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महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

जो मनुष्य जीवनकी पहली अवस्थामें पापकर्म करके भी पीछे गङ्गाजीका सेवन करने लगते हैं वे भी उत्तम गतिको ही प्राप्त होते हैं ।। ३० ।। स्नातानां शुचिभिस्तोयैर्गाङ्गेयैः प्रयतात्मनाम् । व्युष्टिर्भवति या पुंसां न सा क्रतुशतैरपि ।। ३१ ।। गङ्गाजीके पवित्र जलसे स्नान करके जिनका अन्तःकरण शुद्ध हो गया है उन पुरुषोंके पुण्यकी जैसी वृद्धि होती है; वैसी सैकड़ों यज्ञ करनेसे भी नहीं हो सकती ।। ३१ ।। यावदस्थि मनुष्यस्य गङ्गातोयेषु तिष्ठति । तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते ।। ३२ ।। मनुष्यकी हड्डी जितने समयतक गङ्गाजीके जलमें पड़ी रहती है, उतने हजार वर्षोंतक वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। ३२ ।। अपहत्य तमस्तीव्रं यथा भात्युदये रविः । तथापहृत्य पाप्मानं भाति गङ्गाजलोक्षितः ।। ३३ ।। जैसे सूर्य उदयकालमें घने अन्धकारको विदीर्ण करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार गङ्गाजलमें स्नान करनेवाला पुरुष अपने पापोंको नष्ट करके सुशोभित होता है ।। ३३ ।। विसोमा इव शर्वर्यो विपुष्पास्तरवो यथा । तद्वद् देशा दिशश्चैव हीना गङ्गाजलैः शिवैः ।। ३४ ।। जैसे बिना चाँदनीकी रात और बिना फूलोंके वृक्ष शोभा नहीं पाते, उसी प्रकार गङ्गाजीके कल्याणमय जलसे वञ्चित हुए देश और दिशाएँ भी शोभा एवं सौभाग्य हीन हैं ।। ३४ ।। वर्णाश्रमा यथा सर्वे धर्मज्ञानविवर्जिताः । क्रतवश्च यथासोमास्तथा गङ्गां विना जगत् ।। ३५ ।। जैसे धर्म और ज्ञानसे रहित होनेपर सम्पूर्ण वर्णों और आश्रमोंकी शोभा नहीं होती है तथा जैसे सोमरसके बिना यज्ञ सुशोभित नहीं होते, उसी प्रकार गङ्गाके बिना जगत्‌की शोभा नहीं है ।। ३५ ।। यथा हीनं नभोऽर्केण भूःशैलैः खं च वायुना । तथा देशा दिशश्चैव गङ्गाहीना न संशयः ।। ३६ ।। जैसे सूर्यके बिना आकाश, पर्वतोंके बिना पृथ्वी और वायुके बिना अन्तरिक्षकी शोभा नहीं होती, उसी प्रकार जो देश और दिशाएँ गङ्गाजीसे रहित हैं उनकी भी शोभा नहीं होती—इसमें संशय नहीं है ।। ३६ ।। त्रिषु लोकेषु ये केचित् प्राणिनः सर्व एव ते । तर्प्यमाणाः परां तृप्तिं यान्ति गङ्गाजलैः शुभैः ।। ३७ ।। तीनों लोकोंमें जो कोई भी प्राणी हैं, उन सबका गङ्गाजीके शुभ जलसे तर्पण करनेपर वे सब परम तृप्ति लाभ करते हैं ।। ३७ ।।

यस्तु सूर्येण निष्टप्तं गाङ्गेयं पिबते जलम् । गवां निर्हारनिर्मुक्ताद् यावकात् तद् विशिष्यते ॥ ३८ ॥ जो मनुष्य सूर्यकी किरणोंसे तपे हुए गङ्गाजलका पान करता है, उसका वह जलपान गायके गोबरसे निकले हुए जौकी लप्सी खानेसे अधिक पवित्रकारक है ॥ ३८ ॥

इन्दुव्रतसहस्रं तु यश्चरेत् कायशोधनम् । पिबेद् यश्चापि गङ्गाम्भः समौ स्यातां न वा समौ ॥ ३९ ॥ जो शरीरको शुद्ध करनेवाले एक सहस्र चान्द्रायण व्रतोंका अनुष्ठान करता है और जो केवल गङ्गाजल पीता है, वे दोनों समान ही हैं अथवा यह भी हो सकता है कि दोनों समान न हों (गङ्गाजल पीनेवाला बढ़ जाय) ॥ ३९ ॥

तिष्ठेद् युगसहस्रं तु पदेनैकेन यः पुमान् । मासमेकं तु गङ्गायां समौ स्यातां न वा समौ ॥ ४० ॥ जो पुरुष एक हजार युगोंतक एक पैरसे खड़ा होकर तपस्या करता है और जो एक मासतक गङ्गातटपर निवास करता है, वे दोनों समान हो सकते हैं अथवा यह भी सम्भव है कि समान न हों ॥ ४० ॥

लंबतेऽवाक्शिरा यस्तु युगानामयुतं पुमान् । तिष्ठेद् यथेष्टं यश्चापि गङ्गायां स विशिष्यते ॥ ४१ ॥ जो मनुष्य दस हजार युगोंतक नीचे सिर करके वृक्षमें लटका रहे और जो इच्छानुसार गङ्गाजीके तटपर निवास करे, उन दोनोंमें गङ्गाजीपर निवास करनेवाला ही श्रेष्ठ है ॥ ४१ ॥

अग्नौ प्रास्तं प्रधूयेत यथा तूलं द्विजोत्तम । तथा गङ्गावगाढस्य सर्वपापं प्रधूयते ॥ ४२ ॥ द्विजश्रेष्ठ! जैसे अतामें डाली हुई रूई तुरंत जलकर भस्म हो जाती है, उसी प्रकार गङ्गामें गोता लगानेवाले मनुष्यके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ४२ ॥

भूतानामिह सर्वेषां दुःखोपहतचेतसाम् । गतिमन्वेषमाणानां न गङ्गासदृशी गतिः ॥ ४३ ॥ इस संसारमें दुःखसे व्याकुलचित होकर अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़नेवाले समस्त प्राणियोंके लिये गंगाजीके समान कोई दूसरा सहारा नहीं है ॥ ४३ ॥

भवन्ति निर्विषाः सर्पा यथा तार्क्ष्यस्य दर्शनात् । गङ्गाया दर्शनात् तद्वत् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४४ ॥ जैसे गरुड़को देखते ही सारे सर्पोंके विष झड़ जाते हैं, उसी प्रकार गङ्गाजीके दर्शनमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ४४ ॥

अप्रतिष्ठाश्च ये केचिदधर्मशरणाश्च ये । तेषां प्रतिष्ठा गङ्गेह शरणं शर्म वर्म च ॥ ४५ ॥

जगत्में जिनका कहीं आधार नहीं है; तथा जिन्होंने धर्मकी शरण नहीं ली है, उनका आधार और उन्हें शरण देनेवाली श्रीगङ्गाजी ही हैं। वे ही उसका कल्याण करनेवाली तथा कवचकी भाँति उसे सुरक्षित रखनेवाली हैं ॥ ४५ ॥

प्रकृष्टैरशुभैर्ग्रस्ताननेकैः पुरुषाधमान् ।
पततो नरके गङ्गा संश्रितान् प्रेत्य तारयेत् ॥ ४६ ॥

जो नीच मानव अनेक बड़े-बड़े अमङ्गलकारी पापकर्मोंसे ग्रस्त होकर नरकमें गिरनेवाले हैं, वे भी यदि गङ्गाजीकी शरणमें आ जाते हैं तो ये मरनेके बाद उनका उद्धार कर देती हैं ॥ ४६ ॥

