महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 406, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदि आपमें शक्ति है तो वैरियों, सेवकों, स्वजनों, वादी-प्रतिवादीके व्यवहारों (मुद्दई-मुद्दालहोंके मामलों) तथा इन्द्रियोंके विषयोंपर पराक्रम प्रकट कीजिये। आकाशमें रहनेवालोंपर अपने बलका प्रयोग न कीजिये ॥ १५ ॥
प्रभुत्वं हि पराक्रम्य सम्यक् पक्षहरेषु ते। यदि त्वमिह धर्मार्थी मामपि द्रष्टुमर्हसि ॥ १६ ॥ जो लोग आपकी आज्ञाभंग करनेवाले शत्रुकोटिके अन्तर्गत हैं उनपर पराक्रम करके अपनी प्रभुता प्रकट करना आपके लिये उचित हो सकता है। यदि धर्मके लिये आप यहाँ कबूतरकी रक्षा करते हों तो मुझ भूखे पक्षीपर भी आपको दृष्टि डालनी चाहिये ॥ १६ ॥
भीष्म उवाच
श्रुत्वा श्येनस्य तद् वाक्यं राजर्षिर्विस्मयं गतः। सम्भाव्य चैनं तद्वाक्यं तदर्थी प्रत्यभाषत ॥ १७ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! बाजकी यह बात सुनकर राजर्षि उशीनरको बड़ा विस्मय हुआ। वे उसके कथनकी प्रशंसा करके कपोतकी रक्षाके लिये इस प्रकार बोले— ॥ १७ ॥
राजोवाच
गोवृषो वा वराहो वा मृगो वा महिषोऽपि वा। त्वदर्थमद्य क्रियतां क्षुधाप्रशमनाय ते ॥ १८ ॥ **राजाने कहा—**बाज! तुम चाहो तो तुम्हारी भूख मिटानेके लिये आज तुम्हारे भोजनके निमित्त बैल, भैंसा, सूअर अथवा मृग प्रस्तुत कर दिया जाय ॥ १८ ॥
शरणागतं न त्यजेयमिति मे व्रतमाहितम्। न मुञ्चति ममाङ्गानि द्विजोऽयं पश्य वै द्विज ॥ १९ ॥ विहंगम! मैं शरणागतका त्याग नहीं कर सकता—यह मेरा व्रत है। देखो, यह पक्षी भयके मारे मेरे अंगोंको छोड़ नहीं रहा है ॥ १९ ॥
श्येन उवाच
न वराहं न चोक्षाणं न चान्यान् विविधान् द्विजान्। भक्षयामि महाराज किमन्याद्येन तेन मे ॥ २० ॥ **बाजने कहा—**महाराज! मैं न तो सूअर, न बैल और न दूसरे ही नाना प्रकारके पक्षियोंका मांस खाऊँगा। जो दूसरोंका भोजन है उसे लेकर मैं क्या करूँगा ॥ २० ॥
यस्तु मे विहितो भक्ष्यः स्वयं देवैः सनातनः। श्येनाः कपोतान् खादन्ति स्थितिरेषा सनातनी ॥ २१ ॥