भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 391, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 391

पुत्रं प्रस्थापयामास प्रतर्दनमरिंदमम् ॥ ३७ ॥ इसके बाद राजाने अपने पुत्र शत्रुदमन प्रतर्दनको वीतहव्यके पुत्रोंका वध करनेके लिये भेजा ॥ ३७ ॥

सरथः स तु संतीर्य गङ्गामाशु पराक्रमी । प्रययौ वीतहव्यानां पुरीं परपुरञ्जयः ॥ ३८ ॥ पिताकी आज्ञा पाकर वह शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला पराक्रमी वीर शीघ्र ही रथसहित गंगापार करके वीतहव्यपुत्रोंकी राजधानीकी ओर चल दिया ॥ ३८ ॥

वैतहव्यास्तु संश्रुत्य रथघोषं समुद्धतम् । निर्ययुर्नगराकारै रथैः पररथारुजैः ॥ ३९ ॥ निष्क्रम्य ते नरव्याघ्रा दंशिताश्चित्रयोधिनः । प्रतर्दनं समाजग्मुः शरवर्षैरुदायुधाः ॥ ४० ॥ उसके रथकी घोर घरघराहट सुनकर विचित्र ढंगसे युद्ध करनेवाले पुरुषसिंह हैहयराजकुमार कवचसे सुसज्जित होकर शत्रुओंके रथको तोड़ डालनेवाले नगराकार विशाल रथोंपर बैठे हुए पुरीसे बाहर निकले और धनुष उठाये बाणोंकी वर्षा करते हुए प्रतर्दनपर चढ़ आये ॥ ३९-४० ॥

शस्त्रैश्च विविधाकारै रथौघैश्च युधिष्ठिर । अभ्यवर्षन्त राजानं हिमवन्तमिवाम्बुदाः ॥ ४१ ॥ युधिष्ठिर! जैसे बादल हिमालयपर जल बरसाते हैं, उसी प्रकार हैहयराजकुमारोंने रथसमूहोंद्वारा आकर राजा प्रतर्दनपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ ४१ ॥

अस्त्रैरस्त्राणि संवार्य तेषां राजा प्रतर्दनः । जघान तान् महातेजा वज्रानलसमैः शरैः ॥ ४२ ॥ तब महा तेजस्वी राजा प्रतर्दनने अपने अस्त्रोंद्वारा शत्रुओंके अस्त्रोंका निवारण करके वज्र और अग्निके समान तेजस्वी बाणोंसे उन सबको मार डाला ॥ ४२ ॥

कृत्तोत्तमाङ्गास्ते राजन् भल्लैः शतसहस्रशः । अपतन् रुधिरार्द्राङ्गा निकृत्ता इव किंशुकाः ॥ ४३ ॥ राजन्! भल्लोंकी मारसे उनके मस्तकोंके सैकड़ों और हजारों टुकड़े हो गये थे। उनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो गये और वे कटे हुए पलाशके वृक्षकी भाँति धरतीपर गिर पड़े ॥ ४३ ॥

हतेषु तेषु सर्वेषु वीतहव्यः सुतेष्वथ । प्राद्रवन्नगरं हित्वा भृगोराश्रममप्युत ॥ ४४ ॥ उन सब पुत्रोंके मारे जानेपर राजा वीतहव्य अपना नगर छोड़कर महर्षि भृगुके आश्रममें भाग गये ॥ ४४ ॥