महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
यदि आपमें शक्ति है तो वैरियों, सेवकों, स्वजनों, वादी-प्रतिवादीके व्यवहारों (मुद्दई-मुद्दालहोंके मामलों) तथा इन्द्रियोंके विषयोंपर पराक्रम प्रकट कीजिये। आकाशमें रहनेवालोंपर अपने बलका प्रयोग न कीजिये ॥ १५ ॥
प्रभुत्वं हि पराक्रम्य सम्यक् पक्षहरेषु ते। यदि त्वमिह धर्मार्थी मामपि द्रष्टुमर्हसि ॥ १६ ॥ जो लोग आपकी आज्ञाभंग करनेवाले शत्रुकोटिके अन्तर्गत हैं उनपर पराक्रम करके अपनी प्रभुता प्रकट करना आपके लिये उचित हो सकता है। यदि धर्मके लिये आप यहाँ कबूतरकी रक्षा करते हों तो मुझ भूखे पक्षीपर भी आपको दृष्टि डालनी चाहिये ॥ १६ ॥
भीष्म उवाच
श्रुत्वा श्येनस्य तद् वाक्यं राजर्षिर्विस्मयं गतः। सम्भाव्य चैनं तद्वाक्यं तदर्थी प्रत्यभाषत ॥ १७ ॥ **भीष्मजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! बाजकी यह बात सुनकर राजर्षि उशीनरको बड़ा विस्मय हुआ। वे उसके कथनकी प्रशंसा करके कपोतकी रक्षाके लिये इस प्रकार बोले— ॥ १७ ॥
राजोवाच
गोवृषो वा वराहो वा मृगो वा महिषोऽपि वा। त्वदर्थमद्य क्रियतां क्षुधाप्रशमनाय ते ॥ १८ ॥ **राजाने कहा—**बाज! तुम चाहो तो तुम्हारी भूख मिटानेके लिये आज तुम्हारे भोजनके निमित्त बैल, भैंसा, सूअर अथवा मृग प्रस्तुत कर दिया जाय ॥ १८ ॥
शरणागतं न त्यजेयमिति मे व्रतमाहितम्। न मुञ्चति ममाङ्गानि द्विजोऽयं पश्य वै द्विज ॥ १९ ॥ विहंगम! मैं शरणागतका त्याग नहीं कर सकता—यह मेरा व्रत है। देखो, यह पक्षी भयके मारे मेरे अंगोंको छोड़ नहीं रहा है ॥ १९ ॥
श्येन उवाच
न वराहं न चोक्षाणं न चान्यान् विविधान् द्विजान्। भक्षयामि महाराज किमन्याद्येन तेन मे ॥ २० ॥ **बाजने कहा—**महाराज! मैं न तो सूअर, न बैल और न दूसरे ही नाना प्रकारके पक्षियोंका मांस खाऊँगा। जो दूसरोंका भोजन है उसे लेकर मैं क्या करूँगा ॥ २० ॥
यस्तु मे विहितो भक्ष्यः स्वयं देवैः सनातनः। श्येनाः कपोतान् खादन्ति स्थितिरेषा सनातनी ॥ २१ ॥
साक्षात् देवताओंने सनातनकालसे मेरे लिये जो खाद्य नियत कर दिया है वही मुझे मिलना चाहिये। प्राचीनकालसे लोग इस बातको जानते हैं कि बाज कबूतर खाते हैं ।। २१ ।।
उशीनर कपोते तु यदि स्नेहस्तवानघ । ततस्त्वं मे प्रयच्छाद्य स्वमांसं तुलया धृतम् ।। २२ ।। निष्पाप महाराज उशीनर! यदि आपको इस कबूतरपर बड़ा स्नेह है तो आप मुझे इसके बराबर अपना ही मांस तराजूपर तौलकर दे दीजिये ।। २२ ।।
राजोवाच
महाननुग्रहो मेऽद्य यस्त्वमेवमिहात्थ माम् । बाढमेव करिष्यामीत्युक्त्वासौ राजसत्तमः ।। २३ ।। उत्कृत्योत्कृत्य मांसानि तुलया समतोलयत् । राजाने कहा—'बाज! तुमने ऐसी बात कहकर मुझपर बड़ा अनुग्रह किया। बहुत अच्छा, मैं ऐसा ही करूँगा।' यों कहकर नृपश्रेष्ठ उशीनरने अपना मांस काट-काटकर तराजूपर रखना आरम्भ किया ।। २३ १/२ ।।
अन्तःपुरे ततस्तस्य स्त्रियो रत्नविभूषिताः ।। २४ ।। हाहाभूता विनिष्क्रान्ताः श्रुत्वा परमदुःखिताः । यह समाचार सुनकर अन्तःपुरकी रत्नविभूषित रानियाँ बहुत दुःखी हुईं और हाहाकार करती हुई बाहर निकल आयीं ।। २४ १/२ ।।
तासां रुदितशब्देन मन्त्रिभृत्यजनस्य च ।। २५ ।। बभूव सुमहान् नादो मेघगम्भीरनिःस्वनः । उनके रोनेके शब्दसे तथा मन्त्रियों और भृत्यजनोंके हाहाकारसे मेघकी गम्भीर गर्जनाके समान वहाँ बड़ा भारी कोलाहल मच गया ।। २५ १/२ ।।
निरुद्धं गगनं सर्वं शुभ्रं मेघैः समन्ततः ।। २६ ।। मही प्रचलिता चासीत् तस्य सत्येन कर्मणा । सारा शुभ्र आकाश सब ओरसे मेघोंद्वारा आच्छादित हो गया। उनके सत्यकर्मके प्रभावसे पृथ्वी काँपने लगी ।। २६ १/२ ।।
स राजा पार्श्वतश्चैव बाहुभ्यामूरुतश्च यत् ।। २७ ।। तानि मांसानि संच्छिद्य तुलां पूरयतेऽशनैः । तथापि न समस्तेन कपोतेन बभूव ह ।। २८ ।। राजा अपनी पसलियों, भुजाओं और जाँघोंसे मांस काटकर जल्दी-जल्दी तराजू भरने लगे। तथापि वह मांसराशि उस कबूतरके बराबर नहीं हुई ।। २७-२८ ।।
अस्थिभूतो यदा राजा निर्मांसो रुधिरस्रवः ।
तुलां ततः समारूढः स्वं मांसक्षयमुत्सृजन् ॥ २९ ॥ जब राजाके शरीरका मांस चुक गया और रक्तकी धारा बहाता हुआ हड्डियोंका ढाँचामात्र रह गया तब वे मांस काटनेका काम बंद करके स्वयं ही तराजूपर चढ़ गये ॥ २९ ॥
ततः सेन्द्रास्त्रयो लोकास्तं नरेन्द्रमुपस्थिताः । भेर्यश्चाकाशगैस्तत्र वादिता देवदुन्दुभिः ॥ ३० ॥ फिर तो इन्द्र आदि देवताओंसहित तीनों लोकोंके प्राणी उन नरेन्द्रके पास आ पहुँचे। कुछ देवता आकाशमें ही खड़े होकर दुन्दुभियाँ बजाने लगे ॥ ३० ॥