ते संविभक्ता मुनिभिर्नूनं देवैः सवासवैः ।
येऽभिगच्छन्ति सततं गङ्गां मतिमतां वर ॥ ४७ ॥

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण! जो लोग सदा गङ्गाजीकी यात्रा करते हैं, उनपर निश्चय ही इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता तथा मुनिलोग पृथक्-पृथक् कृपा करते आये हैं ॥ ४७ ॥

विनयाचारहीनाश्च अशिवाश्च नराधमाः ।
ते भवन्ति शिवा विप्र ये वै गङ्गामुपाश्रिताः ॥ ४८ ॥

विप्रवर! विनय और सदाचारसे हीन अमङ्गलकारी नीच मनुष्य भी गङ्गाजीकी शरणमें जानेपर कल्याणस्वरूप हो जाते हैं ॥ ४८ ॥

यथा सुराणाममृतं पितॄणां च यथा स्वधा ।
सुधा यथा च नागानां तथा गङ्गाजलं नृणाम् ॥ ४९ ॥

जैसे देवताओंको अमृत, पितरोंको स्वधा और नागोंको सुधा तृप्त करती है, उसी प्रकार मनुष्योंके लिये गंगाजल ही पूर्ण तृप्तिका साधन है ॥ ४९ ॥

उपासते यथा बाला मातरं क्षुधयार्दिताः ।
श्रेयस्कामास्तथा गङ्गामुपासन्तीह देहिनः ॥ ५० ॥

जैसे भूखसे पीड़ित हुए बच्चे माताके पास जाते हैं, उसी प्रकार कल्याणकी इच्छा रखनेवाले प्राणी इस जगत्में गङ्गाजीकी उपासना करते हैं ॥ ५० ॥

स्वायम्भुवं यथा स्थानं सर्वेषां श्रेष्ठमुच्यते ।
स्नातानां सरितां श्रेष्ठा गङ्गा तद्वदिहोच्यते ॥ ५१ ॥

जैसे ब्रह्मलोक सब लोकोंसे श्रेष्ठ बताया जाता है, वैसे ही स्नान करनेवाले पुरुषोंके लिये गङ्गाजी ही सब नदियोंमें श्रेष्ठ कही गयी हैं ॥ ५१ ॥

यथोपजीविनां धेनुर्देवादीनां धरा स्मृता ।
तथोपजीविनां गङ्गा सर्वप्राणभृतामिह ॥ ५२ ॥

जैसे धेनुस्वरूपा पृथिवी उपजीवी देवता आदिके लिये आदरणीय है, उसी प्रकार इस जगत्में गंगा समस्त उपजीवी प्राणियोंके लिये आदरणीय हैं ॥ ५२ ॥

देवाः सोमार्कसंस्थानि यथा सत्रादिभिर्मखैः ।

अमृतान्युपजीवन्ति तथा गङ्गाजलं नसः ॥ ५३ ॥ जैसे देवता सत्र आदि यज्ञोंद्वारा चन्द्रमा और सूर्यमें स्थित अमृतसे आजीविका चलाते हैं, उसी प्रकार संसारके मनुष्य गंगाजलका सहारा लेते हैं ॥ ५३ ॥

जाह्नवीपुलिनोत्थाभिः सिकताभिः समुक्षितम् । आत्मानं मन्यते लोको दिविष्ठमिव शोभितम् ॥ ५४ ॥ गंगाजीके तटसे उड़े हुए बालुका-कणोंसे अभिषिक्त हुए अपने शरीरको ज्ञानी पुरुष स्वर्गलोकमें स्थित हुआ-सा शोभासम्पन्न मानता है ॥ ५४ ॥

जाह्नवीतीरसम्भूतां मृदं मूर्ध्ना बिभर्ति यः । बिभर्ति रूपं सोऽर्कस्य तमोनाशाय निर्मलम् ॥ ५५ ॥ जो मनुष्य गंगाके तीरकी मिट्टी अपने मस्तकमें लगाता है वह अज्ञानान्धकारका नाश करनेके लिये सूर्यके समान निर्मल स्वरूप धारण करता है ॥ ५५ ॥

गङ्गोर्मिभिरथो दिग्धः पुरुषं पवनो यदा । स्पृशते सोऽस्य पाप्मानं सद्य एवापकर्षति ॥ ५६ ॥ गंगाकी तरंगमालाओंसे भीगकर बहनेवाली वायु जब मनुष्यके शरीरका स्पर्श करती है, उसी समय वह उसके सारे पापोंको नष्ट कर देती है ॥ ५६ ॥

व्यसनैरभितप्तस्य नरस्य विनशिष्यतः । गङ्गादर्शनजा प्रीतिर्व्यसनान्यपकर्षति ॥ ५७ ॥ दुर्व्यसनजनित दुःखोंसे संतप्त होकर मरणासन्न हुआ मनुष्य भी यदि गंगाजीका दर्शन करे तो उसे इतनी प्रसन्नता होती है कि उसकी सारी पीड़ा तत्काल नष्ट हो जाती है ॥ ५७ ॥

हंसारावैः कोकरवै रवैरन्यैश्च पक्षिणाम् । पस्पर्ध गङ्गा गन्धर्वान् पुलिनैश्च शिलोच्चयान् ॥ ५८ ॥ हंसोंकी मीठी वाणी, चक्रवाकोंके सुमधुर शब्द तथा अन्यान्य पक्षियोंके कलरवोंद्वारा गंगाजी गन्धर्वोंसे होड़ लगाती हैं तथा अपने ऊँचे-ऊँचे तटोंद्वारा पर्वतोंके साथ स्पर्धा करती हैं ॥ ५८ ॥

हंसादिभिः सुबहुभिर्विविधैः पक्षिभिर्वृताम् । गङ्गां गोकुलसम्बाधां दृष्ट्वा स्वर्गोऽपि विस्मृतः ॥ ५९ ॥ हंस आदि बहुसंख्यक एवं विविध पक्षियोंसे घिरी हुई तथा गौओंके समुदायसे व्याप्त हुई गंगाजीको देखकर मनुष्य स्वर्गलोकको भी भूल जाता है ॥ ५९ ॥

न सा प्रीतिर्दिविष्ठस्य सर्वकामानुपाश्नतः । सम्भवेद् या परा प्रीतिर्गङ्गायाः पुलिने नृणाम् ॥ ६० ॥ गंगाजीके तटपर निवास करनेसे मनुष्योंको जो परम प्रीति—अनुपम आनन्द मिलता है वह स्वर्गमें रहकर सम्पूर्ण भोगोंका अनुभव करनेवाले पुरुषको भी नहीं प्राप्त हो

