भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 374

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्। मतङ्गस्य च संवादं गर्दभ्याश्च युधिष्ठिर ।। ७ ।। युधिष्ठिर! इस विषयमें जानकार मनुष्य मतङ्ग और गर्दभीके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ।। ७ ।।

द्विजातेः कस्यचित् तात तुल्यवर्णः सुतस्त्वभूत् । मतङ्गो नाम नाम्ना वै सर्वैः समुदितो गुणैः ।। ८ ।। तात! पूर्वकालमें किसी ब्राह्मणके एक मतङ्ग नामक पुत्र हुआ जो (अन्य वर्णके पुरुषसे उत्पन्न होनेपर भी ब्राह्मणोचित संस्कारोंके प्रभावसे) उनके समान वर्णका ही समझा जाता था, वह समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न था ।। ८ ।।

स यज्ञकारः कौन्तेय पित्रोत्सृष्टः परंतप । प्रायाद् गर्दभयुक्तेन रथेनाप्याशुगामिना ।। ९ ।। शत्रुओंको संताप देनेवाले कुन्तीकुमार! एक दिन अपने पिताके भेजनेपर मतंग किसी यजमानका यज्ञ करानेके लिये गधोंसे जुते हुए शीघ्रगामी रथपर बैठकर चला ।। ९ ।।

स बालं गर्दभं राजन् वहन्तं मातुरन्तिके । निरविध्यत् प्रतोदेन नासिकायां पुनः पुनः ।। १० ।। राजन्! रथका बोझ ढोते हुए एक छोटी अवस्थाके गधेको उसकी माताके निकट ही मतंगने बारंबार चाबुकसे मारकर उसकी नाकमें घाव कर दिया ।। १० ।।

तत्र तीव्रं व्रणं दृष्ट्वा गर्दभी पुत्रगृद्धिनी । उवाच मा शुचः पुत्र चाण्डालस्त्वधितिष्ठति ।। ११ ।। पुत्रका भला चाहनेवाली गधी उस गधेकी नाकमें दुस्सह घाव हुआ देख उसे समझाती हुई बोली—'बेटा! शोक न करो। तुम्हारे ऊपर ब्राह्मण नहीं, चाण्डाल सवार है ।। ११ ।।

ब्राह्मणे दारुणं नास्ति मैत्रो ब्राह्मण उच्यते । आचार्यः सर्वभूतानां शास्ता किं प्रहरिष्यति ।। १२ ।। 'ब्राह्मणमें इतनी क्रूरता नहीं होती। ब्राह्मण सबके प्रति मैत्रीभाव रखनेवाला बताया जाता है। जो समस्त प्राणियोंको उपदेश देनेवाला आचार्य है, वह कैसे किसीपर प्रहार करेगा? ।। १२ ।।

अयं तु पापप्रकृतिर्बाले न कुरुते दयाम् । स्वयोनिं मानयत्येष भावो भावं नियच्छति ।। १३ ।। यह स्वभावसे ही पापात्मा है; इसीलिये दूसरेके बच्चेपर दया नहीं करता है। यह अपने इस कुकृत्यद्वारा अपनी चाण्डाल योनिका ही सम्मान बढ़ा रहा है। जातिगत स्वभाव ही मनोभावपर नियन्त्रण करता है ।। १३ ।।

एतत् श्रुत्वा मतङ्गस्तु दारुणं रासभीवचः । अवतीर्य रथात् तूर्णं रासभीं प्रत्यभाषत ।। १४ ।।