महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 425, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंषट्त्रिंशोऽध्यायः
ब्राह्मणकी प्रशंसाके विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरका संवाद
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । शक्रशम्बरसंवादं तन्निबोध युधिष्ठिर ॥ १ ॥ भीष्मजी कहते हैं—युधिष्ठिर! इस विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है, इसे सुनो ॥ १ ॥ शक्रो ह्यज्ञातरूपेण जटी भूत्वा रजोगुणः । विरूपं रथमास्थाय प्रश्नं पप्रच्छ शम्बरम् ॥ २ ॥ एक समयकी बात है, देवराज इन्द्र अज्ञातरूपसे रजोगुणसम्पन्न जटाधारी तपस्वी बनकर एक बेडौल रथपर सवार हो शम्बरासुरके पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उससे पूछा ॥ २ ॥
शक्र उवाच
केन शम्बर वृत्तेन स्वजात्यानधितिष्ठसि । श्रेष्ठं त्वां केन मन्यन्ते तद् वै प्रब्रूहि तत्त्वतः ॥ ३ ॥ इन्द्र बोले—शम्बरासुर! किस बर्तावसे अपनी जातिवालॉंपर शासन करते हो? वे किस कारण तुम्हें सर्वश्रेष्ठ मानते हैं? यह ठीक-ठीक बतलाओ ॥ ३ ॥
शम्बर उवाच
नासूयामि यदा विप्रान् ब्राह्ममेव च मे मतम् । शास्त्राणि वदतो विप्रान् सम्मन्यामि यथासुखम् ॥ ४ ॥ शम्बरासुरने कहा—मैं ब्राह्मणोंमें कभी दोष नहीं देखता। उनके मतको ही अपना मत समझता हूँ और शास्त्रोंकी बात बतानेवाले विप्रोंका सदा सम्मान करता हूँ—उन्हें यथासाध्य सुख देनेकी चेष्टा करता हूँ ॥ ४ ॥ श्रुत्वा च नावजानामि नापराध्यामि कर्हिचित् । अभ्यर्च्याभ्यनुपृच्छामि पादौ गृह्णामि धीमताम् ॥ ५ ॥ सुनकर उनके वचनोंकी अवहेलना नहीं करता। कभी उनका अपराध नहीं करता। उनकी पूजा करके कुशल पूछता हूँ और बुद्धिमान् ब्राह्मणोंके पाँव पकड़ता हूँ ॥ ५ ॥ ते विश्रब्धाः प्रभाषन्ते सम्पृच्छन्ते च मां सदा । प्रमत्तेष्वप्रमत्तोऽस्मि सदा सुप्तेषु जागृमि ॥ ६ ॥