सकता ।। ६० ।। वाङ्मनःकर्मजैर्ग्रस्तः पापैरपि पुमानिह । वीक्ष्य गङ्गां भवेत् पूतो अत्र मे नास्ति संशयः ।। ६१ ।। मन, वाणी और क्रियाद्वारा होनेवाले पापोंसे ग्रस्त मनुष्य भी गंगाजीका दर्शन करने मात्रसे पवित्र हो जाता है—इसमें मुझे संशय नहीं है ।। ६१ ।। सप्तावरान् सप्त परान् पितॄंस्तेभ्यश्च ये परे । पुमांस्तारयते गङ्गां वीक्ष्य स्पृष्ट्वावगाह्य च ।। ६२ ।। गंगाजीका दर्शन, उनके जलका स्पर्श तथा उस जलके भीतर स्नान करके मनुष्य सात पीढ़ी पहलेके पूर्वजोंका और सात पीढ़ी आगे होनेवाली संतानोंका तथा इनसे भी ऊपरके पितरों और संतानोंका उद्धार कर देता है ।। ६२ ।। श्रुताभिलषिता पीता स्पृष्टा दृष्टावगाहिता । गङ्गा तारयते नृणामुभौ वंशौ विशेषतः ।। ६३ ।। जो पुरुष गंगाजीका माहात्म्य सुनता, उनके तटपर जानेकी अभिलाषा रखता, उनका दर्शन करता, जल पीता, स्पर्श करता तथा उनके भीतर गोते लगाता है, उसके दोनों कुलोंका भगवती गंगा विशेषरूपसे उद्धार कर देती हैं ।। ६३ ।। दर्शनात् स्पर्शनात् पानात् तथा गङ्गेति कीर्तनात् । पुनात्यपुण्यान् पुरुषान् शतशोऽथ सहस्रशः ।। ६४ ।। गंगाजी अपने दर्शन, स्पर्श, जलपान तथा अपने गंगानामके कीर्तनसे सैकड़ों और हजारों पापियोंको तार देती हैं ।। ६४ ।। य इच्छेत् सफलं जन्म जीवितं श्रुतमेव च । स पितॄंस्तर्पयेद् गाङ्गमभिगम्य सुरांस्तथा ।। ६५ ।। जो अपने जन्म, जीवन और वेदाध्ययनको सफल बनाना चाहता हो वह गंगाजीके पास जाकर उनके जलसे देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करे ।। ६५ ।। न सुतैर्न च वित्तेन कर्मणा न च तत्फलम् । प्राप्नुयात् पुरुषोऽत्यन्तं गङ्गां प्राप्य यदाप्नुयात् ।। ६६ ।। मनुष्य गंगास्नान करके जिस अक्षय फलको प्राप्त करता है उसे पुत्रोंसे, धनसे तथा किसी कर्मसे भी नहीं पा सकता ।। ६६ ।। जात्यन्धैरिह तुल्यास्ते मृतैः पङ्गुभिरेव च । समर्था ये न पश्यन्ति गङ्गां पुण्यजलां शिवाम् ।। ६७ ।। जो सामर्थ्य होते हुए भी पवित्र जलवाली कल्याणमयी गंगाका दर्शन नहीं करते वे जन्मके अन्धों, पंगुओं और मुर्दोंके समान हैं ।। ६७ ।। भूतभव्यभविष्यज्ञैर्महर्षिभिरुपस्थिताम् । देवैः सेन्द्रैश्च को गङ्गां नोपसेवेत मानवः ।। ६८ ।।

भूत, वर्तमान और भविष्यके ज्ञाता महर्षि तथा इन्द्र आदि देवता भी जिनकी उपासना करते हैं, उन गंगाजीका सेवन कौन मनुष्य नहीं करेगा? ।। ६८ ।।

वानप्रस्थैर्गृहस्थैश्च यतिभिर्ब्रह्मचारिभिः ।
विद्यावद्भिः श्रितां गङ्गां पुमान् को नाम नाश्रयेत् ।। ६९ ।।
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी और विद्वान् पुरुष भी जिनकी शरण लेते हैं, ऐसी गंगाजीका कौन मनुष्य आश्रय नहीं लेगा? ।। ६९ ।।

उत्क्रामद्भिश्च यः प्राणः प्रयतः शिष्टसम्मतः ।
चिन्तयेन्मनसा गङ्गां स गतिं परमां लभेत् ।। ७० ।।
जो साधु पुरुषोंद्वारा सम्मानित तथा संयतचित्त मनुष्य प्राण निकलते समय मन-ही-मन गंगाजीका स्मरण करता है, वह परम उत्तम गतिको प्राप्त कर लेता है ।। ७० ।।

न भयेभ्यो भयं तस्य न पापेभ्यो न राजतः ।
आ देहपतनाद् गङ्गामुपास्ते यः पुमानिह ।। ७१ ।।
जो पुरुष यहाँ जीवनपर्यन्त गंगाजीकी उपासना करता है उसे भयदायक वस्तुओंसे, पापोंसे तथा राजासे भी भय नहीं होता ।। ७१ ।।

महापुण्यां च गगनात् पतन्तीं वै महेश्वरः ।
दधार शिरसा गङ्गां तामेव दिवि सेवते ।। ७२ ।।
भगवान् महेश्वरने आकाशसे गिरती हुई परम पवित्र गंगाजीको सिरपर धारण किया, उन्हींका वे स्वर्गमें सेवन करते हैं ।। ७२ ।।

अलंकृतास्त्रयो लोकाः पथिभिर्विमलैस्त्रिभिः ।
यस्तु तस्या जलं सेवेत् कृतकृत्यः पुमान् भवेत् ।। ७३ ।।
जिन्होंने तीन निर्मल मार्गोंद्वारा आकाश, पाताल तथा भूतल—इन तीन लोकोंको अलंकृत किया है उन गंगाजीके जलका जो मनुष्य सेवन करेगा वह कृतकृत्य हो जायगा ।। ७३ ।।

दिवि ज्योतिर्यथाऽऽदित्यः पितॄणां चैव चन्द्रमाः ।
देवेशश्च तथा नृणां गङ्गा च सरितां तथा ।। ७४ ।।
स्वर्गवासी देवताओंमें जैसे सूर्यका तेज श्रेष्ठ है, जैसे पितरोंमें चन्द्रमा तथा मनुष्योंमें राजाधिराज श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त सरिताओंमें गंगाजी उत्तम हैं ।। ७४ ।।

मात्रा पित्रा सुतैर्दारैर्विमुक्तस्य धनेन वा ।
न भवेद्धि तथा दुःखं यथा गङ्गावियोगजम् ।। ७५ ।।
(गंगाजीमें भक्ति रखनेवाले पुरुषको) माता, पिता, पुत्र, स्त्री और धनका वियोग होनेपर भी उतना दुःख नहीं होता, जितना गंगाके बिछोहसे होता है ।। ७५ ।।

नारण्यैर्नैष्टविषयैर्न सुतैर्न धनागमैः ।
तथा प्रसादो भवति गङ्गां वीक्ष्य यथा भवेत् ।। ७६ ।।

इसी प्रकार उसे गङ्गाजीके दर्शनसे जितनी प्रसन्नता होती है, उतनी वनके दर्शनोंसे, अभीष्ट विषयसे, पुत्रोंसे तथा धनकी प्राप्तिसे भी नहीं होती ॥ ७६ ॥

पूर्णमिन्दुं यथा दृष्ट्वा नृणां दृष्टिः प्रसीदति ।
तथा त्रिपथगां दृष्ट्वा नृणां दृष्टिः प्रसीदति ॥ ७७ ॥

जैसे पूर्ण चन्द्रमाका दर्शन करके मनुष्योंकी दृष्टि प्रसन्न हो जाती है, उसी तरह त्रिपथगा गङ्गाका दर्शन करके मनुष्योंके नेत्र आनन्दसे खिल उठते हैं ॥ ७७ ॥

तद्भावस्तद्गतमनास्तन्निष्ठस्तत्परायणः ।
गङ्गां योऽनुगतो भक्त्या स तस्याः प्रियतां व्रजेत् ॥ ७८ ॥

जो गङ्गाजीमें श्रद्धा रखता, उन्हींमें मन लगाता, उन्हींके पास रहता, उन्हींका आश्रय लेता तथा भक्तिभावसे उन्हींका अनुसरण करता है वह भगवती भागीरथीका स्नेह-भाजन होता है ॥ ७८ ॥

भूस्थैः स्वःस्थैर्दिविष्ठैश्च भूतैरुच्चावचैरपि ।
गङ्गा विगाह्या सततमेतत् कार्यतमं सताम् ॥ ७९ ॥

पृथ्वी, आकाश तथा स्वर्गमें रहनेवाले छोटे-बड़े सभी प्राणियोंको चाहिये कि वे निरन्तर गङ्गाजीमें स्नान करें। यही सत्पुरुषोंका सबसे उत्तम कार्य है ॥ ७९ ॥

विश्वलोकेषु पुण्यत्वाद् गङ्गायाः प्रथितं यशः ।
यत्पुत्रान्सगरस्येतो भस्माख्याननयद् दिवम् ॥ ८० ॥

