महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 375, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंगधीका यह दारुण वचन सुनकर मतंग तुरंत रथसे उतर पड़ा और गधीसे इस प्रकार बोला— ॥ १४ ॥
ब्रूहि रासभि कल्याणि माता मे येन दूषिता ।
कथं मां वेत्सि चण्डालं क्षिप्रं रासभि शंस मे ॥ १५ ॥
‘कल्याणमयी गर्दभी! बता, मेरी माता किससे कलंकित हुई है? तू मुझे चाण्डाल कैसे समझती है? शीघ्र मुझसे सारी बात बता ।। १५ ।।
कथं मां वेत्सि चण्डालं ब्राह्मण्यं येन नश्यते ।
तत्त्वैनन्महाप्राज्ञे ब्रूहि सर्वमशेषतः ॥ १६ ॥
गधी! तुझे कैसे मालूम हुआ कि मैं चाण्डाल हूँ? किस कर्मसे मेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हुआ है? तू बड़ी समझदार है; अतः ये सारी बातें मुझे ठीक-ठीक बता’ ।।
गर्दभ्युवाच
ब्राह्मण्यां वृषलेन त्वं मत्तायां नापितेन ह ।
जातस्त्वमसि चाण्डालो ब्राह्मण्यं तेन तेऽनशत् ॥ १७ ॥
गदही बोली— मतंग! तू यौवनके मदसे मतवाली हुई एक ब्राह्मणीके पेटसे शूद्रजातीय नाईद्वारा पैदा किया गया, इसीलिये तू चाण्डाल है और तेरी माताके इसी व्यभिचार कर्मसे तेरा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया है ।। १७ ।।
एवमुक्तो मतङ्गस्तु प्रतिप्रायाद् गृहं प्रति ।
तमागतमभिप्रेक्ष्य पिता वाक्यमथाब्रवीत् ॥ १८ ॥
गदहीके ऐसा कहनेपर मतंग फिर अपने घरको लौट गया। उसे लौटकर आया देख पिताने इस प्रकार कहा— ।। १८ ।।
मया त्वं यज्ञसंसिद्धौ नियुक्तो गुरुकर्मणि ।
कस्मात् प्रतिनिवृत्तोऽसि कच्चिन्न कुशलं तव ॥ १९ ॥
बेटा! मैंने तो तुम्हें यज्ञ करानेके भारी कार्यपर लगा रखा था, फिर तुम लौट कैसे आये? तुम कुशलसे तो हो न? ।। १९ ।।
मतंग उवाच
अन्त्ययोनिरयोनिर्वा कथं स कुशली भवेत् ।
कुशलं तु कुतस्तस्य यस्येयं जननी पितः ॥ २० ॥
मतंगने कहा— पिताजी! जो चाण्डाल योनिमें उत्पन्न हुआ है, अथवा उससे भी नीच योनिमें पैदा हुआ है वह कैसे सकुशल रह सकता है। जिसे ऐसी माता मिली हो उसे कहाँसे कुशलता प्राप्त होगी ।। २० ।।
ब्राह्मण्यां वृषलाज्जातं पितर्वेदयतीव माम् ।
अमानुषी गर्दभीयं तस्मात् तप्स्ये तपो महत् ॥ २१ ॥