अमृतेनावसिक्तश्च वृषदभों नरेश्वरः । दिव्यैश्च सुसुखैर्माल्यैरभिवृष्टः पुनः पुनः ॥ ३१ ॥ कुछ देवताओंने राजा वृषदर्भको अमृतसे नहलाया और उनके ऊपर अत्यन्त सुखदायक दिव्य पुष्पोंकी बारंबार वर्षा की ॥ ३१ ॥
देवगन्धर्वसंघातैरप्सरोभिश्च सर्वतः । नृत्तैश्चोपगीतश्च पितामह इव प्रभुः ॥ ३२ ॥ देव-गन्धर्वोंके समुदाय और अप्सराएँ सब ओरसे उन्हें घेरकर गाने और नाचने लगीं। वे उनके बीचमें भगवान् ब्रह्माजीके समान शोभा पाने लगे ॥ ३२ ॥
हेमप्रासादसम्बाधं मणिकाञ्चनतोरणम् । स वैडूर्यमणिस्तम्भं विमानं समधिष्ठितः ॥ ३३ ॥ इतनेहीमें एक दिव्य विमान उपस्थित हुआ जिसमें सुवर्णके महल बने हुए थे। सोने और मणियोंकी बन्दनवारें लगी थीं और वैडूर्यमणिके खम्भे शोभा पा रहे थे ॥ ३३ ॥
स राजर्षिर्गतः स्वर्गं कर्मणा तेन शाश्वतम् । राजर्षि उशीनर उस विमानमें बैठकर उस पुण्यकर्मके प्रभावसे सनातन दिव्यलोकको प्राप्त हुए ॥ ३३ १/२ ॥
शरणागतेषु चैवं त्वं कुरु सर्वं युधिष्ठिर ॥ ३४ ॥ भक्तानामनुरक्तानामाश्रितानां च रक्षिता । दयावान् सर्वभूतेषु परत्र सुखमेधते ॥ ३५ ॥ युधिष्ठिर! तुम भी शरणागतोंके लिये इसी प्रकार अपना सर्वस्व निछावर कर दो। जो मनुष्य अपने भक्त, प्रेमी और शरणागत पुरुषोंकी रक्षा करता है तथा सब प्राणियोंपर दया रखता है वह परलोकमें सुख पाता है ॥ ३४-३५ ॥
साधुवृत्तो हि यो राजा सद्वृत्तमनुतिष्ठति । किं न प्राप्तं भवेत् तेन स्वव्याजेनेह कर्मणा ॥ ३६ ॥ जो राजा सदाचारी होकर सबके साथ सद्बर्ताव करता है वह अपने निश्छल कर्मसे किस वस्तुको नहीं प्राप्त कर लेता ॥ ३६ ॥
स राजर्षिर्विशुद्धात्मा धीरः सत्यपराक्रमः । काशीनामीश्वरः ख्यातस्त्रिषु लोकेषु कर्मणा ॥ ३७ ॥ सत्यपराक्रमी, धीर और शुद्ध हृदयवाले काशीनरेश राजर्षि उशीनर अपने पुण्यकर्मसे तीनों लोकोंमें विख्यात हो गये ॥ ३७ ॥
योऽप्यन्यः कारयेदेवं शरणागतरक्षणम् । सोऽपि गच्छेत तामेव गतिं भरतसत्तम ॥ ३८ ॥ भरतश्रेष्ठ! यदि दूसरा कोई भी पुरुष इसी प्रकार शरणागतकी रक्षा करेगा तो वह भी उसी गतिको प्राप्त करेगा ॥ ३८ ॥
इदं वृत्तं हि राजर्षेर्वृषदर्भस्य कीर्तयन् । पूतात्मा वै भवेत् लोके शृणुयाद् यश्च नित्यशः ॥ ३९ ॥ राजर्षि वृषदर्भ (उशीनर)-के इस चरित्रका जो सदा श्रवण और वर्णन करता है वह संसारमें पुण्यात्मा होता है ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि श्येनकपोतसंवादे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें बाज और कबूतरका संवादविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
ब्राह्मणके महत्त्वका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
किं राज्ञः सर्वकृत्यानां गरीयः स्यात् पितामह ।
कुर्वन् किं कर्म नृपतिरुभौ लोकौ समश्रुते ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**पितामह! राजाके सम्पूर्ण कृत्योंमें किसका महत्त्व सबसे अधिक है? किस कर्मका अनुष्ठान करनेवाला राजा इहलोक और परलोक दोनोंमें सुखी होता है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
एतद् राज्ञः कृत्यतममभिषिक्तस्य भारत ।
ब्राह्मणानामनुष्ठानमत्यन्तं सुखमिच्छता ॥ २ ॥
कर्तव्यं पार्थिवेन्द्रेण तथैव भरतर्षभ ।
**भीष्मजीने कहा—**भारत! राजसिंहासनपर अभिषिक्त होकर राज्यशासन करनेवाले राजाका सबसे प्रधान कर्तव्य यही है कि वह ब्राह्मणोंकी सेवा-पूजा करे। भरतश्रेष्ठ! अक्षय सुखकी इच्छा रखनेवाले नरेशको ऐसा ही करना चाहिये ॥ २ ½ ॥
श्रोत्रियान् ब्राह्मणान् वृद्धान् नित्यमेवाभिपूजयेत् ॥ ३ ॥
पौरजानपदांश्चापि ब्राह्मणांश्च बहुश्रुतान् ।
सान्त्वेन भोगदानेन नमस्कारैस्तथार्चयेत् ॥ ४ ॥
राजा वेदज्ञ ब्राह्मणों तथा बड़े-बूढ़ोंका सदा ही आदर करे। नगर और जनपदमें रहनेवाले बहुश्रुत ब्राह्मणोंको मधुर वचन बोलकर, उत्तम भोग प्रदानकर तथा सादर शीश झुकाकर सम्मानित करे ॥ ३-४ ॥
एतत् कृत्यतमं राज्ञो नित्यमेवोपलक्षयेत् ।
यथाऽऽत्मानं यथा पुत्रांस्तथैतान् प्रतिपालयेत् ॥ ५ ॥
राजा जिस प्रकार अपनी तथा अपने पुत्रोंकी रक्षा करता है उसी प्रकार इन ब्राह्मणोंकी भी करे। यही राजाका प्रधान कर्तव्य है; जिसपर उसे सदा ही दृष्टि रखनी चाहिये ॥ ५ ॥
ये चाप्येषां पूज्यतमास्तान् दृढं प्रतिपूजयेत् ।
तेषु शान्तेषु तद् राष्ट्रं सर्वमेव विराजते ॥ ६ ॥