सम्पूर्ण लोकोंमें परम पवित्र होनेके कारण गङ्गाजीका यश विख्यात है; क्योंकि उन्होंने भस्मीभूत होकर पड़े हुए सगरपुत्रोंको यहाँसे स्वर्गमें पहुँचा दिया ॥ ८० ॥

वाय्वीरिताभिः सुमनोहराभि-
द्रुताभिरत्यर्थसमुत्थिताभिः ।
गङ्गोर्मिभिर्भानुमतीभिरिद्धाः
सहस्ररश्मिप्रतिमा भवन्ति ॥ ८१ ॥

वायुसे प्रेरित हो बड़े वेगसे अत्यन्त ऊँचे उठनेवाली गङ्गाजीकी परम मनोहर एवं कान्तिमयी तरंगमालाओंसे नहाकर प्रकाशित होनेवाले पुरुष परलोकमें सूर्यके समान तेजस्वी होते हैं ॥ ८१ ॥

पयस्विनीं घृतिनीमत्युदारां
समृद्धिनीं वेगिनीं दुर्विगाह्याम् ।
गङ्गां गत्वा यैः शरीरं विसृष्टं
गता धीरास्ते विबुधैः समत्वम् ॥ ८२ ॥

दुग्धके समान उज्ज्वल और घृतके समान स्निग्ध जलसे भरी हुई, परम उदार, समृद्धिशालिनी, वेगवती तथा अगाध जलराशिवाली गङ्गाजीके समीप जाकर जिन्होंने अपना शरीर त्याग दिया है वे धीर पुरुष देवताओंके समान हो गये ॥ ८२ ॥

अन्धान् जडान् द्रव्यहीनांश्च गङ्गा यशस्विनी बृहती विश्वरूपा। देवैः सेन्द्रैर्मुनिभिर्मानवैश्च निषेविता सर्वकामैर्युनक्ति॥ ८३॥ इन्द्र आदि देवता, मुनि और मनुष्य जिनका सदा सेवन करते हैं वे यशस्विनी, विशालकलेवरा, विश्वरूपा गङ्गादेवी अपनी शरणमें आये हुए अन्धों, जडों और धनहीनोंको भी सम्पूर्ण मनोवाञ्छित कामनाओंसे सम्पन्न कर देती हैं॥ ८३॥

ऊर्जावतीं महापुण्यां मधुमतीं त्रिवर्त्मगाम्। त्रिलोकगोप्त्रीं ये गङ्गां संश्रितास्ते दिवं गताः॥ ८४॥ गङ्गाजी ओजस्विनी, परम पुण्यमयी, मधुर जलराशिसे परिपूर्ण तथा भूतल, आकाश और पाताल—इन तीन मार्गोंपर विचरनेवाली हैं। जो लोग तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाली गङ्गाजीकी शरणमें आये हैं, वे स्वर्गलोकको चले गये॥ ८४॥

यो वत्स्यति द्रक्ष्यति वापि मर्त्य- स्तस्मै प्रयच्छन्ति सुखानि देवाः। तद्भाविताः स्पर्शनदर्शनेन इष्टां गतिं तस्य सुरा दिशन्ति॥ ८५॥ जो मनुष्य गङ्गाजीके तटपर निवास और उनका दर्शन करता है उसे सब देवता सुख देते हैं। जो गङ्गाजीके स्पर्श और दर्शनसे पवित्र हो गये हैं उन्हें गङ्गाजीसे ही महत्त्वको प्राप्त हुए देवता मनोवाञ्छित गति प्रदान करते हैं॥ ८५॥

दक्षां पृश्निं बृहतीं विप्रकृष्टां शिवामृद्धां भागिनीं सुप्रसन्नाम्। विभावरीं सर्वभूतप्रतिष्ठां गङ्गां गता ये त्रिदिवं गतास्ते॥ ८६॥ गंगा जगत्‌का उद्धार करनेमें समर्थ हैं। भगवान् पृश्निगर्भकी जननी ‘पृश्नि’ के तुल्य हैं, विशाल हैं, सबसे उत्कृष्ट हैं, मंगलकारिणी हैं, पुण्यराशिसे समृद्ध हैं, शिवजीके द्वारा मस्तकपर धारित होनेके कारण सौभाग्यशालिनी तथा भक्तोंपर अत्यन्त प्रसन्न रहनेवाली हैं। इतना ही नहीं, पापोंका विनाश करनेके लिये वे कालरात्रिके समान हैं तथा सम्पूर्ण प्राणियोंकी आश्रयभूत हैं। जो लोग गंगाजीकी शरणमें गये हैं वे स्वर्गलोकमें जा पहुँचे हैं॥ ८६॥

ख्यातिर्यस्याः खं दिवं गां च नित्यं पुरा दिशो विदिशश्चावतस्थे। तस्या जलं सेव्य सरिद्वराया मर्त्याः सर्वे कृतकृत्या भवन्ति॥ ८७॥

आकाश, स्वर्ग, पृथ्वी, दिशा और विदिशाओंमें भी जिनकी ख्याति फैली हुई है, सरिताओंमें श्रेष्ठ उन भगवती भागीरथीके जलका सेवन करके सभी मनुष्य कृतार्थ हो जाते हैं॥ ८७॥

इयं गङ्गेति नियतं प्रतिष्ठा
गुहस्य रुक्मस्य च गर्भयोषा।
प्रातस्त्रिवर्गा घृतवहा विपाप्मा
गङ्गावतीर्णा वियतो विश्वतोया॥ ८८॥
'ये गङ्गाजी हैं'—ऐसा कहकर जो दूसरे मनुष्योंको उनका दर्शन कराता है, उसके लिये भगवती भागीरथी सुनिश्चित प्रतिष्ठा (अक्षय पद प्रदान करनेवाली) हैं। वे कार्तिकेय और सुवर्णको अपने गर्भमें धारण करनेवाली, पवित्र जलकी धारा बहानेवाली और पाप दूर करनेवाली हैं। वे आकाशसे पृथ्वीपर उतरी हुई हैं। उनका जल सम्पूर्ण विश्वके लिये पीने योग्य है। उनमें प्रातःकाल स्नान करनेसे धर्म, अर्थ और काम तीनों वर्गोंकी सिद्धि होती है॥ ८८॥

(नारायणदक्षयात् पूर्वजाता
विष्णोः पादात् शिशुमाराद् ध्रुवाच्च।
सोमात् सूर्यान्मेरुरूपाच्च विष्णोः
समागता शिवमूर्ध्नो हिमाद्रिम्॥)
भगवती गंगा पूर्वकालमें अविनाशी भगवान् नारायणसे प्रकट हुई हैं। वे भगवान् विष्णुके चरण, शिशुमार चक्र, ध्रुव, सोम, सूर्य तथा मेरुरूप विष्णुसे अवतरित हो भगवान् शिवके मस्तकपर आयी हैं और वहाँसे हिमालय पर्वतपर गिरी हैं॥

सुतावनीध्रस्य हरस्य भार्या
दिवो भुवश्चापि कृतानुरूपा।
भव्या पृथिव्यां भागिनी चापि राजन्
गङ्गा लोकानां पुण्यदा वै त्रयाणाम्॥ ८९॥
गंगाजी गिरिराज हिमालयकी पुत्री, भगवान् शंकरकी पत्नी तथा स्वर्ग और पृथ्वीकी शोभा हैं। राजन्! वे भूमण्डलपर निवास करनेवाले प्राणियोंका कल्याण करनेवाली, परम सौभाग्यवती तथा तीनों लोकोंको पुण्य प्रदान करनेवाली हैं॥ ८९॥

