महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 405, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाशीराज्यं तदद्यैव त्वदर्थं जीवितं तथा । त्यजेयं भव विश्रब्धः कपोत न भयं तव ॥ ९ ॥ ‘कबूतर! आज ही मैं तेरी रक्षाके लिये यह काशिराज्य अर्थात् प्रकाशमान उशीनर देशका राज्य तथा अपना जीवन भी निछावर कर दूँगा। तू इस बातपर विश्वास करके निश्चिन्त हो जा। अब तुझे कोई भय नहीं है’ ॥ ९ ॥
श्येन उवाच
ममैतद् विहितं भक्ष्यं न राजंस्त्रातुमर्हसि । अतिक्रान्तं च प्राप्तं च प्रयत्नाच्चोपपादितम् ॥ १० ॥ इतनेहीमें बाज भी वहाँ आ गया और बोला—राजन्! विधाताने इस कबूतरको मेरा भोजन नियत किया है। आप इसकी रक्षा न करें। इसका जीवन गया हुआ ही है; क्योंकि अब यह मुझे मिल गया है। इसे मैंने बड़े प्रयत्नसे प्राप्त किया है ॥ १० ॥
मांसं च रुधिरं चास्य मज्जा मेदश्च मे हितम् । परितोषकरो ह्येष मम मास्याग्रतो भव ॥ ११ ॥ इसके रक्त, मांस, मज्जा और मेदा सभी मेरे लिये हितकर हैं। यह कबूतर मेरी क्षुधा मिटाकर मुझे पूर्णतः तृप्त कर देगा; अतः आप इस मेरे आहारके आगे आकर विघ्न न डालिये ॥ ११ ॥
तृष्णा मे बाधतेऽत्युग्रा क्षुधा निर्दहतीव माम् । मुञ्चैनं न हि शक्ष्यामि राजन् मन्दयितुं क्षुधाम् ॥ १२ ॥ मुझे बड़े जोरकी प्यास सता रही है। भूखकी ज्वाला मुझे दग्ध-सा किये देती है। राजन्! उसे छोड़ दीजिये। मैं अपनी भूखको दबा नहीं सकूँगा ॥ १२ ॥
मया ह्यनुसृतो ह्येष मत्पक्षनखविक्षतः । किंचिदुच्छ्वासनिःश्वासं न राजन् गोप्तुमर्हसि ॥ १३ ॥ मैं बड़ी दूरसे इसके पीछे पड़ा हुआ हूँ। यह मेरे पंखों और पंजोंसे घायल हो चुका है। अब इसकी कुछ-कुछ साँस बाकी रह गयी है। राजन्! ऐसी दशामें आप इसकी रक्षा न करें ॥ १३ ॥
यदि स्वविषये राजन् प्रभुस्त्वं रक्षणे नृणाम् । खेचरस्य तृषार्तस्य न त्वं प्रभुरथोत्तम् ॥ १४ ॥ श्रेष्ठ नरेश्वर! अपने देशमें रहनेवाले मनुष्योंकी ही रक्षा करनेके लिये आप राजा बनाये गये हैं। भूख-प्याससे पीड़ित हुए पक्षीके आप स्वामी नहीं हैं ॥ १४ ॥
यदि वैरिषु भृत्येषु स्वजनव्यवहारयोः । विषयेष्विन्द्रियाणां च आकाशे मा पराक्रम ॥ १५ ॥