जो इन ब्राह्मणोंके भी पूजनीय हों उन पुरुषोंका भी सुस्थिर चित्तसे पूजन करे; क्योंकि उनके शान्त रहनेपर ही सारा राष्ट्र शान्त एवं सुखी रह सकता है ॥
ते पूज्यास्ते नमस्कार्या मान्यास्ते पितरो यथा ।
तेष्वेव यात्रा लोकानां भूतानामिव वासवे ॥ ७ ॥
राजाके लिये ब्राह्मण ही पिताकी भाँति पूजनीय, वन्दनीय और माननीय है। जैसे प्राणियोंका जीवन वर्षा करनेवाले इन्द्रपर निर्भर है उसी प्रकार जगत्की जीवन-यात्रा ब्राह्मणोंपर ही अवलम्बित है ॥ ७ ॥
अभिचारैरुपायैश्च दहेयुरपि चेतसा ।
निःशेषं कुपिताः कुर्युरुग्राः सत्यपराक्रमाः ॥ ८ ॥
ये सत्य-पराक्रमी ब्राह्मण जब कुपित होकर उग्ररूप धारण कर लेते हैं उस समय अभिचार या अन्य उपायोंद्वारा संकल्पमात्रसे अपने विरोधियोंको भस्म कर सकते हैं और उनका सर्वनाश कर डालते हैं ॥ ८ ॥
नान्तमेषां प्रपश्यामि न दिशश्चाप्यपावृताः ।
कुपिताः समुदीक्षन्ते दावेष्वग्निशिखा इव ॥ ९ ॥
मुझे इनका अन्त दिखायी नहीं देता। इनके लिये किसी भी दिशाका द्वार बंद नहीं है। ये जिस समय क्रोधमें भर जाते हैं उस समय दावानलकी लपटोंके समान हो जाते हैं और वैसी ही दाहक दृष्टिसे देखने लगते हैं ॥
बिभ्यत्येषां साहसिका गुणास्तेषामतीव हि ।
कूपा इव तृणच्छन्ना विशुद्धा द्यौरिवापरे ॥ १० ॥
बड़े-बड़े साहसी भी इनसे भय मानते हैं; क्योंकि इनके भीतर गुण ही अधिक होते हैं। इन ब्राह्मणोंमेंसे कुछ तो घास-फूससे ढके हुए कूपकी तरह अपने तेजको छिपाए रखते हैं और कुछ निर्मल आकाशकी भाँति प्रकाशित होते रहते हैं ॥ १० ॥
प्रसह्यकारिणः केचित् कार्पासमृदवो परे ।
(मान्यास्तेषां साधवो ये न निन्द्याश्चाप्यसाधवः ।)
सन्ति चैषामतिशठास्तथैवान्ये तपस्विनः ॥ ११ ॥
कुछ हठी होते हैं और कुछ रूईकी तरह कोमल। इनमें जो श्रेष्ठ पुरुष हों, उनका सम्मान करना चाहिये; परंतु जो श्रेष्ठ न हों, उनकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये। इन ब्राह्मणोंमें कुछ तो अत्यन्त शठ होते हैं और दूसरे महान् तपस्वी ॥ ११ ॥
कृषिगोरक्ष्यमप्येके भैक्ष्यमन्येऽप्यनुष्ठिताः ।
चौराश्चान्येऽनृताश्चान्ये तथान्ये नटनर्तकाः ॥ १२ ॥
कोई-कोई ब्राह्मण खेती और गोरक्षासे जीवन चलाते हैं, कोई भिक्षापर जीवन-निर्वाह करते हैं, कितने ही चोरी करते हैं, कोई झूठ बोलते हैं और दूसरे कितने ही नटोंका तथा नाचनेका कार्य करते हैं ॥ १२ ॥
सर्वकर्मसहाश्चान्ये पार्थिवेष्वितरेषु च ।
विविधाकारयुक्ताश्च ब्राह्मणा भरतर्षभ ॥ १३ ॥
भरतश्रेष्ठ! कितने ही ब्राह्मण राजाओं तथा अन्य लोगोंके यहाँ सब प्रकारके कार्य करनेमें समर्थ होते हैं और अनेक ब्राह्मण नाना प्रकारके आकार धारण करते हैं ।। १३ ।। नानाकर्मसु रक्तानां बहुकर्मोपजीविनाम् । धर्मज्ञानां सतां तेषां नित्यमेवानुकीर्तयेत् ।। १४ ।। नाना प्रकारके कर्मोंमें संलग्न तथा अनेक कर्मोंसे जीविका चलानेवाले उन धर्मज्ञ एवं सत्पुरुष ब्राह्मणोंका सदा ही गुण गाना चाहिये ।। १४ ।। पितॄणां देवतानां च मनुष्योरगरक्षसाम् । पुराप्येते महाभागा ब्राह्मणा वै जनाधिप ।। १५ ।। नरेश्वर! प्राचीनकालसे ही ये महाभाग ब्राह्मण-लोग देवता, पितर, मनुष्य, नाग और राक्षसोंके पूजनीय हैं ।। १५ ।। नैते देवैर्न पितृभिर्न गन्धर्वैर्न राक्षसैः । नासुरैर्न पिशाचैश्च शक्या जेतुं द्विजातयः ।। १६ ।। ये द्विज न तो देवताओं, न पितरों, न गन्धर्वों, न राक्षसों, न असुरों और न पिशाचोंद्वारा ही जीते जा सकते हैं ।। १६ ।। अदैवं दैवतं कुर्युर्दैवतं चाप्यदैवतम् । यमिच्छेयुः स राजा स्याद् ये नेष्टः स पराभवेत् ।। १७ ।। ये चाहें तो जो देवता नहीं है उसे देवता बना दें और जो देवता हैं उन्हें भी देवत्वसे गिरा दें। ये जिसे राजा बनाना चाहें वही राजा रह सकता है। जिसे राजाके रूपमें ये न देखना चाहें उसका पराभव हो जाता है ।। १७ ।। परिवादं च ये कुर्युर्ब्राह्मणानामचेतसः । सत्यं ब्रवीमि ते राजन् विनश्येयुर्न संशयः ।। १८ ।। राजन्! मैं तुमसे यह सच्ची बात बता रहा हूँ कि जो मूढ़ मानव ब्राह्मणोंकी निन्दा करते हैं वे नष्ट हो जाते हैं—इसमें संशय नहीं है ।। १८ ।। निन्दाप्रशंसाकुशलाः कीर्त्यकीर्तिपरायणाः । परिकुप्यन्ति ते राजन् सततं द्विषतां द्विजाः ।। १९ ।। निन्दा और प्रशंसामें निपुण तथा लोगोंके यश और अपयशको बढ़ानेमें तत्पर रहनेवाले द्विज अपने प्रति सदा द्वेष रखनेवालोंपर कुपित हो उठते हैं ।। १९ ।। ब्राह्मणा यं प्रशंसन्ति पुरुषः स प्रवर्धते । ब्राह्मणैर्यः पराकृष्टः पराभूयात् क्षणाद्धि सः ।। २० ।। ब्राह्मण जिसकी प्रशंसा करते हैं; उस पुरुषका अभ्युदय होता है और जिसको वे शाप देते हैं; उसका एक क्षणमें पराभव हो जाता है ।। २० ।। शका यवनकाम्बोजास्तास्ताः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणानामदर्शनात् ।। २१ ।।
