने समयतक गङ्गाजीके जलमें पड़ी रहती है, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। ३२ ।। अपहत्य तमस्तीव्रं यथा भात्युदये रविः । तथापहृत्य पाप्मानं भाति गङ्गाजलोक्षितः ।। ३३ ।। जैसे सूर्य उदयकालमें घने अन्धकारको विदीर्ण करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार गङ्गाजलमें स्नान करनेवाला पुरुष अपने पापोंको नष्ट करके सुशोभित होता है ।। ३३ ।। विसोमा इव शर्वर्यो विपुष्पास्तरवो यथा । तद्वद् देशा दिशश्चैव हीना गङ्गाजलैः शिवैः ।। ३४ ।। जैसे बिना चाँदनीकी रात और बिना फूलोंके वृक्ष शोभा नहीं पाते, उसी प्रकार गङ्गाजीके कल्याणमय जलसे वञ्चित हुए देश और दिशाएँ भी शोभा एवं सौभाग्य हीन हैं ।। ३४ ।। वर्णाश्रमा यथा सर्वे धर्मज्ञानविवर्जिताः । क्रतवश्च यथासोमास्तथा गङ्गां विना जगत् ।। ३५ ।। जैसे धर्म और ज्ञानसे रहित होनेपर सम्पूर्ण वर्णों और आश्रमोंकी शोभा नहीं होती है तथा जैसे सोमरसके बिना यज्ञ सुशोभित नहीं होते, उसी प्रकार गङ्गाके बिना जगत्की शोभा नहीं है ।। ३५ ।। यथा हीनं नभोऽर्केण भूःशैलैः खं च वायुना । तथा देशा दिशश्चैव गङ्गाहीना न संशयः ।। ३६ ।। जैसे सूर्यके बिना आकाश, पर्वतोंके बिना पृथ्वी और वायुके बिना अन्तरिक्षकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार जो देश और दिशाएँ गङ्गाजीसे रहित हैं उनकी भी शोभा नहीं होती—इसमें संशय नहीं है ।। ३६ ।। त्रिषु लोकेषु ये केचित् प्राणिनः सर्व एव ते । तर्प्यमाणाः परां तृप्तिं यान्ति गङ्गाजलैः शुभैः ।। ३७ ।। तीनों लोकोंमें जो कोई भी प्राणी हैं, उन सबका गङ्गाजीके शुभ जलसे तर्पण करनेपर वे सब परम तृप्ति लाभ करते हैं ।। ३७ ।।