मधुस्रवा घृतधारा घृतार्चि-
र्महोर्मिभिः शोभिता ब्राह्मणैश्च।
दिवश्च्युता शिरसाऽऽप्ता शिवेन
गङ्गावनिधात् त्रिदिवस्य माता॥ ९०॥
श्रीभागीरथी मधुका स्रोत एवं पवित्र जलकी धारा बहाती हैं। जलती हुई घीकी ज्वालाके समान उनका उज्ज्वल प्रकाश है। वे अपनी उत्ताल तरङ्गों तथा जलमें स्नान-

संध्या करनेवाले ब्राह्मणोंसे सुशोभित होती हैं। वे जब स्वर्गसे नीचेकी ओर चलीं तब भगवान् शिवने उन्हें अपने सिरपर धारण किया। फिर हिमालय पर्वतपर आकर वहाँसे वे इस पृथ्वीपर उतरी हैं। श्रीगंगाजी स्वर्गलोककी जननी हैं ॥ ९० ॥

योनिर्वरिष्ठा विरजा वितन्वी शय्याचिरा वारिवहा यशोदा । विश्वावती चाकृतिरिष्टिसिद्धा गङ्गोक्षितानां भुवनस्य पन्थाः ॥ ९१ ॥

सबका कारण, सबसे श्रेष्ठ, रजोगुणरहित, अत्यन्त सूक्ष्म, मरे हुए प्राणियोंके लिये सुखद शय्या, तीव्र वेगसे बहनेवाली, पवित्र जलका स्रोत बहानेवाली, यश देनेवाली, जगत्की रक्षा करनेवाली, सत्स्वरूपा तथा अभीष्टको सिद्ध करनेवाली भगवती गंगा अपने भीतर स्नान करनेवालोंके लिये स्वर्गका मार्ग बन जाती हैं ॥

क्षान्त्या मह्या गोपने धारणे च दीप्त्या कृशानोस्तपनस्य चैव । तुल्या गङ्गा सम्मता ब्राह्मणानां गुहस्य ब्रह्मण्यतया च नित्यम् ॥ ९२ ॥

क्षमा, रक्षा तथा धारण करनेमें पृथ्वीके समान और तेजमें अग्नि एवं सूर्यके समान शोभा पानेवाली गंगाजी ब्राह्मणजातिपर सदा अनुग्रह करनेके कारण सुब्रह्मण्य कार्तिकेय तथा ब्राह्मणोंके लिये भी प्रिय एवं सम्मानित हैं ॥ ९२ ॥

ऋषिष्टुतां विष्णुपदीं पुराणां सुपुण्यतोयां मनसापि लोके । सर्वात्मना जाह्नवीं ये प्रपन्ना- स्ते ब्रह्मणः सदनं सम्प्रयाताः ॥ ९३ ॥

ऋषियोंद्वारा जिनकी स्तुति होती है, जो भगवान् विष्णुके चरणोंसे उत्पन्न, अत्यन्त प्राचीन तथा परम पावन जलसे भरी हुई हैं, उन गंगाजीकी जगत्में जो लोग मनके द्वारा भी सब प्रकारसे शरण लेते हैं वे देहत्यागके पश्चात् ब्रह्मलोकमें जाते हैं ॥ ९३ ॥

लोकानवेक्ष्य जननीव पुत्रान् सर्वात्मना सर्वगुणोपपन्नान् । तत्स्थानकं ब्राह्ममभीप्समानै- र्गङ्गा सदैवात्मवशैरूपास्या ॥ ९४ ॥

जैसे माता अपने पुत्रोंको स्नेहभरी दृष्टिसे देखती है और उनकी रक्षा करती है, उसी प्रकार गंगाजी सर्वात्मभावसे अपने आश्रयमें आये हुए सर्वगुणसम्पन्न लोकोंको कृपादृष्टिसे देखकर उनकी रक्षा करती हैं; अतः जो ब्रह्मलोकको प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं उन्हें अपने मनको वशमें करके सदा मातृभावसे गंगाजीकी उपासना करनी चाहिये ॥ ९४ ॥

उस्रां पुषां मिषतीं विश्वभोज्या- मिरावतीं धारिणीं भूधराणाम् । शिष्टाश्रयाममृतां ब्रह्मकान्तां गङ्गां श्रयेदात्मवान् सिद्धिकामः ॥ ९५ ॥ जो अमृतमय दूध देनेवाली, गौके समान सबको पुष्ट करनेवाली, सब कुछ देखनेवाली, सम्पूर्ण जगत्के उपयोगमें आनेवाली, अन्न देनेवाली तथा पर्वतोंको धारण करनेवाली हैं, श्रेष्ठ पुरुष जिनका आश्रय लेते हैं और जिन्हें ब्रह्माजी भी प्राप्त करना चाहते हैं; तथा जो अमृतस्वरूप हैं, उन भगवती गङ्गाजीका सिद्धिकामी जितात्मा पुरुषोंको अवश्य आश्रय लेना चाहिये ॥ ९५ ॥

प्रसाद्य देवान् सविभून् समस्तान् भगीरथस्तपसोग्रेण गङ्गाम् । गामानयत् तामभिगम्य शश्वत् पुंसां भयं नेह चामुत्र विद्यात् ॥ ९६ ॥ राजा भगीरथ अपनी उग्र तपस्यासे भगवान् शंकरसहित सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न करके गङ्गाजीको इस पृथ्वीपर ले आये। उनकी शरणमें जानेसे मनुष्यको इहलोक और परलोकमें भय नहीं रहता ॥ ९६ ॥

उदाहृतः सर्वथा ते गुणानां मयैकदेशः प्रसमीक्ष्य बुद्ध्या । शक्तिर्न मे काचिदिहास्ति वक्तुं गुणान् सर्वान् परिमातुं तथैव ॥ ९७ ॥ ब्रह्मन्! मैंने अपनी बुद्धिसे सर्वथा विचारकर यहाँ गङ्गाजीके गुणोंका एक अंशमात्र बताया है। मुझमें कोई इतनी शक्ति नहीं है कि मैं यहाँ उनके सम्पूर्ण गुणोंका वर्णन कर सकूँ ॥ ९७ ॥

मेरोः समुद्रस्य च सर्वयत्नैः संख्योपलानामुदकस्य वापि । शक्यं वक्तुं नेह गङ्गाजलानां गुणाख्यानं परिमातुं तथैव ॥ ९८ ॥ कदाचित् सब प्रकारके यत्न करनेसे मेरु गिरिके प्रस्तरकणों और समुद्रके जलविन्दुओँकी गणना की जा सके; परंतु यहाँ गङ्गाजलके गुणोंका वर्णन तथा गणना करना कदापि सम्भव नहीं है ॥ ९८ ॥

तस्मादेतान् परया श्रद्धयोक्तान् गुणान् सर्वान् जाह्नवीयात् सदैव । भवेद् वाचा मनसा कर्मणा च

भक्त्या युक्तः श्रद्धया श्रद्दधानः ॥ ९९ ॥
अतः मैंने बड़ी श्रद्धाके साथ जो ये गंगाजीके गुण बताये हैं, उन सबपर विश्वास करके मन, वाणी, क्रिया, भक्ति और श्रद्धाके साथ आप सदा ही उनकी आराधना करें ॥ ९९ ॥
लोकानिमांस्त्रीन् यशसा वितत्य
सिद्धिं प्राप्य महतीं तां दुरापाम् ।
गङ्गाकृतानचिरेणैव लोकान्
यथेष्टमिष्टान् विहरिष्यसि त्वम् ॥ १०० ॥
इससे आप परम दुर्लभ उत्तम सिद्धि प्राप्त करके इन तीनों लोकोंमें अपने यशका विस्तार करते हुए शीघ्र ही गंगाजीकी सेवासे प्राप्त हुए अभीष्ट लोकोंमें इच्छानुसार विचरेंगे ॥ १०० ॥
तव मम च गुणैर्महानुभावा
जुषतु मतिं सततं स्वधर्मयुक्तैः ।
अभिमतजनवत्सला हि गङ्गा
जगति युनक्ति सुखैश्च भक्तिमन्तम् ॥ १०१ ॥
महान् प्रभावशाली भगवती भागीरथी आपकी और मेरी बुद्धिको सदा स्वधर्मानुकूल गुणोंसे युक्त करें। श्रीगंगाजी बड़ी भक्तवत्सला हैं। वे संसारमें अपने भक्तोंको सुखी बनाती हैं ॥ १०१ ॥