शक, यवन और काम्बोज आदि जातियाँ पहले क्षत्रिय ही थीं; किंतु ब्राह्मणोंकी कृपादृष्टिसे वञ्चित होनेके कारण उन्हें वृषल (शूद्र एवं म्लेच्छ) होना पड़ा ॥ २१ ॥
द्राविडाश्च कलिङ्गाश्च पुलिन्दाश्चाप्युशीनराः ।
कोलिसर्पा माहिषकास्तास्ताः क्षत्रियजातयः ॥ २२ ॥
वृषलत्वं परिगता ब्राह्मणानामदर्शनात् ।
श्रेयान् पराजयस्तेभ्यो न जयो जयतां वर ॥ २३ ॥
विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ नरेश! द्राविड़, कलिंग, पुलिन्द, उशीनर, कोलिसर्प और माहिषक आदि क्षत्रिय जातियाँ भी ब्राह्मणोंकी कृपादृष्टि न मिलनेसे ही शूद्र हो गयीं। ब्राह्मणोंसे हार मान लेनेमें ही कल्याण है, उन्हें हराना अच्छा नहीं है ॥ २२-२३ ॥
यस्तु सर्वमिदं हन्याद् ब्राह्मणं च न तत्समम् ।
ब्रह्मवध्या महान् दोष इत्याहुः परमर्षयः ॥ २४ ॥
जो इस सम्पूर्ण जगत्को मार डाले तथा जो ब्राह्मणका वध करे, उन दोनोंका पाप समान नहीं है। महर्षियोंका कहना है कि ब्रह्महत्या महान् दोष है ॥ २४ ॥
परिवादो द्विजातीनां न श्रोतव्यः कथंचन ।
आसीताधोमुखस्तूष्णीं समुत्थाय व्रजेच्च वा ॥ २५ ॥
ब्राह्मणोंकी निन्दा किसी तरह नहीं सुननी चाहिये। जहाँ उनकी निन्दा होती हो, वहाँ नीचे मुँह करके चुपचाप बैठे रहना या वहाँसे उठकर चल देना चाहिये ॥ २५ ॥
न स जातोऽजनिष्यद् वा पृथिव्यामिह कश्चन ।
यो ब्राह्मणविरोधेन सुखं जीवितुमुत्सहेत् ॥ २६ ॥
इस पृथ्वीपर ऐसा कोई मनुष्य न तो पैदा हुआ है और न आगे पैदा होगा ही जो ब्राह्मणके साथ विरोध करके सुखपूर्वक जीवित रहनेका साहस करे ॥ २६ ॥
दुर्ग्राह्यो मुष्टिना वायुर्दुःस्पर्शः पाणिना शशी ।
दुर्धरा पृथिवी राजन् दुर्जया ब्राह्मणा भुवि ॥ २७ ॥
राजन्! हवाको मुट्ठीमें पकड़ना, चन्द्रमाको हाथसे छूना और पृथ्वीको उठा लेना जैसे अत्यन्त कठिन काम है, उसी तरह इस पृथ्वीपर ब्राह्मणोंको जीतना दुष्कर है ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्राह्मणप्रशंसा नाम त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्राह्मणकी प्रशंसा नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठक १/३ श्लोक मिलाकर २७ १/३ श्लोक हैं)
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी प्रशंसा
भीष्म उवाच
ब्राह्मणानैव सततं भृशं सम्परिपूजयेत् ।
एते हि सोमराजान ईश्वराः सुखदुःखयोः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ब्राह्मणोंका सदा ही भलीभाँति पूजन करना चाहिये। चन्द्रमा इनके राजा हैं। ये मनुष्यको सुख और दुःख देनेमें समर्थ हैं ॥ १ ॥
एते भोगैरलङ्कारैरन्यैश्चैव किमिच्छकैः ।
सदा पूज्या नमस्कारै रक्ष्याश्च पितृवन्नृपैः ॥ २ ॥
ततो राष्ट्रस्य शान्तिर्हि भूतानामिव वासवात् ।
राजाओंको चाहिये कि वे उत्तम भोग, आभूषण तथा पूछकर प्रस्तुत किये गये दूसरे मनोवांछित पदार्थ देकर नमस्कार आदिके द्वारा सदा ब्राह्मणोंकी पूजा करें और पिताके समान उनके पालन-पोषणका ध्यान रखें। तभी इन ब्राह्मणोंसे राष्ट्रमें शान्ति रह सकती है। ठीक उसी तरह, जैसे इन्द्रसे वृष्टि प्राप्त होनेपर समस्त प्राणियोंको सुख-शान्ति मिलती है ॥ २ १/२ ॥
जायतां ब्रह्मवर्चस्वी राष्ट्रे वै ब्राह्मणः शुचिः ॥ ३ ॥
महारथश्च राजन्य एष्टव्यः शत्रुतापनः ।
सबको यह इच्छा करनी चाहिये कि राष्ट्रमें ब्रह्मतेजसे सम्पन्न पवित्र ब्राह्मण उत्पन्न हो और शत्रुओंको संताप देनेवाले महारथी क्षत्रियकी उत्पत्ति हो ॥ ३ १/२ ॥
ब्राह्मणं जातिसम्पन्नं धर्मज्ञं संशितव्रतम् ॥ ४ ॥
वासयेत गृहे राजन् न तस्मात् परमस्ति वै ।
राजन्! विशुद्ध जातिसे युक्त तथा तीक्ष्ण व्रतका पालन करनेवाले धर्मज्ञ ब्राह्मणको अपने घरमें ठहराना चाहिये। इससे बढ़कर दूसरा कोई पुण्यकर्म नहीं है ॥ ४ १/२ ॥
ब्राह्मणेभ्यो हविर्दत्तं प्रतिगृह्णन्ति देवताः ॥ ५ ॥
पितरः सर्वभूतानां नैतेभ्यो विद्यते परम् ।
ब्राह्मणोंको जो हविष्य अर्पित किया जाता है उसे देवता ग्रहण करते हैं; क्योंकि ब्राह्मण समस्त प्राणियोंके पिता हैं। इनसे बढ़कर दूसरा कोई प्राणी नहीं है ॥ ५ १/२ ॥
