भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 426, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 426

ब्राह्मण भी अत्यन्त विश्वस्त होकर मेरे साथ बातचीत करते और मेरी कुशल पूछते हैं। ब्राह्मणोंके असावधान रहनेपर भी मैं सदा सावधान रहता हूँ। उनके सोते रहनेपर भी मैं जागता रहता हूँ ॥ ६ ॥

ते मां शास्त्रपथे युक्तं ब्रह्मण्यमनसूयकम् ।
समासिञ्चन्ति शास्तारः क्षौद्रं मध्विव मक्षिकाः ॥ ७ ॥
मुझे शास्त्रीय मार्गपर चलनेवाला ब्राह्मणभक्त तथा अदोषदर्शी जानकर वे उपदेशक ब्राह्मण मुझे उसी प्रकार सदुपदेशके अमृतसे सींचते रहते हैं जैसे मधुमक्खियाँ मधुके छत्तेको ॥ ७ ॥

यच्च भाषन्ति संतुष्टास्तच्च गृह्णामि मेधया ।
समाधिमात्मनो नित्यमनुलोममचिन्तयम् ॥ ८ ॥
संतुष्ट होकर वे मुझसे जो कुछ कहते हैं उसे मैं अपनी बुद्धिके द्वारा ग्रहण करता हूँ। सदा ब्राह्मणोंमें अपनी निष्ठा बनाये रखता हूँ और नित्यप्रति उनके अनुकूल विचार रखता हूँ ॥ ८ ॥

सोऽहं वागग्रमृष्टानां रसानामवलेहकः ।
स्वजात्यानधितिष्ठामि नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ॥ ९ ॥
उनकी वाणीसे जो उपदेशका मधुर रस प्रवाहित होता है उसका मैं आस्वादन करता रहता हूँ। इसीलिये नक्षत्रोंपर चन्द्रमाकी भाँति मैं अपनी जातिवालोंपर शासन करता हूँ ॥ ९ ॥

एतत् पृथिव्याममृतमेतच्चक्षुरनुत्तमम् ।
यद् ब्राह्मणमुखात् शास्त्रमिह श्रुत्वा प्रवर्तते ॥ १० ॥
ब्राह्मणके मुखसे शास्त्रका उपदेश सुनकर इस जीवनमें उसके अनुसार बर्ताव करना ही पृथ्वीपर सर्वोत्तम अमृत और सर्वोत्तम दृष्टि है ॥ १० ॥

एतत् कारणमाज्ञाय दृष्ट्वा देवासुरं पुरा ।
युद्धं पिता मे हृष्टात्मा विस्मितः समपद्यत ॥ ११ ॥
इस कारणको जानकर अर्थात् ब्राह्मणके उपदेशके अनुसार चलना ही अमृत है—इस बातको भलीभाँति समझकर पूर्वकालमें देवासुरसंग्रामको उपस्थित हुआ देख मेरे पिता मन-ही-मन प्रसन्न और विस्मित हुए थे ॥

दृष्ट्वा च ब्राह्मणानां तु महिमानं महात्मनाम् ।
पर्यपृच्छत् कथममी सिद्धा इति निशाकरम् ॥ १२ ॥
महात्मा ब्राह्मणोंकी इस महिमाको देखकर उन्होंने चन्द्रमासे पूछा—‘निशाकर! इन ब्राह्मणोंको किस प्रकार सिद्धि प्राप्त हुई?’ ॥ १२ ॥

सोम उवाच