भीष्म उवाच

इति परममतिर्गुणानशेषान्
शिलरतये त्रिपथानुयोगरूपान् ।
बहुविधमनुशास्य तथ्यरूपान्
गगनतलं द्युतिमान् विवेश सिद्धः ॥ १०२ ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! वह उत्तम बुद्धिवाला परम तेजस्वी सिद्ध शिलोञ्छवृत्तिद्वारा जीविका चलानेवाले उस ब्राह्मणसे त्रिपथगा गंगाजीके उपर्युक्त सभी यथार्थ गुणोंका नाना प्रकारसे वर्णन करके आकाशमें प्रविष्ट हो गया ॥ १०२ ॥
शिलवृत्तिस्तु सिद्धस्य वाक्यैः सम्बोधितस्तदा ।
गङ्गामुपास्य विधिवत् सिद्धिं प्राप सुदुर्लभाम् ॥ १०३ ॥
वह शिलोञ्छवृत्तिवाला ब्राह्मण सिद्धके उपदेशसे गंगाजीके माहात्म्यको जानकर उनकी विधिवत् उपासना करके परम दुर्लभ सिद्धिको प्राप्त हुआ ॥ १०३ ॥
तथा त्वमपि कौन्तेय भक्त्या परमया युतः ।
गङ्गामभ्येहि सततं प्राप्स्यसे सिद्धिमुत्तमाम् ॥ १०४ ॥

कुन्तीनन्दन! इसी प्रकार तुम भी पराभक्तिके साथ सदा गंगाजीकी उपासना करो। इससे तुम्हें उत्तम सिद्धि प्राप्त होगी ॥ १०४ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वेतिहासं भीष्मोक्तं गङ्गायाः स्तवसंयुतम् ।
युधिष्ठिरः परां प्रीतिमगच्छद् भ्रातृभिः सह ॥ १०५ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! भीष्मजीके द्वारा कहे हुए श्रीगंगाजीकी स्तुतिसे युक्त इस इतिहासको सुनकर भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ १०५ ॥

इतिहासमिमं पुण्यं शृणुयाद् यः पठेत् वा ।
गङ्गायाः स्तवसंयुक्तं स मुच्येत् सर्वकिल्बिषैः ॥ १०६ ॥
जो गङ्गाजीके स्तवनसे युक्त इस पवित्र इतिहासका श्रवण अथवा पाठ करेगा वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जायगा ॥ १०६ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गङ्गामाहात्म्यकथने
षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गंगाजीके माहात्म्यका वर्णनविषयक छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १०७ श्लोक हैं)

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सप्तविंशोऽध्यायः

ब्राह्मणत्वके लिये तपस्या करनेवाले मतङ्गकी इन्द्रसे बातचीत

युधिष्ठिर उवाच

प्रज्ञाश्रुताभ्यां वृत्तेन शीलेन च यथा भवान् ।
गुणैश्च विविधैः सर्वैर्वयसा च समन्वितः ॥ १ ॥
भवान् विशिष्टो बुद्ध्या च प्रज्ञया तपसा तथा ।
तस्माद् भवन्तं पृच्छामि धर्मं धर्मभृतां वर ।
नान्यस्त्वदन्यो लोकेषु प्रष्टव्योऽस्ति नराधिप ॥ २ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ नरेश्वर! आप बुद्धि, विद्या, सदाचार, शील और विभिन्न प्रकारके सम्पूर्ण सद्गुणोंसे सम्पन्न हैं। आपकी अवस्था भी सबसे बड़ी है। आप बुद्धि, प्रज्ञा और तपस्यासे विशिष्ट हैं; अतः मैं आपसे धर्मकी बात पूछता हूँ। संसारमें आपके सिवा दूसरा कोई ऐसा नहीं है जिससे सब प्रकारके प्रश्न पूछे जा सकें ॥ १-२ ॥

क्षत्रियो यदि वा वैश्यः शूद्रो वा राजसत्तम ।
ब्राह्मण्यं प्राप्नुयाद् येन तन्मे व्याख्यातुमर्हसि ॥ ३ ॥

नृपश्रेष्ठ! यदि क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र ब्राह्मणत्व प्राप्त करना चाहे तो वह किस उपायसे उसे पा सकता है? यह मुझे बताइये ॥ ३ ॥

तपसा वा सुमहता कर्मणा वा श्रुतेन वा ।
ब्राह्मण्यमथ चेदिच्छेत् तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ ४ ॥

पितामह! यदि कोई ब्राह्मणत्व पानेकी इच्छा करे तो वह उसे तपस्या, महान् कर्म अथवा वेदोंके स्वाध्याय आदि किस उपायसे प्राप्त कर सकता है? ॥ ४ ॥

भीष्म उवाच

ब्राह्मण्यं तात दुष्प्राप्यं वर्णैः क्षत्रादिभिस्त्रिभिः ।
परं हि सर्वभूतानां स्थानमेतद् युधिष्ठिर ॥ ५ ॥

**भीष्मजीने कहा—**तात युधिष्ठिर! क्षत्रिय आदि तीन वर्णोंके लिये ब्राह्मणत्व प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि यह समस्त प्राणियोंके लिये सर्वोत्तम स्थान है ॥ ५ ॥

बह्वीस्तु संसरन् योनीर्जायमानः पुनः पुनः ।
पर्याये तात कस्मिंश्चिद् ब्राह्मणो नाम जायते ॥ ६ ॥

तात! बहुत-सी योनियोंमें बारंबार जन्म लेते-लेते कभी किसी समय संसारी जीव ब्राह्मणकी योनिमें जन्म लेता है ॥ ६ ॥

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्। मतङ्गस्य च संवादं गर्दभ्याश्च युधिष्ठिर ।। ७ ।। युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार मनुष्य मतङ्ग और गर्दभीके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।। ७ ।।

द्विजातेः कस्यचित् तात तुल्यवर्णः सुतस्त्वभूत् । मतङ्गो नाम नाम्ना वै सर्वैः समुदितो गुणैः ।। ८ ।। तात! पूर्वकालमें किसी ब्राह्मणके एक मतङ्ग नामक पुत्र हुआ जो (अन्य वर्णके पुरुषसे उत्पन्न होनेपर भी ब्राह्मणोचित संस्कारोंके प्रभावसे) उनके समान वर्णका ही समझा जाता था, वह समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न था ।। ८ ।।

स यज्ञकारः कौन्तेय पित्रोत्सृष्टः परंतप । प्रायाद् गर्दभयुक्तेन रथेनाप्याशुगामिना ।। ९ ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले कुन्तीकुमार! एक दिन अपने पिताके भेजनेपर मतंग किसी यजमानका यज्ञ करानेके लिये गधोंसे जुते हुए शीघ्रगामी रथपर बैठकर चला ।। ९ ।।

स बालं गर्दभं राजन् वहन्तं मातुरन्तिके । निरविध्यत् प्रतोदेन नासिकायां पुनः पुनः ।। १० ।। राजन्! रथका बोझ ढोते हुए एक छोटी अवस्थाके गधेको उसकी माताके निकट ही मतंगने बारंबार चाबुकसे मारकर उसकी नाकमें घाव कर दिया ।। १० ।।