आदित्यश्चन्द्रमा वायुरापो भूरम्बरं दिशः ॥ ६ ॥
सर्वे ब्राह्मणमाविश्य सदान्नमुपभुञ्जते ।
सूर्य, चन्द्रमा, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश और दिशा—इन सबके अधिष्ठाता देवता सदा ब्राह्मणके शरीरमें प्रवेश करके अन्न भोजन करते हैं ।। ६ १/२ ।। न तस्याश्नन्ति पितरो यस्य विप्रा न भुञ्जते ।। ७ ।। देवाश्चाप्यस्य नाश्नन्ति पापस्य ब्राह्मणद्विषः । ब्राह्मण जिसका अन्न नहीं खाते उसके अन्नको पितर भी नहीं स्वीकार करते। उस ब्राह्मणद्रोही पापात्माका अन्न देवता भी नहीं ग्रहण करते हैं ।। ७ १/२ ।। ब्राह्मणेषु तु तुष्टेषु प्रीयन्ते पितरः सदा ।। ८ ।। तथैव देवता राजन् नात्र कार्या विचारणा । राजन्! यदि ब्राह्मण संतुष्ट हो जायँ तो पितर तथा देवता भी सदा प्रसन्न रहते हैं। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।। ८ १/२ ।। तथैव तेऽपि प्रीयन्ते येषां भवति तद्धविः ।। ९ ।। न च प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति च परां गतिम् । इसी प्रकार वे यजमान भी प्रसन्न होते हैं जिनकी दी हुई हवि ब्राह्मणोंके उपयोगमें आती है। वे मरनेके बाद नष्ट नहीं होते हैं, उत्तम गतिको प्राप्त हो जाते हैं ।। ९ १/२ ।। येन येनैव हविषा ब्राह्मणांस्तर्पयेन्नरः ।। १० ।। तेन तेनैव प्रीयन्ते पितरो देवतास्तथा । मनुष्य जिस-जिस हविष्यसे ब्राह्मणोंको तृप्त करता है, उसी-उसीसे देवता और पितर भी तृप्त होते हैं ।। १० १/२ ।। ब्राह्मणादेव तद् भूतं प्रभवन्ति यतः प्रजाः ।। ११ ।। यतश्चायं प्रभवति प्रेत्य यत्र च गच्छति । वेदैष मार्गं स्वर्गस्य तथैव नरकस्य च ।। १२ ।। आगतानागते चोभे ब्राह्मणो द्विपदं वरः । ब्राह्मणो भरतश्रेष्ठ स्वधर्मं चैव वेद यः ।। १३ ।। जिससे समस्त प्रजा उत्पन्न होती है, वह यज्ञ आदि कर्म ब्राह्मणोंसे ही सम्पन्न होता है। जीव जहाँसे उत्पन्न होता है और मृत्युके पश्चात् जहाँ जाता है, उस तत्त्वको, स्वर्ग और नरकके मार्गको तथा भूत, वर्तमान और भविष्यको ब्राह्मण ही जानता है। ब्राह्मण मनुष्योंमें सबसे श्रेष्ठ है। भरतश्रेष्ठ! जो अपने धर्मको जानता है और उसका पालन करता है, वही सच्चा ब्राह्मण है ।। ११—१३ ।। ये चैनमनुवर्तन्ते ते न यान्ति पराभवम् । न ते प्रेत्य विनश्यन्ति गच्छन्ति न पराभवम् ।। १४ ।। जो लोग ब्राह्मणोंका अनुसरण करते हैं उनकी कभी पराजय नहीं होती तथा मृत्युके पश्चात् उनका पतन नहीं होता। वे अपमानको भी नहीं प्राप्त होते हैं ।। १४ ।।
यद् ब्राह्मणमुखात् प्राप्तं प्रतिगृह्णन्ति वै वचः । भूतात्मानो महात्मानस्ते न यान्ति पराभवम् ॥ १५ ॥ ब्राह्मणके मुखसे जो वाणी निकलती है, उसे जो शिरोधार्य करते हैं, वे सम्पूर्ण भूतोंको आत्मभावसे देखनेवाले महात्मा कभी पराभवको नहीं प्राप्त होते हैं ॥ क्षत्रियाणां प्रतपतां तेजसा च बलेन च । ब्राह्मणेष्वेव शाम्यन्ति तेजांसि च बलानि च ॥ १६ ॥ अपने तेज और बलसे तपते हुए क्षत्रियोंके तेज और बल ब्राह्मणोंके सामने आनेपर ही शान्त होते हैं ॥ भृगवस्तालजंघांश्च नीपानाङ्गिरसोऽजयन् । भरद्वाजो वैहत्तव्यानैलांश्च भरतर्षभ ॥ १७ ॥ भरतश्रेष्ठ! भृगुवंशी ब्राह्मणोंने तालजंघोंको, अंगिराकी संतानोंने नीपवंशी राजाओंको तथा भरद्वाजने हैहयोंको और इलाके पुत्रोंको पराजित किया था ॥ १७ ॥ चित्रायुधांश्चाप्यजयन्नेते कृष्णाजिनध्वजाः । प्रक्षिप्याथ च कुम्भान् वै पारगामिनमारभेत् ॥ १८ ॥ क्षत्रियोंके पास अनेक प्रकारके विचित्र आयुध थे तो भी कृष्णमृगचर्म धारण करनेवाले इन ब्राह्मणोंने उन्हें हरा दिया। क्षत्रियको चाहिये कि ब्राह्मणोंको जलपूर्ण कलश दान करके पारलौकिक कार्य आरम्भ करे ॥ १८ ॥ यत् किंचित् कथ्यते लोके श्रूयते पठ्यतेऽपि वा । सर्वं तद् ब्राह्मणेष्वेव गूढोऽग्निरिव दारुषु ॥ १९ ॥ संसारमें जो कुछ कहा-सुना या पढ़ा जाता है वह सब काठमें छिपी हुई आगकी तरह ब्राह्मणोंमें ही स्थित है ॥ १९ ॥ अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं वासुदेवस्य पृथ्व्याश्च भरतर्षभ ॥ २० ॥ भरतश्रेष्ठ! इस विषयमें जानकार लोग भगवान् श्रीकृष्ण और पृथ्वीके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ २० ॥
वासुदेव उवाच
मातरं सर्वभूतानां पृच्छे त्वां संशयं शुभे । केनस्वित् कर्मणा पापं व्यपोहति नरो गृही ॥ २१ ॥ श्रीकृष्णने पूछा—शुभे! तुम सम्पूर्ण भूतोंकी माता हो, इसलिये मैं तुमसे एक संदेह पूछ रहा हूँ। गृहस्थ मनुष्य किस कर्मके अनुष्ठानसे अपने पापका नाश कर सकता है? ॥ २१ ॥
