महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 376, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपिताजी! यह मानवेतर योनिमें उत्पन्न हुई गदही मुझे ब्राह्मणीके गर्भसे द्वारा पैदा हुआ बता रही है; इसलिये अब मैं महान् तपमें लग जाऊँगा ॥ २१ ॥ एवमुक्त्वा स पितरं प्रतस्थे कृतनिश्चयः । ततो गत्वा महारण्यमतपत् सुमहत्तु तपः ॥ २२ ॥ पितासे ऐसा कहकर मतंग तपस्याके लिये दृढ़ निश्चय करके घरसे निकल पड़ा और एक महान् वनमें जाकर वहाँ बड़ी भारी तपस्या करने लगा ॥ २२ ॥ ततः स तापयामास विबुधांस्तपसान्वितः । मतङ्गः सुखसम्प्रेप्सुः स्थानं सुचरितादपि ॥ २३ ॥ तपस्यामें संलग्न हो मतंगने देवताओंको संतप्त कर दिया। वह भलीभाँति तपस्या करके सुखसे ही ब्राह्मणत्वरूपी अभीष्ट स्थानको प्राप्त करना चाहता था ॥ २३ ॥ तं तथा तपसा युक्तमुवाच हरिवाहनः । मतङ्ग तप्स्यसे किं त्वं भोगानुत्सृज्य मानुषान् ॥ २४ ॥ उसे इस प्रकार तपस्यामें संलग्न देख इन्द्रने कहा—'मतंग! तुम क्यों मानवीय भोगोंका परित्याग करके तपस्या कर रहे हो? ॥ २४ ॥ वरं ददामि ते हन्त वृणीष्व त्वं यदिच्छसि । यच्चाप्यवाप्यं हृदि ते सर्वं तद् ब्रूहि माचिरम् ॥ २५ ॥ मैं तुम्हें वर देता हूँ। तुम जो चाहते हो उसे प्रसन्नतापूर्वक माँग लो। तुम्हारे हृदयमें जो कुछ पानेकी अभिलाषा हो, वह सब शीघ्र बताओ' ॥ २५ ॥
मतंग उवाच
ब्राह्मण्यं कामयानोऽहमिदमारब्धवांस्तपः । गच्छेयं तदवाप्येह वर एष वृतो मया ॥ २६ ॥ **मतंगने कहा—**मैंने ब्राह्मणत्व प्राप्त करनेकी इच्छासे यह तपस्या प्रारम्भ की है। उसे पा करके ही यहाँसे जाऊँ, मैं यही वर चाहता हूँ ॥ २६ ॥
भीष्म उवाच
एतत् श्रुत्वा तु वचनं तमुवाच पुरंदरः । मतङ्ग दुर्लभमिदं विप्रत्वं प्रार्थ्यते त्वया ॥ २७ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**भारत! मतंगकी यह बात सुनकर इन्द्रदेवने कहा—'मतंग! तुम जो ब्राह्मणत्व माँग रहे हो, यह तुम्हारे लिये दुर्लभ है' ॥ २७ ॥ ब्राह्मण्यं प्रार्थयानस्त्वमप्राप्यमकृतात्मभिः । विनशिष्यसि दुर्बुद्धे तदुपारम माचिरम् ॥ २८ ॥ जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं है अथवा जो पुण्यात्मा नहीं हैं, उनके लिये ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति असम्भव है। दुर्बुद्धे! तुम ब्राह्मणत्व माँगते-माँगते मर जाओगे तो भी