तत्र तीव्रं व्रणं दृष्ट्वा गर्दभी पुत्रगृद्धिनी । उवाच मा शुचः पुत्र चाण्डालस्त्वधितिष्ठति ।। ११ ।। पुत्रका भला चाहनेवाली गधी उस गधेकी नाकमें दुस्सह घाव हुआ देख उसे समझाती हुई बोली—'बेटा! शोक न करो। तुम्हारे ऊपर ब्राह्मण नहीं, चाण्डाल सवार है ।। ११ ।।

ब्राह्मणे दारुणं नास्ति मैत्रो ब्राह्मण उच्यते । आचार्यः सर्वभूतानां शास्ता किं प्रहरिष्यति ।। १२ ।। 'ब्राह्मणमें इतनी क्रूरता नहीं होती। ब्राह्मण सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला बताया जाता है। जो समस्त प्राणियोंको उपदेश देनेवाला आचार्य है, वह कैसे किसीपर प्रहार करेगा? ।। १२ ।।

अयं तु पापप्रकृतिर्बाले न कुरुते दयाम् । स्वयोनिं मानयत्येष भावो भावं नियच्छति ।। १३ ।। यह स्वभावसे ही पापात्मा है; इसीलिये दूसरेके बच्चेपर दया नहीं करता है। यह अपने इस कुकृत्यद्वारा अपनी चाण्डाल योनिका ही सम्मान बढ़ा रहा है। जातिगत स्वभाव ही मनोभावपर नियन्त्रण करता है ।। १३ ।।

एतत् श्रुत्वा मतङ्गस्तु दारुणं रासभीवचः । अवतीर्य रथात् तूर्णं रासभीं प्रत्यभाषत ।। १४ ।।

गधीका यह दारुण वचन सुनकर मतंग तुरंत रथसे उतर पड़ा और गधीसे इस प्रकार बोला— ॥ १४ ॥

ब्रूहि रासभि कल्याणि माता मे येन दूषिता ।
कथं मां वेत्सि चण्डालं क्षिप्रं रासभि शंस मे ॥ १५ ॥
‘कल्याणमयी गर्दभी! बता, मेरी माता किससे कलंकित हुई है? तू मुझे चाण्डाल कैसे समझती है? शीघ्र मुझसे सारी बात बता ।। १५ ।।

कथं मां वेत्सि चण्डालं ब्राह्मण्यं येन नश्यते ।
तत्त्वैनन्महाप्राज्ञे ब्रूहि सर्वमशेषतः ॥ १६ ॥
गधी! तुझे कैसे मालूम हुआ कि मैं चाण्डाल हूँ? किस कर्मसे मेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हुआ है? तू बड़ी समझदार है; अतः ये सारी बातें मुझे ठीक-ठीक बता’ ।।

गर्दभ्युवाच

ब्राह्मण्यां वृषलेन त्वं मत्तायां नापितेन ह ।
जातस्त्वमसि चाण्डालो ब्राह्मण्यं तेन तेऽनशत् ॥ १७ ॥
गदही बोली— मतंग! तू यौवनके मदसे मतवाली हुई एक ब्राह्मणीके पेटसे शूद्रजातीय नाईद्वारा पैदा किया गया, इसीलिये तू चाण्डाल है और तेरी माताके इसी व्यभिचार कर्मसे तेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया है ।। १७ ।।

एवमुक्तो मतङ्गस्तु प्रतिप्रायाद् गृहं प्रति ।
तमागतमभिप्रेक्ष्य पिता वाक्यमथाब्रवीत् ॥ १८ ॥
गदहीके ऐसा कहनेपर मतंग फिर अपने घरको लौट गया। उसे लौटकर आया देख पिताने इस प्रकार कहा— ।। १८ ।।

मया त्वं यज्ञसंसिद्धौ नियुक्तो गुरुकर्मणि ।
कस्मात् प्रतिनिवृत्तोऽसि कच्चिन्न कुशलं तव ॥ १९ ॥
बेटा! मैंने तो तुम्हें यज्ञ करानेके भारी कार्यपर लगा रखा था, फिर तुम लौट कैसे आये? तुम कुशलसे तो हो न? ।। १९ ।।

मतंग उवाच

अन्त्ययोनिरयोनिर्वा कथं स कुशली भवेत् ।
कुशलं तु कुतस्तस्य यस्येयं जननी पितः ॥ २० ॥
मतंगने कहा— पिताजी! जो चाण्डाल योनिमें उत्पन्न हुआ है, अथवा उससे भी नीच योनिमें पैदा हुआ है वह कैसे सकुशल रह सकता है। जिसे ऐसी माता मिली हो उसे कहाँसे कुशलता प्राप्त होगी ।। २० ।।

ब्राह्मण्यां वृषलाज्जातं पितर्वेदयतीव माम् ।
अमानुषी गर्दभीयं तस्मात् तप्स्ये तपो महत् ॥ २१ ॥

पिताजी! यह मानवेतर योनिमें उत्पन्न हुई गदही मुझे ब्राह्मणीके गर्भसे द्वारा पैदा हुआ बता रही है; इसलिये अब मैं महान् तपमें लग जाऊँगा ॥ २१ ॥ एवमुक्त्वा स पितरं प्रतस्थे कृतनिश्चयः । ततो गत्वा महारण्यमतपत् सुमहत्तु तपः ॥ २२ ॥ पितासे ऐसा कहकर मतंग तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके घरसे निकल पड़ा और एक महान् वनमें जाकर वहाँ बड़ी भारी तपस्या करने लगा ॥ २२ ॥ ततः स तापयामास विबुधांस्तपसान्वितः । मतङ्गः सुखसम्प्रेप्सुः स्थानं सुचरितादपि ॥ २३ ॥ तपस्यामें संलग्न हो मतंगने देवताओंको संतप्त कर दिया। वह भलीभाँति तपस्या करके सुखसे ही ब्राह्मणत्वरूपी अभीष्ट स्थानको प्राप्त करना चाहता था ॥ २३ ॥ तं तथा तपसा युक्तमुवाच हरिवाहनः । मतङ्ग तप्स्यसे किं त्वं भोगानुत्सृज्य मानुषान् ॥ २४ ॥ उसे इस प्रकार तपस्यामें संलग्न देख इन्द्रने कहा—'मतंग! तुम क्यों मानवीय भोगोंका परित्याग करके तपस्या कर रहे हो? ॥ २४ ॥ वरं ददामि ते हन्त वृणीष्व त्वं यदिच्छसि । यच्चाप्यवाप्यं हृदि ते सर्वं तद् ब्रूहि माचिरम् ॥ २५ ॥ मैं तुम्हें वर देता हूँ। तुम जो चाहते हो उसे प्रसन्नतापूर्वक माँग लो। तुम्हारे हृदयमें जो कुछ पानेकी अभिलाषा हो, वह सब शीघ्र बताओ' ॥ २५ ॥

मतंग उवाच

ब्राह्मण्यं कामयानोऽहमिदमारब्धवांस्तपः । गच्छेयं तदवाप्येह वर एष वृतो मया ॥ २६ ॥ **मतंगने कहा—**मैंने ब्राह्मणत्व प्राप्त करनेकी इच्छासे यह तपस्या प्रारम्भ की है। उसे पा करके ही यहाँसे जाऊँ, मैं यही वर चाहता हूँ ॥ २६ ॥

भीष्म उवाच

एतत् श्रुत्वा तु वचनं तमुवाच पुरंदरः । मतङ्ग दुर्लभमिदं विप्रत्वं प्रार्थ्यते त्वया ॥ २७ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**भारत! मतंगकी यह बात सुनकर इन्द्रदेवने कहा—'मतंग! तुम जो ब्राह्मणत्व माँग रहे हो, यह तुम्हारे लिये दुर्लभ है' ॥ २७ ॥ ब्राह्मण्यं प्रार्थयानस्त्वमप्राप्यमकृतात्मभिः । विनशिष्यसि दुर्बुद्धे तदुपारम माचिरम् ॥ २८ ॥ जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है अथवा जो पुण्यात्मा नहीं हैं, उनके लिये ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति असम्भव है। दुर्बुद्धे! तुम ब्राह्मणत्व माँगते-माँगते मर जाओगे तो भी