पृथिव्युवाच
ब्राह्मणानेव सेवेत पवित्रं ह्येतदुत्तमम् । ब्राह्मणान् सेवमानस्य रजः सर्वं प्रणश्यति । अतो भूतिरतः कीर्तिरतो बुद्धिः प्रजायते ॥ २२ ॥ **पृथ्वीने कहा—**भगवन्! इसके लिये मनुष्यको ब्राह्मणोंकी ही सेवा करनी चाहिये। यही सबसे पवित्र और उत्तम कार्य है। ब्राह्मणोंकी सेवा करनेवाले पुरुषका समस्त रजोगुण नष्ट हो जाता है। इसीसे ऐश्वर्य, इसीसे कीर्ति और इसीसे उत्तम बुद्धि भी प्राप्त होती है ॥ २२ ॥
महारथश्च राजन्य एष्टव्यः शत्रुतापनः । इति मां नारदः प्राह सततं सर्वभूतये ॥ २३ ॥
पृथ्वी और श्रीकृष्णका संवाद
सदा सब प्रकारकी समृद्धिके लिये नारदजीने मुझसे कहा कि शत्रुओंको संताप देनेवाले महारथी क्षत्रियके उत्पन्न होनेकी कामना करनी चाहिये ॥ २३ ॥
ब्राह्मणं जातिसम्पन्नं धर्मज्ञं संशितं शुचिम् ।
अपरेषां परेषां च परेभ्यश्चैव येऽपरे ॥ २४ ॥
ब्राह्मणा यं प्रशंसन्ति स मनुष्यः प्रवर्धते ।
अथ यो ब्राह्मणान् क्रुष्टः पराभवति सोऽचिरात् ॥ २५ ॥
उत्तम जातिसे सम्पन्न, धर्मज्ञ, दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले तथा पवित्र ब्राह्मणके उत्पन्न होनेकी भी इच्छा रखनी चाहिये। छोटे-बड़े सब लोगोंसे जो बड़े हैं, उनसे भी ब्राह्मण बड़े माने गये हैं। ऐसे ब्राह्मण जिसकी प्रशंसा करते हैं उस मनुष्यकी वृद्धि होती है और जो ब्राह्मणोंकी निन्दा करता है वह शीघ्र ही पराभवको प्राप्त होता है ॥ २४-२५ ॥
यथा महार्णवे क्षिप्त आमलोष्टो विनश्यति ।
तथा दुष्चरितं सर्वं पराभावाय कल्पते ॥ २६ ॥
जैसे महासागरमें फेंका हुआ कच्ची मिट्टीका ढेला तुरंत गल जाता है, उसी प्रकार ब्राह्मणोंका संग प्राप्त होते ही सारा दुष्कर्म नष्ट हो जाता है ॥ २६ ॥
पश्य चन्द्रे कृतं लक्ष्म समुद्रो लवणोदकः ।
तथा भगसहस्रेण महेन्द्रः परिचिह्नितः ॥ २७ ॥
तेषामेव प्रभावेण सहस्रनयनो ह्यसौ ।
शतक्रतुः समभवत् पश्य माधव यादृशम् ॥ २८ ॥
माधव! देखिये, ब्राह्मणोंका कैसा प्रभाव है, उन्होंने चन्द्रमामें कलंक लगा दिया, समुद्रका पानी खारा बना दिया तथा देवराज इन्द्रके शरीरमें एक हजार भगके चिह्न उत्पन्न कर दिये और फिर उन्हींके प्रभावसे वे भग नेत्रके रूपमें परिणत हो गये; जिनके कारण शतक्रतु इन्द्र ‘सहस्राक्ष’ नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ २७-२८ ॥
इच्छन् कीर्तिं च भूतिं च लोकांश्च मधुसूदन ।
ब्राह्मणानुमते तिष्ठेत् पुरुषः शुचिरात्मवान् ॥ २९ ॥
मधुसूदन! जो कीर्ति, ऐश्वर्य और उत्तम लोकोंको प्राप्त करना चाहता हो, वह मनको वशमें रखनेवाला पवित्र पुरुष ब्राह्मणोंकी आज्ञाके अधीन रहे ॥ २९ ॥
भीष्म उवाच
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा मेदिन्या मधुसूदनः ।
साधु साध्विति कौरव्य मेदिनीं प्रत्यपूजयत् ॥ ३० ॥
**भीष्मजी कहते हैं—**कुरुनन्दन! पृथ्वीके ये वचन सुनकर भगवान् मधुसूदनने कहा—‘वाह-वाह, तुमने बहुत अच्छी बात बतायी।' ऐसा कहकर उन्होंने भूदेवीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ ३० ॥
एतां श्रुत्वोपमां पार्थ प्रयतो ब्राह्मणर्षभान् ।
सततं पूजयेथास्त्वं ततः श्रेयोऽभिपत्स्यसे ॥ ३१ ॥
कुन्तीनन्दन! इस दृष्टान्त एवं ब्राह्मण-माहात्म्यको सुनकर तुम सदा पवित्रभावसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूजन करते रहो। इससे तुम कल्याणके भागी होओगे ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पृथ्वीवासुदेवसंवादे
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पृथ्वी और वासुदेवका संवादविषयक चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३४ ॥
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
ब्रह्माजीके द्वारा ब्राह्मणोंकी महत्ताका वर्णन
भीष्म उवाच
जन्मनैव महाभागो ब्राह्मणो नाम जायते ।
नमस्यः सर्वभूतानामतिथिः प्रसृताग्रभुक् ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ब्राह्मण जन्मसे ही महान् भाग्यशाली, समस्त प्राणियोंका वन्दनीय, अतिथि और प्रथम भोजन पानेका अधिकारी है ॥ १ ॥
सर्वार्थाः सुहृदस्ततात ब्राह्मणाः सुमनोमुखाः ।
गीर्भिर्मङ्गलयुक्ताभिरनुध्यायन्ति पूजिताः ॥ २ ॥
तात! ब्राह्मण सब मनोरथोंको सिद्ध करनेवाले, सबके सुहृद् तथा देवताओंके मुख हैं। वे पूजित होनेपर अपनी मंगलयुक्त वाणीसे आशीर्वाद देकर मनुष्यके कल्याणका चिन्तन करते हैं ॥ २ ॥
