भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 392, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 392

ययौ भृगुं च शरणं वीतहव्यो नराधिपः । अभयं च ददौ तस्मै राजे राजन् भृगुस्तदा ॥ ४५ ॥ राजन्! वहाँ नरेश्वर वीतहव्यने महर्षि भृगुकी शरण ली। तब भृगुने राजाको अभयदान दे दिया ॥ ४५ ॥

अथानुपदमेवाशु तत्रागच्छत् प्रतर्दनः । स प्राप्य चाश्रमपदं दिवोदासात्मजोऽब्रवीत् ॥ ४६ ॥ इतनेहीमें उनके पीछे लगा हुआ दिवोदासकुमार प्रतर्दन भी शीघ्र ही वहाँ पहुँचा। आश्रममें पहुँचकर उसने इस प्रकार कहा— ॥ ४६ ॥

भो भोः केऽत्राश्रमे सन्ति भृगोः शिष्या महात्मनः । द्रष्टुमिच्छे मुनिमंह तस्याचक्षत मामिति ॥ ४७ ॥ भाइयो! इस आश्रममें महात्मा भृगुके शिष्य कौन-कौन हैं? मैं महर्षिका दर्शन करना चाहता हूँ। आपलोग उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दे दें ॥ ४७ ॥

स तं विदित्वा तु भृगुर्निष्क्रमाश्रमात् तदा । पूजयामास च ततो विधिना नृपसत्तमम् ॥ ४८ ॥ प्रतर्दनको आया जान भृगुजी आश्रमसे निकले। उन्होंने नृपश्रेष्ठ प्रतर्दनका विधिपूर्वक स्वागत-सत्कार किया ॥

उवाच चैनं राजेन्द्र किं कार्यं ब्रूहि पार्थिव । स चोवाच नृपस्तस्मै यदागमनकारणम् ॥ ४९ ॥ और इस प्रकार पूछा—'राजेन्द्र! पृथ्वीनाथ! मुझसे आपका क्या काम है, बताइये।' तब राजाने उनसे अपने आगमनका जो कारण था, उसे इस प्रकार बताया ॥ ४९ ॥

राजोवाच

अयं ब्रह्मन्नितो राजा वीतहव्यो विसर्ज्यताम् । तस्य पुत्रैर्हि मे कृत्स्नो ब्रह्मन् वंशः प्रणाशितः ॥ ५० ॥ राजाने कहा— ब्रह्मन्! राजा वीतहव्यको आप यहाँसे बाहर निकाल दीजिये। विप्रवर! इनके पुत्रोंने मेरे सम्पूर्ण कुलका विनाश कर डाला है ॥ ५० ॥

उत्साद्यितश्च विषयः काशीनां रत्नसंचयः । एतस्य वीर्यदृप्तस्य हतं पुत्रशतं मया ॥ ५१ ॥ अस्येदानीं वधादद्य भविष्याम्यनृणः पितुः । इतना ही नहीं, उनके पुत्रोंने काशिप्रान्तका सारा राज्य उजाड़ डाला और रत्नोंका संग्रह लूट लिया है। बलके घमंडमें भरे हुए इन राजाके सौ पुत्रोंको तो मैंने मार डाला; अब केवल ये ही रह गये हैं। इस समय इनका भी वध करके मैं पिताके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा? ।। ५१ १/२ ।।