वह नहीं मिलेगा; अतः इस दुराग्रहसे जितना शीघ्र सम्भव हो निवृत्त हो जाओ ।। २८ ।।
श्रेष्ठतां सर्वभूतेषु तपोऽर्थं नातिवर्तते ।
तदग्रयं प्रार्थयानस्त्वमचिराद् विनशिष्यसि ।। २९ ।।
‘सम्पूर्ण भूतोंमें श्रेष्ठता ही ब्राह्मणत्व है और यही तुम्हारा अभीष्ट प्रयोजन है, परंतु यह तप उस प्रयोजनको सिद्ध नहीं कर सकता; अतः इस श्रेष्ठ पदकी अभिलाषा रखते हुए तुम शीघ्र ही नष्ट हो जाओगे ।। २९ ।।
देवतासुरमर्त्येषु यत् पवित्रं परं स्मृतम् ।
चण्डालयोनौ जातेन न तत् प्राप्यं कथंचन ।। ३० ।।
‘देवताओं, असुरों और मनुष्योंमें भी जो परम पवित्र माना गया है उस ब्राह्मणत्वको चाण्डालयोनिमें उत्पन्न हुआ मनुष्य किसी तरह नहीं पा सकता’ ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि इन्द्रमतङ्गसंवादे सप्तविंशोऽध्यायः ।। २७ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें इन्द्र और मतंगका संवादविषयक सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २७ ।।

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अष्टाविंशोऽध्यायः

ब्राह्मणत्व प्राप्त करनेका आग्रह छोड़कर दूसरा वर माँगनेके लिये इन्द्रका मतङ्गको समझाना

भीष्म उवाच

एवमुक्तो मतङ्गस्तु संशितात्मा यतव्रतः ।
अतिष्ठदेकपादेन वर्षाणां शतमच्युतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! इन्द्रके ऐसा कहनेपर मतंगका मन और भी दृढ़ हो गया। वह संयमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करने लगा। अपने धैर्यसे च्युत न होनेवाला मतंग सौ वर्षोंतक एक पैरसे खड़ा रहा ॥ १ ॥

तमुवाच ततः शक्रः पुनरेव महायशाः ।
ब्राह्मण्यं दुर्लभं तात प्रार्थयानो न लप्स्यसे ॥ २ ॥
तब महायशस्वी इन्द्रने पुनः आकर उससे कहा—'तात! ब्राह्मणत्व दुर्लभ है। उसे माँगनेपर भी पा न सकोगे ॥ २ ॥

मतङ्ग परमं स्थानं प्रार्थयन् विनशिष्यसि ।
मा कृथाः साहसं पुत्र नैष धर्मपथस्तव ॥ ३ ॥
मतंग! तुम इस उत्तम स्थानको माँगते-माँगते मर जाओगे। बेटा! दुःसाहस न करो। तुम्हारे लिये यह धर्मका मार्ग नहीं है ॥ ३ ॥

न हि शक्यं त्वया प्राप्तुं ब्राह्मण्यमिह दुर्मते ।
अप्राप्यं प्रार्थयानो हि नचिराद् विनशिष्यसि ॥ ४ ॥
'दुर्मते! तुम इस जीवनमें ब्राह्मणत्व नहीं पा सकते। उस अप्राप्य वस्तुके लिये प्रार्थना करते-करते शीघ्र ही कालके गालमें चले जाओगे ॥ ४ ॥

मतङ्ग परमं स्थानं वार्यमाणोऽसकृन्मया ।
चिकीर्षस्येव तपसा सर्वथा न भविष्यसि ॥ ५ ॥
'मतंग! मैं तुम्हें बार-बार मना करता हूँ तो भी उस उत्कृष्ट स्थानको तुम तपस्याद्वारा प्राप्त करनेकी अभिलाषा करते ही जाते हो। ऐसा करनेसे सर्वथा तुम्हारी सत्ता मिट जायगी ॥ ५ ॥

तिर्यग्योनिगतः सर्वो मानुष्यं यदि गच्छति ।
स जायते पुल्कसो वा चण्डालो वाप्यसंशयः ॥ ६ ॥
'पशु-पक्षीकी योनिमें पड़े हुए सभी प्राणी यदि कभी मनुष्ययोनिमें जाते हैं तो पहले पुल्कस या चाण्डालके रूपमें जन्म लेते हैं—इसमें संशय नहीं है ॥ ६ ॥

पुल्कसः पापयोनिर्वा यः कश्चिदिह लक्ष्यते । स तस्यामेव सुचिरं मतङ्ग परिवर्तते ॥ ७ ॥ 'मतंग! पुल्कस या जो कोई भी पापयोनि पुरुष यहाँ दिखायी देता है वह सुदीर्घकालतक अपनी उसी योनिमें चक्कर लगाता रहता है ॥ ७ ॥ ततो दशशते काले लभते शूद्रतामपि । शूद्रयोनावपि ततो बहुशः परिवर्तते ॥ ८ ॥ 'तदनन्तर एक हजार वर्ष बीतनेपर वह चाण्डाल या पुल्कस शूद्रयोनिमें जन्म लेता है और उसमें भी अनेक जन्मोंतक चक्कर लगाता रहता है ॥ ८ ॥ ततस्त्रिंशद्गुणे काले लभते वैश्यतामपि । वैश्यतायां चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ॥ ९ ॥ 'तत्पश्चात् तीसगुना समय बीतनेपर वह वैश्य-योनिमें आता है और चिरकालतक उसीमें चक्कर काटता रहता है ॥ ९ ॥ ततः षष्टिगुणे काले राजन्यो नाम जायते । ततः षष्टिगुणे काले लभते ब्रह्मबन्धुताम् ॥ १० ॥ इसके बाद साठगुना समय बीतनेपर वह क्षत्रियकी योनिमें जन्म लेता है। फिर उससे भी साठगुना समय बीतनेपर वह गिरे हुए ब्राह्मणके घरमें जन्म लेता है ॥ १० ॥ ब्रह्मबन्धुश्चिरं कालं ततस्तु परिवर्तते । ततस्तु द्विशते काले लभते काण्डपृष्ठताम् ॥ ११ ॥ 'दीर्घकालतक ब्राह्मणाधम रहकर जब उसकी अवस्था परिवर्तित होती है तब वह अस्त्र-शस्त्रोंसे जीविका चलानेवाले ब्राह्मणके यहाँ जन्म लेता है ॥ ११ ॥ काण्डपृष्ठिश्चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते । ततस्तु त्रिशते काले लभते जपतामपि ॥ १२ ॥ फिर चिरकालतक वह उसी योनिमें पड़ा रहता है। तदनन्तर तीन सौ वर्षका समय व्यतीत होनेपर वह गायत्री-मात्रका जप करनेवाले ब्राह्मणके यहाँ जन्म लेता है ॥ १२ ॥ तं च प्राप्य चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते । ततश्चतुःशते काले श्रोत्रियो नाम जायते । श्रोत्रियत्वे चिरं कालं तत्रैव परिवर्तते ॥ १३ ॥ उस जन्मको पाकर वह चिरकालतक उसी योनिमें जन्मता-मरता रहता है। फिर चार सौ वर्षोंका समय व्यतीत होनेपर वह श्रोत्रिय (वेदवेत्ता) ब्राह्मणके कुलमें जन्म लेता है और उसी कुलमें चिरकालतक उसका आवागमन होता रहता है ॥ १३ ॥ तदेवं शोकहर्षौ तु कामद्वेषौ च पुत्रक । अतिमानातिवादौ च प्रविशेते द्विजाधमम् ॥ १४ ॥