सर्वान्न्रो द्विषतस्तात ब्राह्मणा जातमन्यवः ।
गीर्भिर्दारुणयुक्ताभिरभिहन्युरपूजिताः ॥ ३ ॥
तात! हमारे शत्रुओंके द्वारा पूजित न होनेपर उनके प्रति कुपित हुए ब्राह्मण उन सबको अभिशापयुक्त कठोर वाणीद्वारा नष्ट कर डालें ॥ ३ ॥
अत्र गाथाः पुरागीताः कीर्तयन्ति पुराविदः ।
सृष्ट्वा द्विजातीन् धाता हि यथापूर्वं समादधत् ॥ ४ ॥
न चान्यदिह कर्तव्यं किञ्चिदूर्ध्वं यथाविधि ।
गुप्तो गोपायते ब्रह्म श्रेयो वस्तेन शोभनम् ॥ ५ ॥
इस विषयमें पुराणवेत्ता पुरुष पहलेकी गायी हुई कुछ गाथाओंका वर्णन करते हैं—प्रजापतिने ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंको पूर्ववत् उत्पन्न करके उनको समझाया, 'तुमलोगोंके लिये विधिपूर्वक स्वधर्मपालन और ब्राह्मणोंकी सेवाके सिवा और कोई कर्तव्य नहीं है। ब्राह्मणकी रक्षा की जाय तो वह स्वयं भी अपने रक्षककी रक्षा करता है; अतः ब्राह्मणकी सेवासे तुमलोगोंका परम कल्याण होगा ॥ ४-५ ॥
स्वमेव कुर्वतां कर्म श्रीर्वो ब्राह्मी भविष्यति ।
प्रमाणं सर्वभूतानां प्रग्रहाश्च भविष्यथ ॥ ६ ॥
'ब्राह्मणकी रक्षारूप अपने कर्तव्यका पालन करनेसे ही तुमलोगोंको ब्राह्मी लक्ष्मी प्राप्त होगी। तुम सम्पूर्ण भूतोंके लिये प्रमाणभूत तथा उनको वशमें करनेवाले बन जाओगे ॥ ६ ॥
न शौद्रं कर्म कर्तव्यं ब्राह्मणेन विपश्चिता ।
शौद्रं हि कुर्वतः कर्म धर्मः समुपरुध्यते ॥ ७ ॥ ‘विद्वान् ब्राह्मणको शूद्रोचित कर्म नहीं करना चाहिये। शूद्रके कर्म करनेसे उसका धर्म नष्ट हो जाता है ॥ ७ ॥
श्रीश्च बुद्धिश्च तेजश्च विभूतिश्च प्रतापिनी । स्वाध्याये चैव माहात्म्यं विपुलं प्रतिपत्स्यते ॥ ८ ॥ ‘स्वधर्मका पालन करनेसे लक्ष्मी, बुद्धि, तेज और प्रतापयुक्त ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है, तथा स्वाध्यायका अत्यधिक माहात्म्य उपलब्ध होता है ॥ ८ ॥
हुत्वा चाहवनीयस्थं महाभाग्ये प्रतिष्ठिताः । अग्रभोज्याः प्रसूतीनां श्रिया ब्राह्म्यानुकल्पिताः ॥ ९ ॥ ‘ब्राह्मण आहवनीय अग्निमें स्थित देवतागणोंको हवनसे तृप्त करके महान् सौभाग्यपूर्ण पदपर प्रतिष्ठित होते हैं। वे ब्राह्मी विद्यासे उत्तम पात्र बनकर बालकोंसे भी पहले भोजन पानेके अधिकारी होते हैं ॥ ९ ॥
श्रद्धया परया युक्ता ह्यनभिद्रोहालब्धया । दमस्वाध्यायनिरताः सर्वान् कामानवाप्स्यथ ॥ १० ॥ ‘द्विजगण! यदि तुमलोग किसी भी प्राणीके साथ द्रोह न करनेके कारण प्राप्त हुई परम श्रद्धासे सम्पन्न हो इन्द्रियसंयम और स्वाध्यायमें लगे रहोगे तो सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लोगे ॥ १० ॥
यच्चैव मानुषे लोके यच्च देवेषु किञ्चन । सर्वं तु तपसा साध्यं ज्ञानेन नियमेन च ॥ ११ ॥ ‘मनुष्यलोकमें तथा देवलोकमें जो कुछ भी भोग्य वस्तुएँ हैं, वे सब ज्ञान, नियम और तपस्यासे प्राप्त होनेवाली हैं ॥ ११ ॥
(युष्मत्सम्माननात् प्रीतिं पावनाः क्षत्रियाः श्रियम् । अमुत्रेह समायान्ति वैश्यशूद्रादिकास्तथा ॥ अरक्षिताश्च युष्माभिर्विरुद्धा यान्ति विप्लवम् । युष्मत्तेजोधृता लोकास्तद् रक्षथ जगत्त्रयम् ॥) ‘आपलोगोंके समादरसे पवित्र हुए क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र आदि प्राणी इहलोक और परलोकमें भी प्रीति एवं सम्पत्ति पाते हैं। जो आपके विरोधी हैं, वे आपसे अरक्षित होनेके कारण विनाशको प्राप्त होते हैं। आपके तेजसे ही ये सम्पूर्ण लोक टिके हुए हैं; अतः आप तीनों लोकोंकी रक्षा करें’ ॥
इत्येवं ब्रह्मगीतास्ते समाख्याता मयानघ । विप्राणामनुकम्पार्थं तेन प्रोक्तं हि धीमता ॥ १२ ॥ निष्पाप युधिष्ठिर! इस प्रकार ब्रह्माजीकी गायी हुई गाथा मैंने तुम्हें बतायी है। उन परम बुद्धिमान् धाताने ब्राह्मणोंपर कृपा करनेके लिये ही ऐसा कहा है ॥ १२ ॥
भूयस्तेषां बलं मन्ये यथा राज्ञस्तपस्विनः । दुरासदाश्च चण्डाश्च रभसाः क्षिप्रकारिणः ॥ १३ ॥ मैं ब्राह्मणोंका बल तपस्वी राजाके समान बहुत बड़ा मानता हूँ। वे दुर्जय, प्रचण्ड, वेगशाली और शीघ्रकारी होते हैं ॥ १३ ॥
सन्त्येषां सिंहसत्त्वाश्च व्याघ्रसत्त्वास्तथापरे । वराहमृगसत्त्वाश्च जलसत्त्वास्तथापरे ॥ १४ ॥ ब्राह्मणोंमें कुछ सिंहके समान शक्तिशाली होते हैं और कुछ व्याघ्रके समान। कितनोंकी शक्ति वाराह और मृगके समान होती है। कितने ही जल-जन्तुओंके समान होते हैं ॥ १४ ॥
सर्पस्पर्शसमाः केचित् तथान्ये मकरस्पृशः । विभाष्यघातिनः केचित् तथा चक्षुर्हणोऽपरे ॥ १५ ॥ किन्हींका स्पर्श सर्पके समान होता है तो किन्हींका घड़ियालोंके समान। कोई शाप देकर मारते हैं तो कोई क्रोधभरी दृष्टिसे देखकर ही भस्म कर देते हैं ॥ १५ ॥
सन्ति चाशीविषसमाः सन्ति मन्दास्तथापरे । विविधानीह वृत्तानि ब्राह्मणानां युधिष्ठिर ॥ १६ ॥ कुछ ब्राह्मण विषधर सर्पके समान भयंकर होते हैं और कुछ मन्द स्वभावके भी होते हैं। युधिष्ठिर! इस जगत्में ब्राह्मणोंके स्वभाव और आचार-व्यवहार अनेक प्रकारके हैं ॥ १६ ॥
मेकला द्राविडा लाटाः पौण्ड्राः कान्वशिरास्तथा । शौण्डिका दरदा दार्वाश्चौराः शबरबर्बराः ॥ १७ ॥ किराता यवनाश्चैव तास्ताः क्षत्रियजातयः । वृषलत्वमनुप्राप्ता ब्राह्मणानाममर्षणात् ॥ १८ ॥ मेकल, द्राविड़, लाट, पौण्ड्र, कान्वशिरा, शौण्डिक, दरद, दार्व, चौर, शबर, बर्बर, किरात और यवन—ये सब पहले क्षत्रिय थे; किंतु ब्राह्मणोंके साथ ईर्ष्या करनेसे नीच हो गये ॥ १७-१८ ॥
ब्राह्मणानां परिभवादसुराः सलिलेशयाः । ब्राह्मणानां प्रसादाच्च देवाः स्वर्गनिवासिनः ॥ १९ ॥ ब्राह्मणोंके तिरस्कारसे ही असुरोंको समुद्रमें रहना पड़ा और ब्राह्मणोंके कृपाप्रसादसे देवता स्वर्गलोकमें निवास करते हैं ॥ १९ ॥
अशक्यं स्प्रष्टुमाकाशमचाल्यो हिमवान् गिरिः । अधार्या सेतुना गङ्गा दुर्जया ब्राह्मणा भुवि ॥ २० ॥ जैसे आकाशको छूना, हिमालयको विचलित करना और बाँध बाँधकर गङ्गाके प्रवाहको रोक देना असम्भव है, उसी प्रकार इस भूतलपर ब्राह्मणोंको जीतना सर्वथा असम्भव है ॥ २० ॥
न ब्राह्मणविरोधेन शक्या शास्तुं वसुन्धरा ।
ब्राह्मणा हि महात्मानो देवानामपि देवताः ॥ २१ ॥
ब्राह्मणोंसे विरोध करके भूमण्डलका राज्य नहीं चलाया जा सकता; क्योंकि महात्मा ब्राह्मण देवताओंके भी देवता हैं ॥ २१ ॥
तान् पूजयस्व सततं दानेन परिचर्यया ।
यदिच्छसि महीं भोक्तुमिमां सागरमेखलाम् ॥ २२ ॥
युधिष्ठिर! यदि तुम इस समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राज्य भोगना चाहते हो तो दान और सेवाके द्वारा सदा ब्राह्मणोंकी पूजा करते रहो ॥ २२ ॥
प्रतिग्रहेण तेजो हि विप्राणां शाम्यतेऽनघ ।
प्रतिग्रहं ये नेच्छेयुस्तेभ्यो रक्ष्यं त्वया नृप ॥ २३ ॥
निष्पाप नरेश! दान लेनेसे ब्राह्मणोंका तेज शान्त हो जाता है; इसलिये जो दान नहीं लेना चाहते उन ब्राह्मणोंसे तुम्हें अपने कुलकी रक्षा करनी चाहिये ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि ब्राह्मणप्रशंसायां
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें ब्राह्मणकी प्रशंसाविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके दो श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)
षट्त्रिंशोऽध्यायः
ब्राह्मणकी प्रशंसाके विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरका संवाद
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शक्रशम्बरसंवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ १ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, इसे सुनो ॥ १ ॥ शक्रो ह्यज्ञातरूपेण जटी भूत्वा रजोगुणः । विरूपं रथमास्थाय प्रश्नं पप्रच्छ शम्बरम् ॥ २ ॥ एक समयकी बात है, देवराज इन्द्र अज्ञातरूपसे रजोगुणसम्पन्न जटाधारी तपस्वी बनकर एक बेडौल रथपर सवार हो शम्बरासुरके पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उससे पूछा ॥ २ ॥
शक्र उवाच
केन शम्बर वृत्तेन स्वजात्यानधितिष्ठसि । श्रेष्ठं त्वां केन मन्यन्ते तद् वै प्रब्रूहि तत्त्वतः ॥ ३ ॥ इन्द्र बोले—शम्बरासुर! किस बर्तावसे अपनी जातिवालॉंपर शासन करते हो? वे किस कारण तुम्हें सर्वश्रेष्ठ मानते हैं? यह ठीक-ठीक बतलाओ ॥ ३ ॥
शम्बर उवाच
नासूयामि यदा विप्रान् ब्राह्ममेव च मे मतम् । शास्त्राणि वदतो विप्रान् सम्मन्यामि यथासुखम् ॥ ४ ॥ शम्बरासुरने कहा—मैं ब्राह्मणोंमें कभी दोष नहीं देखता। उनके मतको ही अपना मत समझता हूँ और शास्त्रोंकी बात बतानेवाले विप्रोंका सदा सम्मान करता हूँ—उन्हें यथासाध्य सुख देनेकी चेष्टा करता हूँ ॥ ४ ॥ श्रुत्वा च नावजानामि नापराध्यामि कर्हिचित् । अभ्यर्च्याभ्यनुपृच्छामि पादौ गृह्णामि धीमताम् ॥ ५ ॥ सुनकर उनके वचनोंकी अवहेलना नहीं करता। कभी उनका अपराध नहीं करता। उनकी पूजा करके कुशल पूछता हूँ और बुद्धिमान् ब्राह्मणोंके पाँव पकड़ता हूँ ॥ ५ ॥ ते विश्रब्धाः प्रभाषन्ते सम्पृच्छन्ते च मां सदा । प्रमत्तेष्वप्रमत्तोऽस्मि सदा सुप्तेषु जागृमि ॥ ६ ॥